गुरुवार, 9 जून 2011

भ्रष्टाचार व काला धन ��े मुद्दे पर आन्दोलन म���ं मुस्लिम भूमिका ?

' सन 2012-20ई0 बदलाव समय ' का ' बिगुल समय सन 2011ई0 ' पर बाबा रामदेव व अन्ना हजारे के आन्दोलन के साथ देश में जन जन तक भ्रष्टाचार के खिलाफ व काला धन मंगवाने की मांग सम्बन्धी आवाज पहुंची है . रक्षामंत्री एके एंटनी तक को अब कहना पड़ा है कि पारदर्शिता की क्रान्ति अब कोई नहीं रोक पायेगा.कोई इसके लिए तैयार नहीं है .इसी का नतीजा है कि समस्याएं पैदा हो रही हैं.दुनिया में दो प्रतिशत व्यक्ति ही हमेशा क्रान्ति के लिए आगे आये हैँ.अब सवाल उठता है-देश के अन्दर चल रहे इन आन्दोलनों में भारतीय मुस्लिम आबादी का क्या योगदान है?क्या दो प्रतिशत मुसलमान व्यक्ति भी इन आन्दोलनों में सहयोग कर रहा है ? यदि नहीं तो क्या यह विचारणीय विषय नहीं है?क्या मुसलमान इस देश में भ्रष्टाचार व काला धन सम्बन्धी आन्दोलनों में कोई रुचि नहीं रखते ?क्यों आखिर क्यों ?ऐसा क्यों ? भ्रष्टाचार के सामने व काला धन मंगाने की मांग के सामने मूक दर्शक बने क्या देशद्रोही नहीं हैं? यदि लक्ष्य समाज व मनुष्यता के लिए हैं तो हमें दुश्मन तक के ऐसे लक्ष्य में मदद करनी चाहिए. मुसलमानों को क्यों नहीं अन्ना व बाबा के आन्दोलन में मदद करना चाहिए ?अन्ना व बाबा के आन्दोलन का प्रथम समर्थन करने वालों को यदि मुसलमान अपने अपोजिट मानते हैं तो इसका मतलब यह नहीं कि अन्ना व बाबा उनके पक्ष के हो गये हैं व उनका आन्दोलन मुसलमानों के विरोध में है?उनके आन्दोलन की सफलता से देश के सभी नागरिकों का लाभ नहीं क्या ? लाभ उन्हीं को नहीं जो भ्रष्टाचार व कुप्रबन्धन में हिस्सेदार हैं ?और फिर मुसलमान का मतलब है -'अपने ईमान पर पक्का होना '. ईमान पर पक्का होने का मतलब क्या अपनी जाति या सम्प्रदाय के लिए ही सिर्फ कर्म करना है ? गैरजाति व गैरसम्प्रदाय के हित मेँ क्या अन्याय व शोषण का विरोध नहीं करना चाहिए ?


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