बुधवार, 8 जून 2011

विपक्ष के बिना जनान्��ोलन :विपक्षी दलों को आत्मसाक्षात्कार करने ���ी जरुरत

विभिन्न भविष्यवाणियों के द्वारा निर्धारित बदलाव समय सन 2012-2020ई0 का आधार वर्ष सन 2011 ई0 विश्व में घटने वाली जनान्दोलन सम्बन्धी घटनाएं अनेक तथ्यों को उजागर कर रही हैं.एक तथ्य है -इन जनान्दोलनों में विपक्षी दलों की भूमिका .विपक्षी दलों की भी नियति क्या है?वे भी सत्तावादी मानसिकता से लिप्त हैं.उन्होनें भी सत्ता में आकर जन अरमानों को रौंदा है .




विनीत नारायण दैनिक समाचार पत्र अमर उजाला,बरेली ,वृहस्पतिवार,02जून2011 के पृष्ठ बारह पर अपने लेख 'बदलाव का दौर' में लिखते हैं " लोकतन्त्र मेँ सत्ता परिवर्तन जनता के वोट के जरिये होता है.विपक्ष जनांदोलनों द्वारा सत्तारुढ़ दल की खामियों को जनता के सामने उजागर करता है और विकल्प पेश करता है.ऐसा अतीत में आजादी के बाद से कई बार हुआ है,चाहे वह आपातकाल के बाद जनता पार्टी की सरकार रही हो,चाहे राजीव गांधी के बाद विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार हो या पीवी नरसिंह राव के बाद एचदी देवगौड़ा या अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार . लेकिन इस बार के जनांदोलनों में विपक्षी पार्टियों की भूमिका ज्यादा दिखाई नहीं दे रही है. इसके बजाय अन्ना हजारे और बाबा रामदेव जैसे गैरराजनीतिज्ञ लोगों के हाथ में ही आम लोगों की लगाम दिखाई दे रही है.जाहिर है,इन लोगों का उद्देश्य सत्ता प्राप्त करना नहीं है.इस लिहाज से देखें,तो इस बार के ये जनांदोलन सत्तारुढ़ दल के परिवर्तन के नहीं,बल्कि विपक्ष के बदलाव के लग रहे हैं.जो पार्टियां एवं चेहरे इस समय विपक्ष में दिखाई दे रहे हैं,हो सकता है कि आने वाले समय में उनका स्थान कोई और ले ले ."



विपक्ष जनता की आवाज को निष्पक्ष रुप से उठाने में असफल रहा है. रोज मर्रे में आने वाली आम आदमी के दिल की आवाज को विपक्ष ईमानदारी से उठाना नहीं चाहता.देखा जाए तो कोई भी पार्टी आम आदमी की कसौटी पर खरी नहीं उतरी है.जिन तथ्यों का विपक्ष विरोध करता है,सत्ता में आने पर उन्हीं तथ्योँ का समर्थक हो जाता है या सत्ता रहते जिन तथ्यों को समर्थन होता है,विपक्ष में आने पर उन्हीं तथ्यों के आधार पर सत्ता का विरोध करता है.जनान्दोलन राजनैतिक दलों या व्यक्तियों के हाथों से निकल कर गैरराजनैतिक दलों या व्यक्तियों के हाथों जाना राजनैतिक दलों व व्यक्तियों के कमजोरियों को दर्शाता है .



01.00AM, 05 जून 2011ई0 रामलीला मैदान दिल्ली में बाबा रामदेव व उनके समर्थकों के द्वारा दिल्ली प्रशासन के द्वारा की गये अत्याचार प्रजातन्त्र पर लगे कलंक के बाद जरुर विपक्ष का रवैया बदला है.लेकिन काले धन को वापस देश में मंगाने व भ्रष्टाचार के विरोध में लगे बाबा रामदेव व अन्ना हजारे के समर्थन में आये दलों के विरोध में हैं यदि हम तो इसका मतलब यह नहीं कि बाबा रामदेव व अन्ना हजारे के मिशन को पीछे धकेला जाए और समर्थन न किया जाए ?धन्य!काला धन व भ्रष्टाचार की बात करने वाले साम्प्रदायिक हैं ?भ्रष्टाचार के खिलाफ व काला धन मंगाने की बात करने वालों पर दमनचक्र कार्रवाही करने वाले गैरसाम्प्रदायिक व देशभक्त हैं?धन्य,भारत का तन्त्र व तुष्टीकरण करने में माहिर नेतातन्त्र...! ?




< samajikata ke dansh : मानवाधिकारों व सार्वभौमिक ज्ञान पर सामाजिकता का दबाव : samajikata ke dansh >

कोई टिप्पणी नहीं: