गुरुवार, 1 अप्रैल 2010

शिक्षा का अधिकार:शिक्षा के हकदार कौन?

वाह!शिक्षा का अधिकार का कानून आज से?नई तश्वीर की शुरुआत आज से!अनेक वर्षोँ से सर्बशिक्षा अभियान के नाम से भला हो रहा है?गलत कहते थे हमारे एक सर जी कि सब खाने पीने की स्कीमेँ हैँ?कितनोँ का भला हो रहा है?विश्व बैँक के रुपयोँ से गुलछर्रे उड़ा रहे हैँ,हम का करेँ देश के भविष्य की चिन्ता?मौज आगया ,बीएड़ का किया लाटरी खुल गयी.विशिष्ट बीटीसी से अपुन का भाग्य बदल गया.रुपयोँ के बल पर अच्छे नम्बरोँ से बीएड़ का लाभ मिल गया.डायट मेँ ही एक छोरी पटा ली,डवल का फायदा.अपना काम बनता भाड़ मेँ जाए जनता.रुपये किसे नहीँ प्यारे हैँ?अपनी जेब गर्म बच्चे पढ़ेँ या भाड़ मेँ जाएँ.पढ़ने का शौक नहीँ तो ऐसे मेँ कैसे पढ़ जाये सब बच्चे?हाथ मेँ पाँचवेँ की मार्कशीट होगी स्कूल से निकलते वक्त! और चाहिए भी क्या?हम ही हैँ हर तिगड़म कर अच्छे अंकोँ से मार्कशीटस पाते रहे.हूँ, हम भी.....देखेँ आज अशोका ने क्या लिखा है?यह भी......'शिक्षा के अधिकार: शिक्षा के हकदार कौन?'अरे, यह क्या ?मेरे डायलागस से शुरुआत?अब तो अशोका के सामने बोलना भी धर्म नाय रहाय.का लिखो आज.....






"शिक्षा का हकदार ब्राह्मण (वर्ण व्यवस्था)है .जो ब्राह्मण (कर्म एवँ स्वभाव से) नहीँ,वह कभी क्या ज्ञान के प्रति जिज्ञासु भी हो सकता है? विद्यार्थी वास्तव मेँ कौन हैँ?
विद्या ददाति विनयम् , लेकिन...,?
विनयशील कौन?

मानसिक रुप से विद्यार्थी कौन है?शिक्षा का हकदार विद्यार्थी है लेकिन विद्यार्थी कौन है?तीन
हजार वर्ष पहले माना जाता था कि शिक्षा का हकदार ब्राह्मण है अर्थात विशेष कर्म एवं स्वभाव वाला.जिसका मन अभी तैयार ही नहीँ है शिक्षा प्राप्त करने के लिए उसे शिक्षा देने का क्या औचित्य? अन्य के चाहने से क्या होता है? आज जो चल रहा है,भ्रष्टाचार का कारण यह भी है. ज्ञान के प्रति जिज्ञासा नहीँ,धर्म या मोक्ष के प्रति जिज्ञासा नहीँ.....सिर्फ काम एवं अर्थ मेँ लीन है मन की दिशा -दशा ,उसे शिक्षित करने का मतलब क्या भ्रष्टाचार को बढ़ावा देना?काम व अर्थ को सर्फ मन एवं व्यवहार मेँ जगह देने वाले आज शिक्षित होकर अपराध व भ्रष्टाचार की नई -नई तकनीकी सीख रहे हैँ.जब सिर्फ काम व अर्थ को चाहने वालोँ के हाथ बड़े बड़े शास्त्र सौप दिए जाएंगे तो क्या होगा ?ऐसे मेँ माता पिता एवं बेसिक अध्यापकोँ का दायित्व महत्वपूर्ण है.बेसिक एजुकेशन का प्रमुख उद्देश्य होना चाहिए बालक को विद्यार्थी बनाना.पाचवेँ क्लास की मार्कशीट आने के बाबजूद बालक मेँ शिक्षा के प्रति रूचि नहीँ तो यह विचारणीय विषय है.यहाँ तक आते आते बालक सुपात्र हो जाने चाहिए. शिक्षा का प्रारम्भ सिर्फ अक्षर ज्ञान से नहीँ होना चाहिए.
आज हर व्यक्ति शूद्र हो रहा है.बड़े बड़े शास्त्रोँ को पढ़ने का उद्देश्य जब आज काम व अर्थ है तो क्या परिणाम होगा?13-14वीँ सदी से तथा विशेष रुप से17-18वीँ सदी से जो सोँच पैदा हुई है उसने हमेँ छोड़ो प्रकृति तक को विकारयुक्त कर दिया है.हमारे मन की दशा दिशा तो कहीँ और है,हमेँ लगाया कहीँ और जा रहा है या मजबूरी मेँ कहीँ अन्य जगह. मन वचन कर्म से एक न होना ही भ्रष्टाचार व कुप्रबन्धन का कारण है.

बच्चोँ की इच्छा नहीँ है,बच्चोँ का पढ़ने मेँ मन नहीँ लग
रहा है लेकिन तब भी ....?कहा जा रहा है कि भय बिन होए न प्रीति.हमारी समझ मेँ नहीँ आता है यह.भय व प्रीति दोनोँ अलग अलग भावना हैँ.जहाँ दोनोँ साथ हैँ वहाँ ड्रामा है.
क्या बच्चोँ को रटन्तिविद्या तक सीमित रखना चाहते हैँ?बच्चोँ को भयभीत करके आप क्या प्रदर्शित करना चाहते हैँ?मन मस्तिष्क की परिपक्वता के लिए भी प्रशिक्षण आवश्यक है.
चलो ठीक है शिक्षा अधिकार कानून लेकिन अभी बहुत कुछ तय होना बाकी है.निष्कर्ष यह है कि हमारे मन को भी प्रशिक्षित किया जाना जरुरी है.हमेँ मन- प्रबन्धन को भी सीखना होगा जिसके लिए 'योगमनोविज्ञान' का अध्ययन अनिवार्य किया जाना आवश्यक है.वैज्ञानिक अध्यात्मवाद ,अर्थात आध्यात्मिकता धार्मिकता को प्रयोगोँ व अनुभवोँ से गुजारना आवश्यक है."

धत् !यह पागल अशोका भी,बोलत बच्चोँ के
सामने भी साँस फूलत और लिखन को रोग लगाये बैठो.न जाने क्या क्या लिखता रहता है?मेरी समझ मेँ कुछ आता नहीँ.

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