रविवार, 29 मार्च 2009

परिवार दंश:विनाश काल�� विपरीत बुद्धि

" कैरियरवादी था बचपन से...?!.जो व्यक्तिवादी बना दिया. क्या परिवार क्या समाज?फले फूले हमारी इच्छाओँ का संसार.

भाड़ मेँ जाये रे परिवार,क्या होता है परिवार?कौन है परिवार का मुखिया,कैसा है परिवार का मुखिया?अभी सभी चाबियाँ मेरे हाथ,दौलत सम्पत्ति पाये जो वह आये मेरे साथ .

आये मेरे साथ चाहेँ जो,सहेँ जो मुझे चुपचाप.दूहती गाय को सब चारा डालेँ,हम तो जिएँ निज स्वार्थ.

परिवार की नीँव जब प्रेम त्याग पर खड़ी नहीँ,अशान्ति मतभेदोँ मेँ जब बड़े हुए.परिवार का भला कौन कर पायेगा?बर्दाश्त करने की हद पार कर हम ही अपराधी बन जायेगा.
घर की रखेँ घर मेँ हम ऐसे होशियार नहीँ.मतभेदोँ को बाहर जता के,बाहरियोँ के मन्सूबोँ के लिए सही.
रहे धन दौलत हाथ हमारे,एक एक टूटेँ चाहँ परिजन हमारे.अन्य परिजनोँ की क्या इच्छाएँ?मेरी इच्छाएँ ही समझेँ वे अपनी इच्छाएँ.भाड़ मेँ जाये परिवार सारा,जिसे मोह हमारी सम्पत्ति से वो गाये हमारा गाना."
- अब भी ऐसे कथन रखने वाले हैँ परिवार के मुखिया ताज्जुब होता है.

( आओ नजदीकियोँ की ओर बढ़ेँ कुछ कदम तुम बढ़ो कुछ कदम हम बढ़ेँ.निज स्वार्थोँ को त्याग कर जगत मेँ एक मिसाल बनेँ.)


लेकिन--


यह कैसे है सम्भव?निज स्वार्थ है महत्वपूर्ण.घर की दीवारेँ तोड़ तोड़ आओ टीले बना लेँ . जिन टीलोँ से देखेँ तमाशा लोग हमारे घर का.

और...

चलो ठीक है-असन्तुष्टि अशान्ति मतभेद उदारहीनता आदि से तुम अपना जीवनपथ सजाए हुए.परिजनोँ के करीब होते हुए भी दूर रहते हो.खत्म हो चुकी दिल से करीबी.धार्मिकता और ईश्वर से रह गया सिर्फ दिखावे का नाता.बस,वही पूर्वाग्रह खिन्नता भड़ास या स्वार्थ.


खुद तिनके की चुभन को बड़े दर्द के समान प्रदर्शित करते हैँ औरोँ के दर्द को झूठ मान ऊपर से कमेँटस करते हैँ. परिवार के अन्दर ही एक दूसरे से कटे कटे रहते हैँ.अपने निज स्वार्थ मेँ न कि परिवार के हित जीते हैँ.सोँचते तो बहुत कुछ लेकिन वर्तमान मेँ बस पेट भरने तथा भविष्य की कल्पनाओँ मेँ.अपने कष्टोँ की चिन्ता लेकिन अन्य परिजनोँ के कष्टोँ की न चिन्ता.अन्य परिजन न जीने मेँ न मरने मेँ
लेकिन बस अपनी धुन मेँ.बंजर भूमि पर उपजाऊ भूमि की भाँति बाग के ख्वाब लेकिन निराश ,कायर, संवेदनहीन बागवान से कैसी उम्मीदेँ?

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