मंगलवार, 13 जुलाई 2010

जिन्दगी मेँ समाज:घरेलू अपराधोँ मेँ भूमिका

समाज अपनी आत्मा खो चुका है.वह किसके साथ खड़ा है?वह विचलित हो चुका है.वह जन्म, शादी ,आदि अवसर पर जिन्दगी मेँ एक दिन तो आशीर्वाद देना जानता है लेकिन शेष जिन्दगी........?!
जिन्दगी भर समस्यावृद्धिकारक बन कर ही आता है.परिजन ,आसपड़ोस,सम्बन्धी,आदि सब के सब बनी के यार होते जा रहे है. सामूहिकता मेँ जीने गुण समाप्त हो चुके हैँ, हाँ! अवगुण अवश्य विकराल होते जा रहे हैँ.अर्थात निज् स्वार्थ मेँ समूह बनता बिगड़ता है.न्याय व ईमानदारी चेहरा व हालात देख बनती बिगड़ती है.

घरेलू हिँसा के खिलाफ किधर से भी कोई व्यवहारिक कदम नहीँ रखे जा रहेँ.आसपड़ोस,सम्बन्धी,आदि मूक दर्शक बने रहे जाते हैँ , हाँ! बर्बादी मेँ सहायक तो जरुर हो सकते हैँ.अनेक घर की कहानी के अन्त पर कल्पनाएँ भयावह व दर्दनाक नजर आती हैँ.अनेक घर समाप्त न होने वाली आन्तरिक हिँसा के शिकार हो बस बर्बादी का जश्न मनाने मेँ लगे हैँ.हम तो देख रहे हैँ किसी किसी घर मेँ मुखिया की मनमानी तक घर मेँ अशान्ति का कारण बन रही है.कर्त्तव्यविमुखता बढ़ती जा रही है.आखिर घरेलू अपराध के खिलाफ मुहिम कब छिड़ेगी?आखिर कब...?

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