मंगलवार, 4 दिसंबर 2012

10दिसम्बर:मानवाधिकार दिवस और नई मनुष्यता के पग .

बच्चोँ को पहले पढ़ाया जाता था कि पर्व दो तरह के होते हैँ-राष्ट्रीय
पर्व व धार्मिक पर्व लेकिन अब ऐसा नहीँ है.प्रत्येक शहर व कस्बोँ मेँ
यहाँ तक कुछ गाँव मेँ भी अब अन्तर्राष्ट्रीय पर्व व प्रशासन से प्रेरित
होकर अन्य जागरुकता अभियान आयोजित किए जाने लगे हैँ.मेरा मानना है कि
आधुनिक तकनीकी व जीवन शैली के बीच अन्तराष्ट्रीय पर्व व विभिन्न
जागरुकता अभियान प्रकृति व मनुष्य को बचाने के लिए अतिआवश्यक हो गये हैँ
जो नई मनुष्यता के पग हैँ.जातीय,मजहबी ,क्षेत्रीय,भाषायी,व्यक्तिगत
कूपमण्डूक सोँच से निकल सार्वभौमिक सत्य व सर्वोच्च ज्ञान से जुड़ने के
लिए ये अन्तर्राष्ट्रीयपर्व विशेष रुप से मानवाधिकार दिवस व विश्व
पर्यावरणदिवस नई मनुष्यता के पग को मजबूत करने मेँ सहायक हो सकते हैँ.


प्रत्येक वर्ष के दस दिसम्बर को मानवाधिकार दिवस मनाया जाता
है.अच्छा है,अन्य पर्वोँ के अलावा इसे भी प्रतिवर्ष मनाये जाने के लिए
प्रत्येक संस्था,विद्यालय,विभाग आदि को प्रेरित किया जाना चाहिए लेकिन ये
पर्व मनाये जाने से ही सिर्फ काम नहीँ चलने वाला.पहले से ही सदियोँ से
मनाते चले आ रहे पर्वोँ से व्यक्ति क्या प्रेरणा ले रहा है?प्रेरणा लेना
तो दूर पर्व मनाने का मूल हेतु का विचार व भाव दर्शन भुलाया जा चुका है.
प्रत्येक पर्व भौतिकता के रंग मेँ रंग ढोँग,दिखावा,मनोरंजन,मूड परिवर्तन
का साधन,परम्परा आदि मात्र रह गया है.जिस के कारण ऋणात्मक सीख लेकर
व्यक्ति भड़क या उन्माद मेँ आ द्वेष,मनमानी,पक्षपात आदि को तो जन्म दे
सकता है लेकिन उदारता,धैर्य,सेवा,सत्य आदि के लिए प्रेरणा नहीँ ले
सकता.अब मानवाधिकार दिवस को ही लेँ,कोई भी देश हो या कोई मजहब या कोई
जाति,कहीँ भी व्यक्ति मानवाधिकारोँ के प्रति ईमानदारी से कितना सजग है
?जब अपने स्वार्थ व अपने नजरिये पर जब चोट पहुँचती है तभी व्यक्ति
मानवाधिकारोँ के प्रति सजग होता है और वह भी अपने पक्ष मेँ या अपने
परिवार या अपने जाति या मजहब या अपने देश के पक्ष मेँ लेकिन सारी
मनुष्यता को ध्यान मेँ रखकर नहीँ.जिन देशोँ ने मानवाधिकारोँ के प्रति
विश्व पटल पर अलख जगाने की कोशिस की है,उन देशोँ के अन्दर मानवाधिकारोँ
के हनन के केस कम नहीँ हैँ.यहाँ तक कि देश,जाति,मजहब आदि के नाम से
भेदभाव के आधार पर मानवाधिकारोँ के वास्ते दूसरे देश,जाति,मजहब आदि के
व्यक्तियोँ को निर्दोष अत्याचार व शोषण का शिकार बनाया जाता है .क्या इस
बात मेँ सच्चाई नहीँ है?


