रविवार, 7 अक्तूबर 2012

17 अक्टूबर 1940 : सविनय अवज्ञा आन्दोलन के समय ?

सितम्बर1939ई0को द्वितीय विश्वयुद्ध दैत्य रुप मेँ आया.कांग्रेस ने
जुलाई 1940मेँ ब्रिटिश सरकार के समक्ष यह माँग रखी कि अगर सरकार केन्द्र
मेँ भारतीयोँ को लेकर एक ऐसी सरकार बना दे,जो विधानसभा के प्रति
उत्तरदायी हो और सरकार युद्ध के पश्चात भारत को स्वाधीनता प्रदान करे तो
कांग्रेस युद्ध मेँ सरकार को सरकार को सहयोग दे सकती है लेकिन ब्रिटिश
सरकार ने इसका समर्थन नहीँ किया. भारतियोँ को संतुष्ट करने के लिए
वायसराय लिनलिथियो ने आठ अगस्त 1940 को अपना 'अगस्त प्रस्ताव' प्रस्तुत
किया. कांग्रेस ने यह प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया क्योंकि वह देश की
स्वतंत्रता व अपनी सरकार की मांग कर रही थी और फिर अगस्त प्रस्ताव मेँ
अल्पसंख्यको को जरुरत से ज्यादा महत्व प्रदान किया गया था.सन1939 से 1945
तक चलने वाले द्वितीय विश्व युद्ध मेँ जो परिस्थितियां बनी उसी के
फलस्वरुप इंग्लैण्ड मेँ सत्ता परिवर्तन हुआ.इधर मुस्लिम लीग और कांग्रेस
के बीच कड़ुवाहट अपनी उच्चता पर थी.देश के अनेक हिस्सोँ मेँ साम्प्रदायिक
दंगे हो रहे थे.देश का वायसराय था लार्ड बावेल.उसका कहना था कि आजादी
देने के पहले साम्प्रदायिक गुत्थी को सुलझा लेने दिया जाय.अगर इस समय
सत्ता का हस्तान्तरण हुआ तो साम्प्रदायिक आग मेँ भारत को झोँकने का कलंक
ब्रिटिशसरकार पर लगेगा.ब्रिटिश प्रधानमंत्री एटली से मतभेद के मद्देनजर
बावले ने त्यागपत्र दे दिया .24मार्च को लार्ड माउण्टबेटन भारत आया जिसे
आदेश मिला था कि 30जून 1948 तक भारत मेँ सत्ता का हस्तान्तरण हो जाय.लंदन
के लिए उड़ान भरने से पूर्व जो फाइल लार्ड बावेल ने लार्ड माउण्टबेटन को
चार्ज मेँ दी थी उस फाइल के मुखपृष्ठ पर लिखा था-'आपरेशन मैडहाउस'यानी
पागलखाने का अभियान.लार्ड माउण्टबेटन ने फाइल के कवर को बदल दिया और उस
पर लिख दिया-'वशीकरण अभियान'अर्थात आपरेशन सीडक्सन.(पृष्ठ 05,सलीव पर एक
और ईशा)
वशीकरण किस पर? पहले नेहरु पर फिर पटेल पर ?'सलीव पर एक और ईशा' पुस्तक
लिखने वाले सरस्वती कुमार का कहना है -देश मेँ वर्तमान समस्याओँ की जड़
'नेहरु माउण्टबेटन पैक्ट' है.

