गुरुवार, 2 दिसंबर 2010

03दिसम्बर1889ई0:खुदी राम ��ोस जन्म दिवस /भावी क��रान्ति की सम्भावनाएं

अहिँसा को लेकर कब तक चला जा सकता है?यह ठीक है कि अहिँसा ही धर्म है व हिँसक प्रवृतियाँ प्राणियोँ की अपूर्णता को दर्शाती हैँ.यदि सामने वाला हमारी अहिँसक प्रवृत्तियोँ से युक्त व्यवहारोँ से अपने मनमानी पूर्ण व्यवहार मेँ चेँजिँग नहीँ लाता तो......?यह हमारी अपूर्णता ही है.



आज का दिन खुदीराम बोस के चिन्तन मेँ !



03दिसम्बर 1889 ई0 को उनका जन्म मेदिनीपुर जिले के बहुबेनी ग्राम मेँ हुआ था. उनके पिता का नाम त्र्यैलोक्यनाथ बसु था माता का नाम लक्ष्मीप्रिया देवी था. पिता जी तहसीलदार थे.छह वर्ष की अवस्था मेँ ही अपने माता पिता का विछोह सहना पड़ा. देशभक्ति का भाव बाल्यावस्था से ही जागृत हो गया था.आनन्दमठ उपन्यास के रचयिता बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय मेदिनीपुर मेँ ही शासकीय सेवा मेँ थे.इस उपन्यास का गीत वन्देमातरम बड़ा लोकप्रिय हुआ था.जिससे उन्हेँ प्रेरणा मिली.देशभक्त विपिन चन्द्र पाल ने वन्देमातरम पत्रिका का प्रकाशन किया व अरविन्द घोष इसके
संपादक नियुक्त हुए.1907मेँ अंग्रेज सरकार ने वन्देमातरम पत्रिका पर राजद्रोह का अभियोग लगाया.
ऐसे मेँ खुदीराम बोस सामने आये.
क्रान्तिकारी सुशील कुमार सेन पकड़े गए और उन्हेँ न्यायाधीश किँग्जफोर्ड ने 15 कोड़े मारने की सजा दी.क्रान्तिकारी दल ने किँग्जफोर्ड से बदला लेने का निश्चय किया आखिर क्योँ....?इसलिए क्योँकि अंग्रेज विदेशी थे या दूसरी जाति के थे?क्या इसी कारण.....?यदि नहीँ तो ......?अब क्या सब कुछ ठीक है?यदि नहीँ तो ....?उनके खिलाफ हिँसक कार्यवाही क्योँ नहीँ?क्या कहा,कानून अपने हाथ मेँ क्योँ लेँ ?तब तो यह पक्षपात हुआ?भूल गये गीता को अपने धर्म या जेहाद के पथ पर अपना कोई नहीँ होता.यदि देश से कुप्रबन्धन को मिटाने के लिए हिँसक कार्यवाहियोँ को आप कानून विरोधी मानते हैँ तो .....?क्रान्तिकारियोँ का समर्थन क्योँ?हूँ!मुगल तो विदेशी थे अंग्रेज तो विदेशी थे?तो कहाँ चली गयी वसुधैव कुटुम्कम की भावना?स्वदेशी विदेशी की भावना क्या ठीक है?इसलिए मैने अपने अप्रकाशित उपन्यासोँ मेँ मजबूरन आतंकवादियोँ व नक्सलियोँ से कहलवाया है कि तुम लोगोँ से अच्छे तो हम गीता(कुरूशान) के प्रशन्सक हैँ और.....?




इसलिए मेँ कहता हूँ गांधीगिरी को स्वीकारो या फिर......मैँ तो गांधीगिरी का समर्थन करता हूँ.तुम छोँड़ो जबरदस्ती व हिँसा या फिर यहाँ भी पक्षपात न करो,चाहे कोई विदेशी या दूसरी जाति का हो या न
कुप्रबन्धन व भ्रष्टाचार के खिलाफ हथियार उठा लो.नहीँ....तो गांधी को स्वीकार कर लो और कहना छोँड़ दो कि मजबूरी नाम गांधी.छोँड़ोँ उन महापुरुषोँ को जिनके हाथ खून से सने हैँ.आ जाओ मेरे साथ....जैन, बुद्ध सुकरात, ईसा ,गांधी ,ओशो, आदि के पथ पर.



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