शुक्रवार, 22 मार्च 2013

होली पर विशेष:व्रत व दिवसोँ का महत्व

जो हमसे दूर है या दूर जा रहा है उसका स्मरण कराते हैँ पर्व/दिवस .व्रत
का मतलब है -संकल्प या प्रतिज्ञा.संकल्प या प्रतिज्ञा कैसी व क्या?हम
पूरी जिन्दगी भूख , प्यास ,सेक्स आदि की पूर्ति व निर्जीव संसाधनोँ को
जुटाने मेँ लगे रहते हैँ.जिसके लिए हम प्रकृति का अति विदोहन तक के लिए
तैयार रहते हैँ.अपना व दूसरोँ का शरीर तक विकारयुक्त कर बैठते हैँ.तो ऐसे
मेँ संकल्प व प्रतिज्ञा क्या?


व्रत /दिवस व पर्व हमेँ व समाज को सुधारने के लिए होते हैँ व अपने
पूर्वजोँ के मूल्योँ को स्मरण के लिए लेकिन हम व समाज कितना सुधर रहे
हैँ?होली पर्व को ही लो,हम होली पर्व से अपने जीवन को क्या साधते
हैँ?क्या संकल्प व प्रतिज्ञा लेते हैँ?पर्व के नाम पर भी प्रकृति से
खिलवाड़.इससे तो अच्छे है संयुक्त राष्ट्र के पर्व जो प्रकृति के खिलाफ
कार्य नहीँ करवाते , प्रकृति विदेहन नहीँ करते.

--
संस्थापक <
manavatahitaysevasamiti,u.p.>

गुरुवार, 7 मार्च 2013

SAMAJIKATA KE DANSH !: 08मार्च2013 : क्या है औरत?

SAMAJIKATA KE DANSH !: 08मार्च2013 : क्या है औरत?

08मार्च2013 : क्या है औरत?

औरत के इतिहास की शुरुआत कहाँ से होती है ?हिन्दू मत के अनुसार औरत के
इतिहास की शुरुआत श्री अर्द्धनारीश्वर स्वरुप के प्रकटीकरण से होती है
,गैरहिन्दू मत के अनुसार हजरत आदम के बायीं पसली से उत्पन्न हजरत हब्बा
से होती है ?वाम गुण धारी ही औरत है .
औ+रत;औ अर्थात and या also और या अन्य ,रत अर्थात लीन ,इस प्रकार -'अन्य
मेँ रत'. स्व अर्थात परमात्मा या आत्मा के अतिरिक्त अन्य मेँ लीन,पर मेँ
लीन ,प्रकृति मेँ लीन.औरत है तो आदम या शिव का ही अंश लेकिन आदम या शिव
तो स्व या परमात्मा या आत्मा मेँ लीन लेकिन औरत प्रकृति मेँ लीन अर्थात
प्रकृति भी .अन्य भी अर्थात सत के सिवा अन्य भी अर्थात अनन्त के सिवा
अन्य भी . स्त्री ;स त्र ई -त्र गुण सहित अर्थात तीनोँ गुण सहित या जो
प्रकृति तीनोँ गुणधारी . जो शिव या आदम के साथ दृश्य मेँ अस्तित्ववान है
,सम-सम्मान है,सम अस्तित्व मेँ है ,सम भोग मेँ है ,शिव या आदम का पार्वती
या हब्बा का सम अस्तित्व या संतुलन या सम्बंध (समबंध)ही सृष्टि है.
स्त्री के तीन रुप हैँ,प्रकृति,स्त्री स्थूल शरीर व सूक्ष्म स्त्री
शरीर.विभिन्न शरीर स्तरोँ -स्थूल ,भाव ,सूक्ष्म ,मनस ,आत्म ,ब्रह्म
,निर्वाण मेँ से प्रथम चार स्तर -स्थूल ,भाव ,सूक्ष्म व मनस ही स्त्री या
पुरुष है .स्त्री का स्थूल व सूक्ष्म शरीर पुरुष होता है .पुरुष का स्थूल
व सूक्ष्म शरीर पुरुष होता है .स्त्री का भाव व मनस शरीर पुरुष होता है
तथा पुरुष का भाव व मनस शरीर स्त्री होता है .महामिलन कब होता है ?सम भोग
कब होता है ? सम अस्तित्व कब होता है ?सम सम्मान कब होता है ?जब पुरुष को
अपने भाव व मनस शरीर की स्त्री समाज मेँ मिल जाती है व जब स्त्री को अपने
भाव व मनस शरीर का पुरूष समाज मेँ मिल जाता है .आज दाम्पत्य जीवन टुटने
या कलह का कारण इसका न होना ही है .स्त्री के गुण या स्त्रैणता है दया
,करुणा ,सेवा ,मानवता ,ममता,स्नेह आदि है .




--
संस्थापक <
manavatahitaysevasamiti,u.p.>

रविवार, 3 मार्च 2013

होनहार गरीब,ग्रामीण युवा व भूमिहीन परिवार ....कबतक रखेँ सरकार पर आस?

