सोमवार, 27 जून 2011

कांग्रेसी दंश (आधी रा�� को आजादी:लैरी कालिन्��� दामिनिक लैपियर)

देश की आजादी के वक्त गांधी जी अकेले पड़ गये थे.कांग्रेस सत्ता लोभी व महत्वाकांक्षी नेहरु व पटेल के चारो ओर केन्द्रित होने लगी थी.महात्मा गांधी तो चाहते थे कि कांग्रेस को भंग कर दिया जाए लेकिन-



लैरी कालिन्स दामिनिक लैपियर की पुस्तक'आधी रात की आजादी' के कुछ अंशों के माध्यम से आप देश की आजादी की नींव की नियति पर शायद पहुंच जाएं.



" नेहरु का सच्चा स्वरुप "




कैम्ब्रिज में उनके सहपाठियों की मंडली इतनी ऊंची थी कि उनमें से आज कोई प्रधानमंत्री बना था,कोई वायसराय,कोई महामना सम्राट के पद तक पहुंचा था,तो कोई जेल का अधिकारी . बंकिघम पैलेस के सोने की थाल में भोजन कर चुके थे. जिसमें वह भोजन भी हुआ करता था जो हिन्दू मुसलमानों के लिये निषिद्ध था.सात सालों में उन्होने इंग्लैण्ड का इतना कुछ ग्रहण कर लिया कि जब वे भारत लौटे तो यहां उनके रिश्तेदारों और दोस्तों ने देखा कि वह बुरी तरह अभारतीय हो चुके हैं.वे स्तब्ध रह गये जब एक स्थानीय ब्रिटिश क्लब में सदस्यता प्राप्त करने की उनकी अर्जी खारिज कर दी गयी.इसी घटना ने उन्हें गांधी के निकट लाकर खड़ा कर दिया.(पृष्ठ 77)




जवाहर लाल ने खादी पहनने को तो पहन ली थी लेकिन अपने सफेद टोपी के नीचे वह चुपचाप इंग्लिश जेण्टलमैन बने हुये थे. इस रहस्य को समझना आज भी मुश्किल है कि भारत जैसे नितान्त धार्मिक देश ने जवाहर लाल नेहरु जैसे नितांत अधार्मिक व्यक्ति के हाथों में अपनी बागडोर सौप कैसे दी?



लार्ड माउन्ट बेटन को जवाहर लाल की सांस्कारिता और मृदुता तुरन्त भा गई.वे जान गये कि जवाहर लाल अंतार्राष्ट्रीय महत्वाकांक्षाओं का व्यक्ति है.आजाद होने के बाद भारत कामनवेल्थ की सदस्यता ग्रहण करने में नेहरु से पूरी सहायता मिलने की सम्भावना है.नोवाखाली में गांधी जी के भटकने के प्रति नेहरु की तीखी प्रतिक्रिया को समझते ही माउण्ट बेटन नेहरु को सबसे उपयोगी व्यक्ति समझने लगे . ( पृष्ठ 77-78)



यदि देश के विभाजन का फैसला करना पड़ गया तो इसमें सबसे बड़ी बाधा बनेंगे महात्मा गांधी.उनकी शक्ति को नाथने का सिर्फ एक तरीका होगा कांग्रेस के नेताओं का उनके साथ तीव्र मतभेद करा दिया जाय.यदि इस सीमा तक जाना ही पड़ गया,तो जवाहर लाल नेहरु से अमुल्य सहायता मिलने की पूरी सम्भावना है.लार्ड माउण्ट बेटन को जवाहर लाल अपने आदमी जैसे महसूस हो रहे थे.कांग्रेस पार्टी में कम से कम एक आदमी तो अपना होना ही चाहिए .जवाहर लाल का व्यक्ति अवश्य ऐसा है कि उन्हें महात्मा के विरुद्ध खड़ा किया जा सकता है.वशीकरण अभियान का जादू सर्वाधिक यदि किसी पर चल सकता है,तो जवाहर लाल नेहरु पर लार्ड माउण्ट बेटन ने उस कश्मीरी ब्राह्मण को वश में करने के लिये अपनी अधिकतम क्षमताओं को काम पर लगा दिया.यहां तक कि ऐडविना बेटन को भी.(पृष्ठ 80-81)



नेहरु ने कांग्रेस को देश व गांधी के सम्मान से निकल कर सत्ता लोभ में लिप्त कर दिया था.एक ओर देश साम्प्रदायिक आग में झुलस रहा था दूसरी ओर गांधी को छोंड़ अधिकांश कांग्रेसी नेहरु के साथ अंग्रेज अधिकारियों की पार्टियों प्याले से प्याले टकरा रहे थे.लार्ड माउण्ट बेटन के विभाजन योजना के दस्तावेज पर पं जवाहर लाल नेहरु,पटेल,आचार्य कृपलानी,मु,अली जिन्ना,लियाकत अली,रबनिरस्तर तथा बलदेव सिंह हस्ताक्षर कर चुके थे.परेशान हो 03जून1947को गांधी को तीखी प्रतिक्रिया देनी पड़ी-कांग्रेस को समाप्त करो.जिसकी सार्वजनिक घोषणा वे 4जून की प्रार्थना सभा मेँ करने वाले थे.4जून को पटेल नेहरु तो उनके सामने आने की हिम्मत नहीं जुटा पाये,वायसराय को गांधी के पास भेज दिया.


उस चार जून को गांधी अपने उद्गार सार्वजनिक न कर पाये लेकिन इस 4 जून दूसरी आजादी के लिए अन्ना के सहयोग से बाबा रामदेव विदेशी कठपुतली कांग्रेस की सरकार की मौजुदगी में अनशन पर बैठे लेकिन....यह काग्रेस.....?!


कमबख्त यह देश की जनता कब जागेगी और पारदर्शिता की क्रान्ति में मददगार बनेगी ?पर्दे के पीछे का कांग्रेसी सच कब जनता जानना चाहेगी?सुभाष सम्बन्धी ,नेहरु व वायसराय मध्य वार्ता सम्बन्धी,लाल बहादुर शास्त्री की मृत्यु सम्बन्धी,आदि सम्बन्धी दस्तावेज गायब करवाने वाले कौन थे औ क्योँ?


आओ अन्ना व बाबा के आन्दोलन के इस वक्त कम से कम विचारों का आदान प्रदान ही करें.सन2012-2020ई का समय बदलाव का समय है,आओ हम भी खुद को बदल देश हित में कुछ योगदान जरुर देँ.



अपने लिए जिए तो क्या जिए.

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