शनिवार, 2 अप्रैल 2011

देखो जीत गया विश्व कप-���ारत!

रविवार,मार्च की 06 तारीख !
मैने इण्टरनेट पर लगभग 1000फ्रेण्डस को लिख भेजा था-INDIA WILL WIN WORL-CUP.


दो दिन से मैं संसार मेँ न था.मानसिक व ऐन्द्रिक शून्यता में जी अपनी निजता (आत्मा ) में था सम्भवत: . महामृत्युञ्जय मन्त्र जाप का समय मैने बड़ा दिया था.एहसास था अन्त समय का.



शरीर सिर्फ हड्डी मास का नहीं बना होता है.मनुष्य के शरीर के सात स्तर हैं- स्थूल,भाव,एस्ट्रल,मेण्टल,स्पिरिचुअल,काजमिक और निर्वाण शरीर .प्रथम चार तक हम प्रकृति के साथ द्वेत में जीते है.यहां तक प्रत्येक स्तर पर प्राकृतिक सम्भावनाएं होती हैं.स्थूल स्तर पर काम,भाव स्तर पर भय घृणा क्रोध हिंसा आदि,एस्ट्रल स्तर पर सन्देह व विचार ,मेण्टल स्तर पर कल्पना व स्वपन.जोकि साधना रत होने पर क्रमश:स्थूल स्तर पर ब्रहमचर्य,भाव स्तर पर अभय प्रेम करूणा मैत्री आदि, एस्ट्रल स्तर पर ऋद्धा व विवेक, मेण्टल स्तर पर संकल्प व अतीन्द्रिय दर्शन की ओर ऊर्जा गतिशील हो जाती है.
यही गतिशीलता ही चेतना की यात्रा है,अन्तस्थ यात्रा है.
मैं इस अन्तस्थ यात्रा के लिए प्रयत्न करता रहा हूँ.इस यात्रा से बढ़ कोई यात्रा नहीं,हज नहीं.चेतना के अन्तस्थ तीर्थ हैं यह सात स्तर या चक्र या लतीफ या system . system यानि कि reproductory,excretory,digestive,skeletal,circulatory,respiratory,nervous and endocrinal system . श्रीअर्द्धनारीश्वर शक्तिपीठ ,नाथ नगरी,बरेली(उप्र)के संस्थापक श्री राजेन्द्र प्रताप सिंह'भैया जी' का कहना है कि साधना के पथ न चलने वाला या इस पर न चलने तक की लालसा न रखने वाला प्रकृतिक संभावनाओं में जीते हुए मरने के बाद भी मुक्ति नहीं पाते.इस अन्तस्थ यात्रा से बढ़ कर हमारी चेतना का कोई धर्म नहीं.




"मै एक दिन दुनिया से गुजर जाऊंगा.लेकिन मेरे शब्द वातावरण में गूँजते रहेगे.कोई आयेगा,उन शब्दों को फिय कहेगा. यह सनातन यात्रा जारी रहेगी.इस धरती पर नहीं तो अन्य कहीं...... !?"



अब 07 मार्च .....हालांकि आज मै उत्साहित व ऊर्जावान था लेकिन कुछ नया अहसास था सांसारिक बन्धनों से ऊपर उठ कर.



न जाने मन में क्या आया ,स्कूल मे मैं दूसरे पीरियड में 8cक्लास मैँ था.मेरी लेखनी-


"मैं एक दिन दुनिया से गुजर जाऊंगा लेकिन मेरे शब्द...... . "


एक विद्यार्थी निशान्त ,कसरक निवासी क्रिकेट विश्व कप2011 के बारे में मुझसे पूछा.


"इण्डिया को इस बार विश्वकप मिलना चाहिए."


मौन अपनी निजता से जोड़ता है लेकिन...अन्तर मौन की टूटन,भीड़ व स्थूल और स्थूल प्रभाव में अन्तर्मौन को टूटन से बचाव के लिए काफी अन्तर्बल चाहिए. महर्षि अरविन्द घोष ने कहा है कि साधना का पथ पे कभी कभी लगता है कि अब सफलता मिलने वाली है लेकिन देखा जाता है कि अगले कदम पर अवरोध आ जाते हैं.अन्धेरे आ घेरते हैं.तटस्थता व साक्षी भाव जबाब देने लगता है.अन्तर मन की शून्यता से स्वर फूटा था कि इण्डिया विश्व कप जीतेगी लेकिन स्थूल से सहचर्य ने .....?

"इण्डिया को इस बार विश्व कप मिलना चाहिए ? "






समय गुजरा !लगभग 01.14PMपर मै विद्यालय से नगर पालिका आकर अपना कुछ जनगणना सम्बन्धी कागजों पर साईन कर चौराह पर आते ही एक्सीडेण्ट मेँ बाल बाल बचा.जिसके गवाह थे प्राईमरी सेक्शन के अध्यापक अरविन्द मिश्रा.मैं अब भी शान्त भाव था लेकिन चौराहा पार कर मैं जब मीत एजेन्सी पहुंचा तो सोँचते सोंचते जैसा मेरा अस्तित्व हिल सा गया.



मै तो बच गया था लेकिन दूर मेरा सहपाठी रह चुका एक युवक एक एक्सीडेण्ट में इस दुनिया से चल बसा था.मेरी सहपाठी रह चुकी एक युवती के के पिता की मृत्यु सम्बन्धी स्वपन सत्य हो चुका था.




इन दिनों में मैने अनुभव किया है कि व्यक्ति की अन्तर्चेतना शाश्वत शक्ति की एक कड़ी है.यदि हम अपने शारीरिक ऐन्द्रिक सांसारिक प्रभावों से परे तटस्थ हो अपने तन्त्र(स्व तन्त्र) से जुड़ जाएं तो हम एक मोबाइल की तरह अनेक मोबाईलों से सम्बन्ध स्थापित कर सकते ही हैं ,इसके आगे की यात्रा के बाद....




शेष फिर!



कोई टिप्पणी नहीं: