शुक्रवार, 11 जनवरी 2013

राष्ट्रीय जाग्रति वर्ष : 150वीँ विवेकानन्द जयंती वर्ष !

राष्ट्रीय जाग्रति वर्ष : 150वीँ विवेकानन्द जयंती वर्ष !


चार जुलाई सन 1902 मेँ 31 शारीरिक रोगोँ के बावजूद विश्व मेँ भारतीय
अध्यात्म की पताका को लहराने वाले स्वामी विवेकानन्द 39 वर्ष की अवस्था
मेँ इस जगत से चले गये.योगी व ईशभक्त ऐसा ही होता है ,दुनिया की नजर मेँ
वह दुखी नजर आ सकता हैँ लेकिन वह भावोँ,विचारोँ व ज्ञान के माध्यम से
परमसत्ता मेँ होता है. विवेकानन्द समाज के बीच पूर्ण उत्साह व साहस के
साथ आध्यात्मिक व समाज सेवा मेँ ओतप्रोत नजर आते रहे.


भारतीय ब्राह्मणवाद व पुरोहितवाद समाजसेवा से दूर रहा है ,जातिवाद
,छुआछूत,सम्पत्ति आदि मेँ व्यस्त रहा है.हालांकि धर्म माया ,मोह ,लोभ आदि
मेँ लिप्त होने का विरोधी रहा है लेकिन भारतीय धर्मस्थल व धर्मनेता
अपारधन सम्पदा ,माया ,मोह लोभ आदि मेँ लिप्त होते देखे गये हैँ .अपनी
तोंद पर हाथ फिराते समाज से करोड़ोँ की सम्पत्ति इकठ्ठी करने वाले इन धर्म
स्थलोँ व धर्म नेताओँ ने बेसहारोँ ,अनाथोँ ,गरीबोँ ,मुसाफिरोँ आदि के लिए
एक चम्मच पानी के अलावा कोई सुविधा नहीँ दी है .जिनसे बेहतर गुरुद्वारे
मेरे लिए सम्माननीय रहे हैँ.

आज ईसाई मत विश्व मेँ आबादी की दृष्टि से नम्बर एक पर है .इसका मुख्य
कारण क्या है?हिन्दू जो हिन्दू व हिन्दू समाज के लिए रोजमर्रे की जिन्दगी
मेँ कोई भी त्याग न करने वाले हैँ ,को ईसाई पुरोहितो ,पादरियोँ ,समाज
सेवियोँ व योजनाओँ से प्रेरणा लेनी चाहिए .जिन दुर्गम क्षेत्रोँ
,व्यक्तियोँ की ओर हम देखना तक पसंद नहीँ करते ,उनके लिए उन्होने अपनी
सम्पत्ति व जीवन दांव पर लगा दिया.


स्वामी विवेकानन्द ने कहा था कि मैँ मोझ नहीँ चाहता ,मैं बार बार
जन्म लेकर मानवता की सेवा करना चाहता हूँ. मैँ तो यही कहूँगा कि उनके
सेवा भाव व कर्म से यहाँ का ब्राह्मणवाद व पुरोहितवाद चिड़ता रहा.यहाँ का
ब्राह्मणवाद व पुरोहितवाद गरीबोँ ,दलितोँ ,बेसहारोँ की सेवा स्वयं कब
किया है ?पश्चिम व ईसाई मिशनरीज के ब्राहमणवाद व पुरोहितवाद के सेवाकर्म
को टक्कर यहाँ का कौन सा ब्राह्मणवाद व पुरोहितवाद टक्कर दे सकता था?
--
संस्थापक <
manavatahitaysevasamiti,u.p.>

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