रविवार, 25 जुलाई 2010

मुंशी प्रेम चन्द्र : स���माजिकता के दंश का चित्रकार

31 जुलाई को साहित्यकार प्रेम चन्द्र की जयन्ती है.मैँ अपनी सोँच के मुताबिक सन्त कबीर,प्रेमचन्द्र,धुमिल,आदि ' सामाजिकता के दंश' के चित्रण मेँ महत्वपूर्ण स्थान रहा है.


मुंशी प्रेमचन्द्र का साहित्य व्यक्ति के विकारयुक्त सामाजिकता के दंशोँ का यथार्थ चित्रण है.उनका साहित्य समाज मेँ उपेक्षित -दलित- नीच माने जाने वाली जातियोँ,दबे कुचले व्यक्तियोँ,आदि का यथार्थ है.हालांकि सवर्ण वर्ग के कुछ लेखकोँ ज्योति प्रसाद निर्मल,ठाकुर श्रीनाथ सिँह,आदि ने जातिवादि मानसिकता के साथ प्रेम चन्द्र को 'घृणा का प्रचारक' कह कर आलोचना की . डा . धर्मवीर 'प्रेमचंद्र की नीली आँखे' मेँ लिखते हैँ कि'प्रेमचन्द्र ने रंगभूमि का पाठ तैयार ही इसलिए किया था कि अपने समय के अछूतोँ के नेतृत्व से लड़ा जा सके'. राजीव रंजन गिरी हालांकि कहते हैँ, कुछ हद तक ठीक कहते है कि अस्मितावादी विचार या समूह का लक्ष्य मुक्तिकामना है. ऐसा न हो कि अपनी अस्मिता को उभारक र,ताकत अर्जित कर एक नया वृहद आख्यान रच लिया जाए और इस ने आख्यान मेँ दूसरी अस्मिताएं दब जाएं.लिहाजा लोकतांत्रिक मूल्योँ की कसौटी पर अस्मितावादी विचारोँ की जांच होनी चाहिए.


अन्य अस्मितावादी ......?!



इस वक्त मात्र एक विषय'छुआ छूत ' का लेँ,उत्तर प्रदेश के कुछ जिलोँ मेँ प्रथमिक विद्यालयोँ मेँ दलित रसोईयोँ के द्वारा भोजन पकाने का विषय है.दलित रसोईयोँ के द्वारा भोजन पकाने का विरोध क्या गैर संवैधानिक व गैर लोकतान्त्रिक नहीँ है.रसोईये पद पर आरक्षण -गैरआरक्षण की बात अलग की है.लोकतन्त्र के सम्मान का मतलब यह तो नहीँ कि विकारोँ का समर्थन करने वालोँ के पक्ष मे जा कर संवैधानिक मूल्योँ को दबा दिया जाये?

कुरीतियोँ के खिलाफ मुहिम निरन्तर जारी रखने की आवश्यकता है.क्योँ न कुरीतियोँ के समर्थन मेँ सौ प्रतिशत समाज खड़ा हो लेकिन कुरीतियोँ के खिलाफ निरन्तर दिवानगी,बलिदान,समर्पण ,आदि की आवश्यकता है.हाँ,यह भी सत्य है सारा का सारा समाज शासन प्रशासन तन्त्र धर्म से विचलित है.ऐसे मेँ गीता की बातेँ अब भी प्रासांगिक है.

सामाजिक विषमताओँ के चित्रण मेँ मुंशी प्रेमचन्द्र स्मरणीय रहेँगे.

ASHOK KUMAR VERMA 'BINDU'

AADARSH INTER COLLEGE,

MEERANPUR KATARA,

SHAHAJAHANPUR,
U.P.(INDIA)

2 टिप्‍पणियां:

honesty project democracy ने कहा…

अच्छी सोच और निःस्वार्थ लेखक को कुछ लोग हमेशा ही अपनी आलोचना का शिकार बनाते रहे हैं | प्रेमचंद्र जी के लेखनी पर सभी सच्चे व इमानदार भारतीय को गर्व है चाहे वह किसी भी वर्ग का क्यों न हो |

arvind ने कहा…

सामाजिक विषमताओँ के चित्रण मेँ मुंशी प्रेमचन्द्र स्मरणीय रहेँगे.
...sahamat.apne blog ke naam ke anusaar bahut sateek lekhan. shukriya.