शुक्रवार, 26 मार्च 2010

काहे को हिन्दू होने प�� गर्व...

रामनवमी के दिन नगर मेँ दुर्गा जागरण एवं धर्म यात्रा को देखा. ऐसे ही एक प्रति क्रिया पर साथ के एक बोले कि क्या हिन्दू नहीँ हो?हिन्दू होने पर क्या गर्व नहीँ है?हिन्दू ,काहे का हिन्दू?इन्सान अब भी धर्म एवं सामाजिकता के नाम पर भ्रम तथा अज्ञान मेँ है.प्रकृति की ओर से हम जन्तु हैँ.यह इत्तफाक है कि हम मनुष्य योनी मेँ हैँ.बस,यही हमारे लिए गर्व की बात है.
हमारे पास बुद्धि है जिससे हम जान सकते हैँ कि हम कौन हैँ?



कौन है हिन्दू? कहाँ है हिन्दू? "अरे साले ,हम ब्राह्मण ! साले चमटा की क्या औकात, हमेँ आँख दिखाये . ........हम ठाकुर हैँ ठाकुर , जानत नाय का? साला कोरी की औलाद, औकात मेँ रह औकात मेँ......गनीमत है कि शाम को आये, चले आये बोट माँगने.धोब्बट्टा,सुबह आये होते बोट माँगने ,पूरा का पूरा दिन खराब हो जाता. चले आये कमबख्त पण्डितन बीच बोट माँगने...." - हूँ, यह डायलाग कौँधते रहते हैँ दिल दिमाग मेँ.

सनातन धर्म काफी पुराना है.जो एक ही है.उसी ओर जाते हैँ सभी सम्प्रदायोँ एवँ महापुरुषोँ के रास्ते. जो अधर्म के खिलाफ थे . उनका रीतिरिवाज अलग अलग हो सकता है लेकिन इसका मतलब यह नहीँ कि रीति रिवाजोँ को लेकर हम ऊँच नीच रखेँ.अपने को ऊँचा दिखाने के लिए दूसरी जाति सम्प्रदाय को नीचा दिखाना धार्मिकता नहीँ है. समझ लो, धर्म का सम्बन्ध भीड़ की नजर मेँ जीना नहीँ है. वरन धर्म का सम्बन्ध हमारी सोँच, नियति ,दृष्टि, ,आचरण ,स्वभाव ,आदतोँ ,परोपकार, उदारता, अहंकारशून्यता ,आदि से है. मनुस्मृति मेँ ठीक ही लिखा है कि-

"धृतिक्षादमास्तेयम्शौचममिन्द्रियम निग्रह.
धीर्विद्यासत्यमक्रोधो दशकम् धर्म लक्षणम्. "

हमे ताज्जुब होता है कि लोग खुद को धार्मिक कहते हैँ.हमेँ धार्मिक होने मेँ शायद चार पाँच दिन लगेँगे.हमेँ इस पर भी ताज्जुब होता है कि लोग ईश्वर को मानते हैँ.लेकिन उनके जीवन मेँ झाँकते हैँ तो.....?!धर्म यात्रा व जागरण मेँ जी जान से लगे लोगोँ की धार्मिकता को देख कर हमेँ ताज्जुब होता है.
खैर...?!हिन्दू शब्द की उत्पत्ति हुए कितना समय हुआ है?हिन्दू शब्द से पुराने शब्द क्या बौद्ध, जैन, ईसाई ,मुस्लिम, यहुदी ,पारसी ,आदि नहीँ हैँ?हिन्दू शब्द स्वयं एक विदेशी शब्द है.

और......

अब कि इस धरती पर ईश्वर ने अवतार लिया तो-वह किन्हे चाहेगा?उन लोगोँ को जो धर्म स्थलोँ जातियोँ सम्प्रदायोँ मतभेदोँ निजस्वार्थ अहंकार दबंगता आदि मेँ जीते है या जो प्रेम उदारता परोपकार अहंकारशून्यता आदि मेँ जीते हैँ?वह तुम्हारी बुराईओँ को पसन्द करेगा या अच्छाईयोँ को ?

हम कौन हैँ?अभी हम जाने नहीँ.आप कहते हैँ कि हम हिन्दू होने पर गर्व करेँ ? मेरी बातेँ सुन वह चलते बने.वह समझे होँगे कि हम नहीँ सुनाई देगा लेकिन हमने सुन लिया था-वह कह रहे थे कि अरे पागल है बकता रहता है.

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