शनिवार, 29 जनवरी 2011

क्या स्वदेश क्या विदेश : बसुधैव कुटम्बकम्

अयं निज : परोवेति गणनालघुचेतसाम.

उदार चरितानांतु बसुधैवकुटुम्बकम्..




शरहदोँ मेँ जीते हो क्योँ?

तोड़ दो शरहदेँ सारी,

बाहर की कमजोरियोँ को


क्योँ उछालते हो?


अन्दर की कमजोरियोँ पर


क्योँ न नजर डालते हो?


भूल चुके हो अपना पथ


अपने अतीत पर जरा नजर तो डालो.


दोष देते रहोगे कब तक


विदेशियोँ को?


जयचन्द्रोँ पर अँगुली


उठाने से पहले ,



पृथ्वीराजोँ के घरोँ


की दरारोँ से अन्दर तो झाँको.


आओ मिटा दे शरहदेँ सारी,



दिलोँ से मिटा दे नफरतोँ के बीज



समझ लो चाहेँ अल्हा हो या ईश्वर


है सब एक शक्ति,
बोलो -'जय हो ओम आमीन'



हिन्दुओँ को अपने अन्दर झाँकना चाहिए , कमी कहाँ पर है?गैरहिन्दू गर दोषी है तो हम क्योँ नहीँ.यदि दुनिया से गैरहिन्दुओँ को विदा कर दिया जाए तो भी क्या तुम चैन से रहोगे?चाहे हिन्दू होँ या गैरहिन्दू सभी के सब मानसिक रुप से गुलाम हैँ.जाति मजहब देश आदि के बहाने द्वेषमालाओँ मेँ मनुष्यता को पिरो दिया गया.गैरहिन्दू तब भी ठीक है,हिन्दू तो काफी विचलित है.बरेली मेँ श्री अर्द्धनारीश्वर शक्तिपीठ के संस्थापक श्री राजेन्द्र प्रताप सिँह'भैया जी' का कहना है


"जब हर आत्मा परमात्मा के बास होने की बात कही जाती है तो परमात्मा अलग कहाँ से आयेगा? पर समाज जब अपनी जिम्मेदारी से मुँह फेर लेता है तब वह किसी कार्य विशेष को स्वयं न करके किसी दूसरे के द्वारा करने की उम्मीद रखता है......आज के महापुरुषोँ द्वारा जो धर्म संदेश अपने प्रवचनोँ मेँ दिया जाता है उसमेँ व्यक्तियोँ को पौराणिक कहानियोँ एवं राम कृष्ण जैसे अवतारोँ के भावुक एवं रोचक प्रसंगोँ को सुनाकर या तो नचाया जाता है या फिर रुलाया जाता अर्थात उनके हृदय मेँ कायरता की वह छाप छोड़ दी जाती है जिसमेँ भाव विह्ल हो वह अपनी आन्तरिक शक्ति को खो बैठता है,और उसी परमात्मा को खोजने पर लग जाता है जो उसके हृदय मेँ विराजमान रहता है."


धर्म ईश्वर व देवी देवताओँ के नाम पर व्यक्तियोँ को जितना ठगा गया उतना अन्य से नहीँ.वेद कुछ और ही कह रहे हैँ ,उपनिषद कुछ और ही कह रहे हैँ.सारी शक्तियाँ अपने अन्दर छिपी हैँ,सारे तीर्थ अपने अन्दर छिपे हैँ.बस,अपने को पहचानने की देरी है.जिसके लिए कुछ करना नहीँ,बैठना है.उपनिषद का अर्थ क्या है?उपासना का अर्थ क्या है? सिर्फ बैठना.बैठ कर स्वाध्याय करना, चिन्तन करना, सत्संग करना ,अपने अन्दर झांकना,आदि.जब मैँ कहता हूँ कि दुनिया का पहला निर्गुण उपासक मुसलमान ही रहा होगा तो आप मेरी बात को समझते क्योँ नहीँ?मैँ कितनी बार कह चुका हूँ कि भाषा पर मत जाओ शब्दोँ पर मत जाओ ,शब्दोँ की परिभाषा पर जाओ.


हिन्दू शब्द स्वयं मेँ क्षेत्रविशेष की पहचान छिपाए है.क्या क्षेत्र विशेष मेँ बंध कर हम रह जाएं?मुसलमान शब्द क्योँ न अरब से आया हो लेकिन जाति पन्थ देश से ऊपर उठ कर विचारोँ के दर्शन को जानिए.मूर्तियाँ ,धर्म स्थल ,आदि किस स्तर के लोगोँ की आवश्यकता है?सत से बढ़कर क्या?क्या स्वदेश क्या विदेश?इन्सानियत की सुरक्षा हर हालत मेँ होना चाहिए.अन्तर्राष्ट्रीय शरहदेँ आम आदमी के लिए खोल देनी चाहिए.शरहदेँ सिर्फ शासकीय प्रशासकीय होनी चाहिए जैसे कि देश के अन्दर ग्राम पंचायत ,तहसील, जिला ,प्रदेश, आदि की शरहदेँ. विभिन्न देशोँ की वर्तमान राष्ट्रीय शासन प्रणाली का वैश्वीकरण व विश्व सरकार का होना आवश्यक है.अपने पक्ष के व्यक्तियोँ चाहेँ वे किसी भी देश व जाति से होँ से सम्बन्ध स्थापित करना कोई अमानवता की पहचान है?यदि हम किसी का मानवीय अहित नहीँ चाहते.

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