मानवाधिकारोँ का हनन अनेक स्तर से हो रहा है;परिवार व
अन्तर्परिवार,जाति व अन्तर्जातीय,राज्य व अन्तर्राज्यीय,राष्ट्र व
अन्तर्राष्ट्रीय,आदि स्तरोँ पर .इन सब स्तरोँ पर सत्तावाद ,पूँजीवाद व
सम्प्रदायवाद,प्रजातान्त्रिक व
संवैधानिक मूल्योँ आदि का गला घोट कर मानवाधिकारोँ का हनन कर रहा
है.आधुनिक तकनीकी व ज्ञान के वातावरण मेँ भी अपने दिमाग व ह्रदय का ताला
नहीँ खोला है.सभी शारीरिक व ऐन्द्रिक आवश्यकताओँ और कूपमण्डूकता की
दीवारोँ मेँ कैद हो सागर को नापने की संभावनाएं तलाश रहे हैँ.कोई
हिन्दुत्व के नाम से तो कोई इस्लाम के नाम से तो कोई सेक्यूलरवाद के नाम
से तो कोई समाजवाद के नाम से मनुष्यता व पर्यावरण के विकास के सागर को
नापना तो चाह रहा है लेकिन मानवाधिकारोँ का कहीँ न कहीँ पर प्रत्यक्ष या
अप्रत्यक्ष हनन जारी है. ये भुला दिया जाता है कि मानव की प्रकृति व
चेतना शक्ति के द्वारा कोई भी जाति,मजहब,वाद आदि निर्धारित नहीँ है.
विकास के नाम पर मनुष्यता को नये आयाम देने का प्रयास तो किया जा रहा है
लेकिन किस तरह का विकास ? जब कायदे कानूनोँ व नीतियोँ के अनेक विकल्प
मनमानी ढंग से निर्धारित कर लिए जाते हैँ तो किसी न किसी के मानवाधिकारोँ
का हनन होना स्वाभाविक है. मानवसेवा,नैतिकता ,ईमानदारी,व अध्यात्मिकता के
बिना किसी न किसी का विकास तो किया जा सकता है लेकिन सारी
मनुष्यता,प्रकृति व मानवाधिकारोँ का सम्मान तब भी हो,विश्वास नहीँ किया
जा सकता .


मनुष्य आँखेँ खोलता है तो उसके सामने होता है-संसार .हालांकि उसके
साथ संसार तब भी होता है ,जब उसकी आँखेँ बंद होती हैँ.संसार मेँ होती हैं
सजीव,निर्जीव व मानव या जंतुओँ द्वारा निर्मित वस्तुएं .सत्रहवीं शताब्दी
से विश्व को उपलब्ध हुए विकास व सभ्यता ने व्यक्ति का नजरिया व जीवनशैली
बदली है. सत्रहवीँ शताब्दी पूर्व नजरिया था कि प्रकृति से छेड़ छाड़ ठीक
नहीँ लेकिन अब आधुनिक विकास व सभ्यता ने निरा भौतिक भोगवाद की उत्पत्ति
की है और प्रकृति विदोहन काफी तीव्र गति से हुआ ही, मानव मानव के बीच
सम्बंध समीकरण बदले हैँ.इन नये मानवीय समीकरणोँ ने ऋणात्मक व धनात्मक
दोनोँ तरह की स्थितियां प्रकट की हैँ.सब कुछ बदल रहा है लेकिन प्रकृति व
मानव की सहजता मिट रही है.भौतिक विकास की अन्धदौड़ ने विभिन्न स्तर पर
विभिन्न विक्रतियां उत्पन्न की है. विकास व सभ्यता के नाम पर मानव व
प्रकृति ने काफी कुछ खोया है. शारीरिक व मानसिक दोनोँ रुप से मानव असहज
हुआ ही है,प्रकृति भी प्रदूषित हुई है.वैश्वीकरण व समीपता बढ़ाने के
बावजूद अविश्वास,धोखा,बेईमानी,असत्य,हिँसा,भय आदि मेँ वृद्धि हुई
है.नैतिकता व चरित्रता कम हुई हैँ.प्रेम के प्रति नजरिया बदल कर काम(sex)
हो गया है.ऐसे मेँ अपराधी मन विकसित हुए है . धन व भौतिक लालसा मेँ
वृद्धि लेकिन ईमानदारी से परिश्रम व कर्मठता का महत्व कम हुआ है.अपने निज
स्वार्थोँ के लिए मानवाधिकारोँ का हनन स्वाभाविक है.


24 अक्टूबर 1945 को स्थापित संयुक्त राष्ट्र संघ के छह अंगोँ मेँ से
एक आर्थिक एवं सामाजिक परिषद ने मानवाधिकार के प्रति सम्मान को महत्व
देते हुए 10दिसम्बर1948 मेँ मानवाधिकार की घोषणा की थी. इसका एक मात्र
उद्देश्य है कि जाति,भाषा या धर्म के आधार पर कोई भेदभाव न हो .न ही निजी
स्वार्थोँ के आधार पर मानवाधिकारोँ का हनन हो.भारत मेँ अक्टूबर 1993मेँ
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग का गठन किया गया.उप्र मेँ 04अप्रैल 1996 मेँ
मानवाधिकारआयोग का गठन किया गया.

<अशोक कुमार वर्मा 'बिन्दु'>

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