रविवार, 16 जून 2013

विद्यालय प्रशासन समितियोँ मेँ कैसे लोग चुने जाएँ ?

इन दस वर्षोँ से शिक्षा जगत के साथ सबसे बड़ी बिडम्बना ये है कि 20प्रतिशत
से ऊपर के विद्यार्थी जिज्ञासा ,स्वभाव ,नजरिया आदि से विद्यार्थी नहीँ
हैँ और दो प्रतिशत से अधिक शिक्षक शिक्षक नहीँ .हम तो यही कहेँगे कि
नियति ,हेतु व नजरिया की दृष्टि विद्यार्थी व शिक्षक के व्यवहारिक जीवन
से ज्ञान कोसोँ दूर है.शास्त्रोँ,महापुरुषोँ व ज्ञान के विपरीत आज आज का
शिक्षक व विद्यार्थी ही खड़ा है .विद्यालय प्रबंधन भी आज जिनके हाथोँ मेँ
है वे शिक्षा की एबीसीडी तक नहीँ जानते है .अस्सी प्रतिशत से अधिक
विद्यालयोँ के संचालन की नियति अर्थ व प्रदर्शन है सिर्फ .
विद्यालय प्रशासन की दृष्टि से विद्यालयोँ के तीन स्तर हैँ
-सरकारी,अर्द्ध सरकारी व स्ववित्तपोषित विद्यालय.सरकारी व अर्द्धसरकारी
विद्यालयोँ मेँ शिक्षा बजट का 80प्रतिशत लगभग खर्च होता है,लेकिन परिणाम
बीस प्रतिशत से भी कम है.यहाँ विद्यार्थियोँ का प्रतिशत भी कम है .इन
विद्यालयोँ के अध्यापक व कर्मचारी हैँ ,उनके बच्चे तक इन विद्यालयोँ मेँ
नहीँ हैँ .जरुर दाल मेँ कुछ काला है .इन विद्यालयोँ का प्रशासन वास्तव
मेँ क्या चाहता है ?क्या सिर्फ कागजी पुलावोँ को पकाता रहना चाहता है .?

सरकारी व अर्द्धसरकारी विद्यालयोँ के अतिरिक्त अन्य विद्यालय अर्थत
स्वपोषित विद्याल तीन स्तर के हैँ-(1)राष्ट्रीय,प्रादेशिक या क्षेत्रीय
समितियोँ के अन्तर्गत(2)स्थानीय जागरुक हीन समितियोँ के
अन्तर्गत(3)व्यक्तिविशेष या परिवार विशेष के अन्तर्गत
.इन तीन स्तरोँ मेँ से पहले स्तर के विद्यालयोँ की दिशा दशा ठीक है
.दूसरे व तीसरे स्तर के स्वपोषित विद्यालयोँ मेँ अध्यापक ,प्रधानाचार्य
,विद्यालय प्रशासन समिति सदस्य या व्यक्ति परिवार विशेष की मनमानी होती
है ,दबंगता होती है .यहाँ तक कि इन विद्यालय प्रशासन की समितियोँ मेँ एक
दो सदस्योँ के अतिरिक्त न्यायवादी ईमानदार बौद्धिक चिन्तन का अभाव होता
है ,जो विश्व मानक शैक्षिक मानदण्डोँ के अनुकूल हो .किन्हीँ किन्हीँ
विद्यालय प्रशासन समितियोँ को देखकर हमेँ आश्चर्य व अफसोस होता है कि सभी
के सभी सदस्य अपने धन्धे व्यवसाय या अपने लाभ की धुन के सामने समितियोँ
की बैटकेँ तक सुचारु रुप से नहीँ चलवा पाते व विभिन्न समस्याओँ पर तर्क
वितर्क की क्षमता तक नहीँ रखते .सिर्फ व्यक्तिगत सोँच हाबी रहती है .


हमारी नजर मेँ एक विद्यालय है .जहाँ कोई प्रबंधक शायद इसलिए
दायित्व निभाता है कि विद्यालय की आय का कुछ हिस्सा स्वयं हजम करना
है .विद्यालय की आय को हजम पर लड़ाई होती है,ऊपर समाज मेँ दिखावा कुछ और
होता है .समिति व विद्यालय के ईमानदार आदर्शवादी एक दो सदस्य तो सिर्फ
अपनी भड़ास निकालने के लिए होते हैँ ,भड़ास निकालने दो सुन लो .करो अपने मन
की .कुछ विद्यालयोँ मेँ जो अध्यापक प्रतिदिन विद्यालय के सर्वेसर्वा के
सामने जाकर नमन करते रहते हैँ व इधर की उधर करते रहते हैँ .चिकनी चुपड़ी
लगाते रहते हैँ ,वे अच्छे होते है .यहाँ तक कि कुछ को उनकी हाँहजूरी मेँ
ही मजा आता है .


विद्यालय प्रशासन व समितियोँ मेँ सेवानिवृत्त अध्यापक ,शिक्षा
विभाग से सेवानिवृत्त कर्मचारी ,दार्शनिक ,तटस्थ विचारक ,मानवतावादी आदि
सदस्य होना चाहिए .शिक्षा व विद्यालय समितियोँ मेँ पद व सम्मान का निर्णय
किसी धर्म ,जाति ,बाहुबल ,धनबल आदि के आधार पर न होकर विचारोँ व समय
समर्पण के आधार पर होना चाहिए .जिनको विद्यालय के कर्मचारियोँ अध्यापकोँ
को समझने ,जानने ,दुख दर्द परेशानियोँ को समझने का वक्त नहीँ होता क्या
उन्हेँ पद संभालना चाहिए .?

--
संस्थापक <
manavatahitaysevasamiti,u.p.>

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