रविवार, 23 जनवरी 2011

ओ3म -आमीन!! ओम तत सत! ओ3म -��मीन!!

जब मैँ कहता हूँ कि मैँ वैचारिक स्तर पर मुसलमान भी हूँ तो लोग भड़क जाते हैँ.



शायद हजरत आदम के रुह की ऊर्जा का केन्द्र दोनोँ आँखोँ के बीच आज्ञा चक्र पर रहा होगा.जो शिव का भी स्थान माना जाता है.यहाँ सत का, बीइंग का बोध होता है.चित्त ,कांशसनेस का बोध होता है.जहाँ चित्त से हम मुक्त हो जाते हैँ.सत शेष रह जाता है.इस लिए तो मुसलमान वह है जो अपने ईमान पर मजबूत है.यहाँ पर आ कर मूर्तियोँ की पूजा पीछे छूट जाती है.डाक्टर कुंवर आनन्द सुमन की इस बात " सोलह साल की अवस्था तक मोहम्मद साहब महादेव की मूर्तियां बेँचते रहे व शिवलिंग की उपासना करते रहे ." -को यदि सत्य माना जाए तो यह कहना ठीक रहेगा कि मोहम्मद साहब सोलह साल के बाद इस स्थिति पर पहुँच गये होँगे कि उन्हेँ सगुण उपासना की आवश्यकता नहीँ रही होगी.काबा स्थान भी कभी शिव का स्थान रहा होगा.



मैँ आपको बता दूँ कि दुनिया का पहला निर्गुण उपासक मुसलमान ही रहा होगा.अरे गैर मुसलमानोँ मेरी इस बात पर बौखला क्योँ गये?वहाँ भी शिव है यहाँ भी शिव है.शब्दोँ व भाषा पर मत जाईए शब्दोँ की परिभाषा पर जाईए. कागजी हिसाब किताब व नाम ,भाषा, अपने पैत्रक समाज, आदि के आधार पर स्वयं को हिन्दू मानना हालातोँ की एक स्थूल आवश्यकता है लेकिन हमसे पूछा जाए कि 'हिन्दू' शब्द और 'मुसलमान' शब्द मेँ से आप किसे आत्मसात करना चाहेंगे ?तो मेरा उत्तर होगा 'मुसलमान'.मैने चन्द् सेकेण्ड पहले कहा था कि शब्दोँ व भाषा पर मत न जाइए.



मोहम्डन शब्द की परिभाषा क्या है?जिसका ईमान मजबूत हो.
यहाँ भी 'सत' है , बस शब्दोँ का फेर है.जो सत को स्वीकार नहीँ करे वही काफिर है.जो ईमान को स्वीकार न करे वही काफिर है.काफिर वह है जो सत से मुकरे.सत कहाँ पर है ,बीइंग कहाँ पर है? आज्ञा चक्र पर, दोनोँ आँखोँ के बीच. इस्लाम के पांच सिद्धान्त है -(1) तौहीद यानि कि एकेश्वरवाद (2) नमाज यानि कि सूर्य नमस्कार विधि(3) जकात यानि कि दान(4)रोजा यानि कि उपवास (5) हज यानि कि तीर्थ यात्रा . क्या यह सिद्धान्त हर निर्गुण उपासक को आवश्यक नहीँ हैँ?

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