रविवार, 2 जून 2013

नक्सलियोँ गांधी की लाठी पकड़ो और अन्ना को नेता चुनो,

सन1967ई0 मेँ पश्चिमी बंगाल के नक्सलबारी से वामपंथी उग्रवाद विचारधारा
नक्सलवाद पैदा हुई.जब ये नक्सलवाद पैदा हुआ था तो बुद्धिजीवियोँ व
समाजसेवकोँ की प्रशंसा का विषय था क्योकि तब ये खेतिहर मजदूरोँ ,भूमिहीन
मजदूरोँ ,गरीब किसानोँ आदि का पक्षधर होते हुए अहिंसक था .धीरे धीरे कर
यह आन्दोलन हिँसक हो गया .

नक्सलवाद का हिंसक रुप व राष्ट्रविरोधी तत्वोँ से गठजोड़ मानवता के लिए
घातक है ."क्रान्ति बंदूक की गोली से निकलती है"-यह शाश्वत सत्य नहीँ है
.वर्तमान मेँ हिंसक नक्सलवाद से आंध्रप्रदेश ,मध्यप्रदेश ,महाराष्ट्र
,ओडिशा ,उत्तर प्रदेश ,पश्चिमी बंगाल आदि राज्य प्रभावित हैँ.पूरे देश भर
मेँ जिसके 22हजार से ज्यादा सशस्त्र कैडर काम कर रहे हैँ .हिंसक नक्सलवाद
से अत्यधिक प्रभावित राज्य झारखण्ड ,छत्तीसगढ़ आदि हैँ.उत्तरप्रदेश तक भी
हिंसक आन्दोलन की नींव रखी जा चुकी है .आनन्द राय ,लखनऊ दैनिक जागरण की
माने तो अब पूर्वी उत्तर प्रदेश के कई जिलोँ समेत शाहजहाँपुर ,बहराइच
,बरेली ,लखीमपुर खीरी जैसे जिलोँ मेँ भी ये लोग निरन्तर अपना संगठन मजबूत
कर रहे हैँ.वहीँ दूसरी ओर अहिंसक नक्सली आन्दोलन की महक ब्लागर पर अशोक
कुमार वर्मा 'बिन्दु' की "तन्हाई के कदम"आदि कहानियोँ से महसूस की जा
सकती है.वास्तव मेँ नक्सलवाद का हिंसक स्वरुप खत्म ही हो जाना चाहिए .
हर हालत मेँ खत्म हो जाना चाहिए .


आखिर क्योँ हिंसक नक्सलवाद ?जयपुर की एक कोर्ट तक को कहना पड़ा है कि
पुलिस जांच मेँ नेता ,मंत्री आदि हस्तक्षेप कर माफियाओँ व अपराधियोँ को
आश्रय देँगे तो नक्सलवाद पनपेगा ही . हालांकि शोषण ,अन्याय ,मनमानी
,पक्षपात आदि के खिलाफ व विभिन्न नियुक्तियोँ एवं प्रत्याशी चयन मेँ
नारको परीक्षण ब्रेनमेपिंग आदि अनिवार्य करने के लिए अहिंसक नक्सलवाद तेज
ही चाहिए लेकिन हिंसक नक्सलवाद पर तेजी से लगाम लगना चाहिए .
लेकिन अफसोस इस बात का भी है कि जो हिंसक नक्सलवाद के खिलाफ खड़ा है वह भी
कहता फिरता है कि टेंढ़ी अंगुली से ही घी निकलता है .भगत सिंह राजगुरु आदि
की प्रशंसा करता है व हिंसा से भरे अपने ग्रंथोँ का समर्थन करता है
.हिंसा की जड़ व्यक्ति व समाज मेँ बड़ी गहरी है .खुले आम अनेक श्वेतबसन
अपराधी सड़कोँ पर घूमते हैँ व घरोँ ,दफ्तरोँ ,संस्थाओँ आदि मेँ मनमानी
करते हैँ .जिससे किसी न किसी रुप मेँ व्यक्ति शोषित हो रहा है . नेताओँ
,सिपाईयोँ के साथ कौन नजर आता है ? क्या कोई शरीफ , दबंगहीन
,जातिवादविहीन या साम्प्रदायिकताविहीन भी ? अन्याय ,भ्रष्टाचार ,लूट
,मनमानी ,अज्ञानता ,जातिवाद ,साम्प्रदायिकता आदि को खत्म किए बिना समाज
मेँ हिंसाहीन व्यवहार की कल्पना नहीँ की जा सकती .इस मनोविज्ञान को समझना
अतिआवश्यक है कि आखिर व्यक्ति क्योँ हिंसक होता है ? आखिर नक्सलवाद क्योँ
?फिर एक प्रश्न उठता है कि आखिर कब आदिकाल से ये दुनिया हिंसा ,आतंकवाद
आदि से मुक्त हुई है ?


बुद्ध आये ,जैन आये ,ईसा आये ,गांधी आये-न जाने कितने कितने आये
?सत्य व अहिंसा के पाठ को जीवन मेँ कितने व्यक्ति उतारे हुए हैँ ?कानून
के रक्षक ही 25 प्रतिशत तक अपने जीवन मेँ पालन नहीँ करते .विभिन्न संतोँ
व विद्वानोँ के अनुसार सन2011से2020ई0 तक का समय विशेष परिवर्तन का समय
है .गायत्री तीर्थ ,शान्ति कुञ्ज ,हरिद्वार के संस्थापक पं श्रीराम शर्मा
आचार्य के अनुसार -" यह समय युग परिवर्तन जैसे महत्वपूर्ण कार्य का है
.इसे आदर्शवादी सैनिकोँ के लिए परीक्षा की घड़ी कहा जाए ,तो उसमेँ कुछ भी
अत्युक्ति नहीँ समझनी चाहिए.पुराना कचरा हटता है और उसके स्थान पर नवीनता
के उत्साह भरे साधन जुटते हैँ .यह महान परिवर्तन की महाक्रान्ति की वेला
है .प्रबुद्धोँ को अनुभव करना चाहिए कि यह समय विशेष है ,हजारोँ लाखोँ
वर्षोँ बाद कभी कभार आता है .गांधी के सत्याग्रह और बुद्ध के परिव्राजक
बनने का श्रेय समय निकल जाने पर कोई भी नहीँ पा सकता .समय की प्रतीक्षा
तो की जा सकती है ,पर समय किसी की प्रतीक्षा नहीँ करता . "अनेक छोटे छोट
अहिंसक अभियान तेज हो चुके हैं ,नक्सलवाद अहिंसक हो उन्हेँ एक मंच पर ला
सकता है .


सबसे बड़ी विडम्बना है कि राजनैतिक दलोँ द्वारा वोट स्वार्थ की
रोटियां सेंका जाना .इसी का परिणाम है पंजाब मेँ कट्टरपंथ का उकसन ,उप्र
मेँ मुस्लिम कट्टरवाद ,हिन्दूकट्टरता का उदय आदि .जाति ,मजहब ,क्षेत्र
,वोटस्वार्थ आदि से ऊपर उठ कर नेताओँ व सरकारोँ को मानवता व नैतिकता के
आधार पर संवैधानिक वातावरण बनाना होगा .विधि साक्षरता को गाँव गाँव व नगर
नगर बढ़ावा देना होगा .हमेँ गांधी को स्वीकार करना ही होगा ,बुद्ध जैन ईसा
नानक को स्वीकार करना ही होगा .नक्सलियोँ हिंसा छोँड़ो और गांधी की लाठी
पकड़ो .

--
संस्थापक <
manavatahitaysevasamiti,u.p.>

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