खैर!17 जनवरी 1941 को सुभाष चुपचाप जर्मनी रवाना हो चुके थे .जहाँ बर्लिन
मेँ एक भारतीय सैन्य दल का गठन किया था . 08आगस्त 1940 को प्रस्तुत आगस्त
प्रस्ताव को कांग्रेस अस्वीकार कर चुकी थी .इस समय की कांग्रेस व सन 1947
के बाद की कांग्रेस मेँ अन्तर है. क्या वास्तव मेँ अंतर है ?नरम दल वाले
क्या सभी जनहित के न होकर सत्ता के हित मेँ नहीँ थे ?1938-1939 मेँ
कांग्रेस अध्यक्ष सुभाष चंद्र बने थे परन्तु इन नरम दलियोँ या कहेँ की
सत्ता के चापलूसोँ के वशीभूत लोगोँ से घिरे गांधी जी के विरोध करने पर
सुभाष को अध्यक्ष पद से त्यागपत्र देना पड़ा,फारवर्ड ब्लाक की स्थापना
करनी पड़ी .ये नरम दली तो द्वितीय विश्वयुद्ध मेँ ब्रिटेन सरकार की ही
मदद करना चाहते थे. जनता मेँ प्रिय बने रहने की नीति के कारण ये लोग जन
लुहावने कार्य करते रहे लेकिन सन 1885 मेँ कांग्रेस की स्थापना का
उद्देश्य क्या था? एक पुस्तक लिखती है कि यह आन्दोलन केवल थोड़े से
शिक्षित मध्यवर्गीय बुद्धिजीवी वर्ग तक ही सीमित था,जो पाश्चात्य
उदारवादी और अतिवादी विचारधारा से प्रेरणा लेता था.मेरा अपना निजी विचार
यही है कि ये राष्ट्रवादी व आन्दोलनकारी सिर्फ जनता की नजर मेँ भला दिखने
के लिए थे.जिनमेँ अंग्रेजीयत की बू थी.कांग्रेस मेँ नरमदलीय नीतियोँ के
खिलाफ 1895से ही असंतोष व्यक्त किया जाने लगा था.बनारस कांग्रेस मेँ
प्रिंस आफ वेल्स (जार्ज पंचम) के स्वागत पर कांग्रेस दो फाड़ हो गयी थी
.तिलक ने कांग्रेस को 'चापलूसोँ का सम्मेलन' कहा था.सन1928मेँ कांग्रेस
के द्वारा पेश संविधान प्रारुप 'नेहरु रिपोर्ट' पर विचार विमर्श के लिए
लखनऊ व दिल्ली मेँ सर्वदलीय सम्मेलनोँ मेँ कांग्रेस का वामपंथी युवा वर्ग
जिसका नेतृत्व नेहरु व सुभाष कर रहे थे और जो औपनिवेशिक स्वतंत्रता से
संतुष्ट नहीँ थे,ने पूर्ण स्वतंत्रता की मांग को कांग्रेस का उद्देश्य
बनाना चाहा था.लेकिन सन 1947-48 औपनिवेशिक स्वतंत्रता को न चाहने वाला
नेहरु क्या बदल गया?15अगस्त1947को सत्ता हस्तान्तरण के बाद भी क्या
ब्रिटेन का औपनिवेशिक राज्य नहीँ है?आखिर देश की आजादी व नेहरु माउण्टन
पैक्ट,सुभाष सम्बंधी दस्तावेज आदि सार्वजनिक क्योँ नहीँ किये जा रहे
?वर्तमान मेँ सुभाष सेना के लोग अब भी देश ब्रिटेन का औपनिवेश मान रहे
हैँ व देश की आजादी को मात्र सत्तापरिवर्तन दिवस मानते हैँ .डा.भीमराव
अम्बेडकर लिखते हैँ-" भारत मेँ आजादी का जो कोलाहल मचा है,उसमेँ यदि कोई
हेतु है तो वह है अछुतोँ का हेतु.हिन्दुओँ और मुसलमानोँ की लालसा
स्वाधीनता की आकांक्षा नहीँ है .यह तो सत्ता संघर्ष है,जिसे स्वतंत्रता
बताया जा रहा है .....कांग्रेस मध्यमवर्गीय हिन्दुओँ की संस्था है,जिसको
हिंदू पूंजीपतियोँ का समर्थन प्राप्त है,जिसका लक्ष्य भारतीयोँ की
स्वतंत्रता नहीँ,बल्कि ब्रिटेन के नियंत्रण से मुक्त होना और वह सत्ता
प्राप्त कर लेना है,जो इस समय अंग्रेजोँ की मुटठी मेँ है.(अध्याय दो,बाबा
साहेब डा.अम्बेडकर सम्पूर्ण वांग्यमय ,खण्ड 17)". द्वितीय विश्व युद्ध
मेँ कांग्रेस ब्रिटिश सरकार का सहयोग करना चाहती थी लेकिन नेता जी सुभाष
चंद्र बोस का विचार इसके विपरीत था.सुभाष का मानना था कि ब्रिटेन की
समस्या से फायदा उठाया जाये .स्वयं बुलाये गये समझॉता विरोधी सम्मेलन मेँ
उन्होँने कांग्रेस के ब्रिटिश सहयोग की आलोचना की.जनता के बीच कांग्रेस
की साख गिरने लगी.जिससे बचने के लिए कांग्रेस को सविनय अवज्ञा आन्दोलन
शुरु करना पड़ा.प्रथम सत्याग्रही विनोवा भावे हुए.जिसमेँ नेहरु भी शामिल
हुए.केवल उत्तर प्रदेश मेँ ही 20000व्यक्ति गिरफ्तार किए गे परन्तु गांधी
उस समय तक जेल से बाहर ही थे.इधर मुस्लिम लीग ने पाकिस्तान की मांग
प्रस्तुत की.1909मेँ पृथक प्रतिनिधित्व प्राप्त करके,कांग्रेस की नम्रता
और अंग्रेजोँ को प्रोत्साहन प्राप्त कर मुस्लिम साम्प्रदायिकता तीव्रतर
होती जा रही थी .

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