गुरुवार, 8 अक्तूबर 2015

मनुष्यता की चिंता करें????


हमारा हाल कौन पूछे ?हम खतरे में हैं.मनुष्यता खतरे में है.
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हिंदू कहता है - हिंदुत्व खतरे में है.मुसलमान कहता है इस्लाम खतरे में है.हम मजहबीकरण के खिलाफ हैं.जातिवाद के खिलाफ हैं.हम तो नैतिक शिक्षा की वो किताब हैं जिसमें राम हैं तो मोहम्मद साहब भी हैं. बुद्ध हैं तो ईसा भी हैं .जिसमें मानवता को प्रेरणा देंने वाली आयतें हैं तो वेदों के श्लोक भी . जहां सत हैं , प्रेम हैं.हम ऐसी किताब का सम्मान चाहते हैं. हम स्वयं "मुसलमान (यहां हम किसी मजहब की बात नहीं कर रहे हैं वरन् सत पर टिकने की बात कर रहे हैं)होना चाहते हैं. हमारे लिए हिन्दू शब्द विदेशी शब्द है,जो गुलामी का प्रतीक है.आर्य होना कोई मजहबीकरण नहीं है? कुछ लोग सनातन का बखान खूब करते हैं.लेकिन हम पूछना चाहते हैं कि आपके धर्मस्थलों,मूर्तियों,हवन,गर्न्थो आदि की अपेक्षा प्रकृतिअंशों व ब्रह्म अंशों को मानना क्या सनातन विरोध है?दुनियां का पहला पन्थ जैन (विजेता) मानते हैं .लेकिन ये पन्थ नहीं आर्य पथ पहला पड़ाव है.जितेन्द्रिय होना.इसी तरह बुद्ध का मतलब ,जिसकी ऊर्जा माथे(तीसरा नेत्र) को पार कर ऊपर बढ़ चुकी हो.हमारी नजर में ईसाई का मतलब ईस के गुण गान में जीना है.सिख का मतलब शिष्य होता है.....आदि आदि..बस ! दर्शन को समझने की जरूरत है.मजहबी करण/जातिकरण/समूहीकरण/आदि से निकल कर जरा सोचो.अपने को व् जगत को पहचानो. कुरुशान(गीता) में श्री कृष्ण के बिराट रूप में छिपी फिलासफी को पहचानों.हमारे ज्ञान का आधार है--"हम व् जगत की वर्तमान पहचान है-प्रकृतिअंश व ब्रह्मअंश.
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