बुधवार, 14 अप्रैल 2010

सेव अर्थ:बस,अभी कागज, ��ाषण, रंगारंग कार्यक्��म!

यह सत्य है कि संसार की कोई वस्तु एक अवस्था मेँ नहीँ रहती लेकिन हम बुद्धिमान प्राणी हैँ . किसी वस्तु के एक अवस्था मेँ न रहने की प्रक्रिया को धीमा जरुर रख सकते हैँ . पूँजीवादी व्यवस्था सत्तावाद भोगवाद आदि ने हमेँ विचलित किया .अरण्य सहचर्य या प्रकृति सहचर्य की जो व्यवस्था दी गयी थी ,उस पर अवरोध लगते गये . ब्रह्मचर्य ,गृहस्थ, वानप्रस्थ ,सन्यास;इन चारो आश्रमोँ का महत्व अरण्य (प्रकृति)सहचर्य के बिना नहीँ था . जीवन को सुन्दर बनाने के लिए काम ,अर्थ ,धर्म, मोक्ष मेँ सन्तुलन आवश्यक था .जब सिर्फ काम व अर्थ को महत्व बढ़ा तो पूँजीवाद तथा सत्तावाद का भी दबाव बढ़ना प्रारम्भ हुआ . स्वनिर्मित वस्तुएँ बढ़ती गयीँ,प्रकृति सहचर्य टूटता गया,विदोहन व भोग बढ़ता गया ,आदि आदि. अब परिणाम सामने हैँ.हमारे मन विकार युक्त हो ही चुके हैँ,प्रकृति को भी विकार युक्त कर दिया है . हम अपने को नहीँ सुधार सकते तो क्या ?प्रकृति अपना सन्तुलन बैठाएगी ही,जिसमे हमारा विनाश होगा ही.
अब जो प्रलय की प्रक्रिया शुरू हुई है उसके लिए मनुष्य ही दोषी है.लेकिन ब्राह्माण्ड मेँ अनेक पृथ्वियाँ बनती बिगड़ती हैँ . पूरी की पूरी आकाश गंगा विशाल प्रकाश मेँ सिमट कर अपना अस्तित्व खो देती है. यह सत्य है कि संसार की वस्तुएँ एक अवस्था मेँ नहीँ रहती लेकिन प्रकृति की जिस अवस्था को हम अब झेलते जा रहे हैँ उसमेँ रुकावट अवश्य पैदा की जा सकती है .काम व अर्थ मेँ लिप्त होने के कारण मनुष्य ने अपने मन की दशा दिशा बिगाड़ ली है.जिसकी आखिरी हद प्रकृति एवं मानव के विनाश पर जा टिकती है .हम त्याग बलिदान की भावना से मुक्त हो चुके हैँ,क्योँ न हम प्रति वर्ष त्याग बलिदान के पर्व मनाते होँ.हम स्थानीय स्तर पर देखते हैँ कि निज स्वार्थ मेँ मनुष्य कितना गिर चुका है ?जब उनसे बात करो तो वे कुतर्क दे अपना बचाव करते हैँ.वैज्ञानिक आविष्कारोँ के बाद से सत्रहवीँ सदी से जो वातावरण बना उसने हमारी पुरातन सोच को बिगाड़ दिया है कि जो जहाँ जैसा है ,प्रकृति को उसे वैसा रखा जाए.


अपने वैचारिक मित्र सुनील सम्वेदी ,राजेन्द्र प्रसाद शर्मा ,आदि के सहयोग से हम पर्यावरण सन्तुलन, वृक्षारोपण ,जल बचाव ,आदि के लिए जनता को जागरुक करने का प्रयत्न करते रहे हैँ . लेकिन लगता है कि ' सेव अर्थ:जीवन बचाओ'अभियान एक प्रकार का महासंग्राम है .जो त्याग व समर्पण के बिना नहीँ जीता जा सकता. हम देख रहे हैँ कि कैसे कैसे लोग सब कुछ जानने के बाद भी परम्पराओँ के नाम पर या अन्य बहाने या निज स्वार्थ अब भी प्रकृति विदोहन मे लगे रहते हैँ.शासन प्रशासन कुप्रबन्धन व भ्रष्टाचार मेँ संलिप्त हो कर खामोश रह जाता है तथा नेता गण वोटोँ के स्वार्थ मेँ.मानव की सोँच बदले बिना हम धरती के सँकट से नहीँ उबर सकते.हमे लगता है कि 95प्रतिशत से अधिक जनता को धरती के सँकट से कोई मतलब नहीँ है.बस,उसे अपने स्वार्थ सिद्ध होँ.ओह!मनुष्य की संकीर्ण सोँच,भ्रष्टाचार व कुप्रबन्धन के रहते नेताशाही नौकरशाही भी भी ईमानदारी से आन्दोलनकारियोँ को सहयोग नहीँ दे पाते.निज स्वार्थी एवँ निज कैरियरवादी लोगोँ के बीच जागरुकता व अन्वेषणात्मक बातेँ करना अपनी मजाक बनवाना ,आदि हैँ.तब क्या हम भी खामोश हो कर बैठ जाएँ?नहीँ, हरगिज नहीँ.. जब वे अपनी मनमानी कर सकते है तो हम धर्म , सत्य, धरती पर जीवन, आदि के लिए मनमानी नहीँ कर सकते. इस शरीर को मर जाना ही है तो फिर क्योँ न त्याग व समर्पण के साथ धरती को बचाने के लिए लगा जाएँ .इसके साथ ही जरूरत है हम सब को अपने जीवन शैली को बदलने की.मन को उदार बनाने की.बच्चोँ को अभी से सार्बभौमिक ज्ञान व प्रकृति संरक्षण प्रति लालायित करने की.


अशोक कुमार वर्मा 'बिन्दु'

www.slydoe163.blogspot.com

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