शुक्रवार, 12 अक्तूबर 2012

21 अक्टूबर 1943 : सिंगापुर मेँ भारत की अस्थायी सरकार

मीरानपुर कटरा (शाहजहांपुर) ,नेता जी सुभाष चंद्र बोस की मृत्यु सन
1945ई0मेँ वायुयान दुर्घटना मेँ नहीँ हुई थी ,ऐसा मुखर्जी आयोग की
रिपोर्ट मेँ भी कहा जा चुका है .सन 1945 के नेता जी के जीवन पर पर्दा
डालने वाली कांग्रेस खामोश क्योँ है ?

उपर्युक्त विचार यहाँ सम्पन्न हुई एक विचारगोष्ठी मेँ रखते हुए
मानवता हिताय सेवा समिति के संस्थापक अशोक कुमार वर्मा 'बिन्दु' ने कहा
कि कभी न कभी कांग्रेस को जनता के सवालोँ का जवाब देना ही पड़ेगा ?क्या
भारत अब भी ब्रिटेन के औपनिवेशिक देशोँ के संगठन मेँ शामिल नहीँ है ?यदि
शामिल है तो फिर वह इस संगठन मेँ अभी तक देश को क्योँ शामिल किए बैठे
हैँ?नेहरु व बेटन समझौता को कांग्रेस उजागर क्योँ नहीँ करना चाहती है
?सुभाष व शास्त्री की मृत्यु सम्बंधी दस्तावेज सार्वजनिक क्योँ नहीँ किए
जा रहे हैँ ?अमेरीका द्वारा ओशो को थेलियम दिए जाने के वक्त क्या
कांग्रेस अमेरीका के दबाव मेँ न थी?


आजाद हिन्द सरकार के स्थापना दिवस के उपलक्ष्य मेँ सम्पन्न इस विचार
गोष्ठी मेँ उन्होने बताया कि आम जनता व प्रजातंत्र के हित मेँ देश की
आजादी काफी दूर है .आजादी के पैँसठ साल होने के बाबजूद भी अभी कुछ मुट ठी
भर लोगोँ के हाथ मेँ देश की सत्ता व शक्तियां मौजूद हैँ .लैरी कालिन्स
दामिनिक लैपियर ,अबुल कलाम आजाद ,सरस्वती कुमार ,जयगुरुदेव ,भारतीय सुभाष
सेना आदि की माने तो देश को आजादी भ्रष्टाचार व सत्तालोलुपता की नीँव पर
मिली मात्र सत्ता हस्तान्तरण थी .लैरी कालिन्स दामिनिक लैपियर की पुस्तक
'आधी रात को आजादी' , अबुल कलाम आजाद की पुस्तक'इण्डिया विन्स फ्रीडम' और
काशी के सरस्वती कुमार की पुस्तक'सलीब पर एक और ईशा' आदि पुस्तकोँ मेँ
देश की आजादी व विभाजन को एक काला अध्याय ही माना गया है . असली सरकार तो
21 अक्टूबर 1943 को नेता जी सुभाष चंद्र बोस के द्वारा सिँगापुर मेँ
स्थापित की गयी थी ,हालांकि जो अस्थाई थी लेकिन आम जनता का हित उसी मेँ
निहीत था .


सिंगापुर मेँ भारत की अस्थायी सरकार गठित करने के बाद नेताजी सुभाष
चंद्र बोस ने 'दिल्ली चलो'का नारा दिया था.उन्होने सिंगापुर तथा रंगून
मेँ सेना के दो मुख्यालय स्थापित किए थे.महात्मा गांधी को 'राष्ट्रपिता'
नाम सुभाष जी ने इसी वक्त गांधी से आशीर्वाद मांगते हुए 'जय हिन्द' का
नारा देने के साथ दिया था.उनके व उनकी सेना की राष्ट्रीयता तथा वीरता को
कलंकित करके नहीँ देखा जा सकता.वहीँ दूसरी ओर देश के कुछ नेता अंग्रेजोँ
की चापलूसी मेँ लगे थे .?देश की आजादी के वक्त सत्तालोभी नेता जहाँ
दिल्ली मेँ अंग्रेजोँ के साथ जाम से जाम लड़ा रहे थे सम्भवता ? वहीँ दूसरी
ओर महात्मा गांधी दिल्ली से बाहर आम गरीब जनता के बीच थे,जो साम्प्रदायिक
आग मेँ उलझी थी .सरस्वती कुमार के अनुसार गांधी की हत्या के पीछे ये
सत्तालोभी लोग भी थे,जिन्होने गांधी को अकेला छोड़ दिया था .लोहिया ने भी
लिखा है कि आजादी के वक्त गांधी अकेले पड़ चुके थे .


सरस्वती कुमार लिखते हैँ -"मुझे पूर्ण विश्वास है जब तक भारत राष्ट्र
इस परिवार के चंगुल से अपने को अलग नहीँ कर लेता तब तक राष्ट्र को सही
दिशा नहीँ मिल सकती.इस परिवार के लोगोँ को अपने नाम के आगे गांधी शब्द
लिखना सबसे बड़ा धोखा है जबकि इन्हेँ गांधी शब्द का उच्चारण भी नहीँ करना
चाहिए . "

इस अवसर पर खुशीराम वर्मा ने कहा कि 'आम जनता की आजादी' अभी काफी
दूर है .हालांकि इसको पाने के लिए पहला कदम रखा जा चुका है .नेहरु व नकली
गांधी परिवार की असलियत अब इण्टरनेट सोशल मीडिया मेँ उजागर होने ही लगी
है .बस,अब उसको जमीन पर उतरना है .सच्चे देशभक्तोँ को आगे बढ़ाना है जो आम
आदमी के हित मेँ जाकर देश मेँ सुप्रबंधन ला सके व न्याय की व्यवस्था
,सेवाभाव ,श्रम आदि को महत्व दे सके .


विचारगोष्ठी का संचालन सत्यम विद्यार्थी व अध्यक्षता अशोक कुमार वर्मा
'बिन्दु' ने की .

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