एक ओर कुछ जातियां व मजहब सरकारीआरक्षण की उम्मीदोँ पर टिक अपनी अन्दरुनी
प्रतिभा जागरण हीनता,जातिहीनता
,सम्प्रदायकिताहीन,कूपमण्डूकता,मनमानी,स्वाबलम्वन हीनता,
आत्मनिर्भरताहीन,आत्मविश्वासहीन आदि मेँ ही बने रहना चाह भ्रष्टतंत्र का
हिस्सा बनना चाहते हैँ या बने हुए हैँ . वहीँ दुसरी ओर प्रतिभावान
,ईमानदार,कर्त्तव्यशील,ज्ञानवान ,सत्यान्वेषणी,जातिविरोधी
,पंथविरोधी,कानून व्यवस्था प्रेमी आदि को सरकारेँ अनुकूल वातावरण नहीँ दे
पा रही हैँ.साक्षर व शिक्षित भी अज्ञानी व लापरवाह बने हुए
हैँ.जातितंत्र,मजहबतंत्र,मनमानी,भ्रष्टाचार,कुप्रबंधन आदि हाबी है .गरीबी
बढ़ती जा रही है .बेरोजगारी बढ़ रही है .खाद्यमिलावट व नकलीदवाईयोँ का जोर
है . स्वास्थ्य व शिक्षा का स्तर सुधरने का नाम नहीँ ले रहा है .पर्यावरण
बिगाड़ने का कार्य तेजी से चल रहा है.सरकारेँ भूमिहीन मजदूरोँ ,गरीब
होनहारोँ ,ग्रामीण युवाओँ ,जातिवाद व सम्प्रदाय विरोधी युवकयुवतियोँ ,देश

पर्यावरण शुभचिंतकोँ आदि की सुरक्षा व विकास के लिए साहस नहीँ दिखा पा रही हैँ .



मैँ देख रहा हूँ कि देश मेँ होनहारोँ की कमी नहीँ है लेकिन उन होनहारोँ
के सामने अनेक समस्याएं बनी हुई हैँ .एक ओर बिगड़े माँ बाप की बिगड़ी
औलादेँ अपना उपद्रव फैलाए हुई हैँ वहीँ दूसरी ओर होनहार अपने माँ बाप या
अपने परिवार की ओर से ही समस्याग्रस्त हैँ.उत्तरखण्ड मुक्त विश्वविद्यालय
के प्रोफेसर गोविन्द सिँह कहते हैँ कि आईआईटी और आईआईएम की हालिया फीस
बढ़ोत्तरी के साथ ये श्रेष्ठ संस्थान मध्यम वर्ग के मेधावी छात्रोँ की
पहुँच से और दूर चले गए हैँ.मैँ शिक्षा जगत से जुड़ा हूँ .देखता रहता हूँ
कि गरीब व मध्यम वर्ग के होनहार कैसे हालातोँ की मार सह अपनी प्रतिभा से
समझौता कर लेते हैँ .डाक्टर ,इंजिनियर आदि का सपना देखने वाले इण्टर
क्लास मेँ आते आते ट्यूशन पढ़ाने के कार्य से भी जुड़ जाते हैँ .ऐसा होना
चाहिए जहाँ होनहार गरीब भी आगे बढ़ सकेँ .


ग्रामीण बालको युवकोँ को ध्यान मेँ रख कर सरकार अपने फैसले ईमानदारी
से नहीँ लेती .पंकज चतुर्वेदी राष्ट्रीय सहारा मेँ लिखते हैँ कि गांवोँ
मेँ आज ग्रेजुएट या पोस्ट ग्रेजुएट डिग्रीधारी युवकोँ के बजाए मध्यम स्तर
तक पढ़े लिखे और कृषि तकनीक मेँ पारंगत श्रमशील युवाओँ की भारी जरुरत है
.वहां खेती पशुपालन ग्रामीण प्रबंधन के प्रायोगिक प्रशिक्षण संस्थान
खोलना उपयोगी होगा .


देश मेँ लाखोँ दलित ,गरीब आदि ऐसे हैँ जो भूमिहीन हैँ .गाँव मेँ अब भी
दबंगोँ की ही चलती है .कमजोर ,सीधे ,अकेले आदि व्यक्ति ,विधवाओँ आदि की
पोजीशन भयानक बनी हुई है.अनेक भूमियां ऐसी है जिसका लाभ उसके मालिक न उठा
कर दबंग उठा रहे हैँ.


आखिर कब तक सिर्फ कागजी आँकड़ोँ तक सरकारी तंत्र सक्रिय रहेगा?देश मेँ
लाखोँ लोग हैँ जिन्हेँ पट्टे पर भूमि कागजी आँकड़ोँ के आधार पर दे दी गयी
है लेकिन व्यवहारिक स्तर पर नहीँ .जनजातिय व वनबासियोँ की भूमियोँ पर भी
दबंग हावी हैँ .


क्या क्या बताऊँ ? देश हर ओर से बीमार चल रहा है .स्वास्थ्य विभाग ही
जब बीमार है ,शिक्षा जगत ही जब सत्यान्वेण व ईमानदार शिक्षकोँ से दूर
होता जा रहा है ,पुलिस तंत्र ही गैरकानूनी कार्य मेँ जब लिप्त है आदि आदि
.तो क्या कहूँ ?कब तक कहूँ ?

--
संस्थापक <
manavatahitaysevasamiti,u.p.>