गुरुवार, 27 सितंबर 2012

कथांश : रीति के जीवन क्षण

जो हमेँ सर्वभौमिक सत्य से जोड़े उसी की नजर मेँ हम जिएं .

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From: Ashok kumar Verma Bindu <akvashokbindu@yahoo.in>
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Date: Friday, September 28, 2012 10:23:25 AM GMT+0800
Subject: कथांश : रीति के जीवन क्षण






वह कक्षा आठ की छात्रा थी .नाम था उसका रीति .शाम का वक्त ,स्कूल से आने के बाद मैँ कपड़े चेँज कर हाथ मुंह धोने के बाद भोजन परोस कर खाने को बैठ ही पाया था कि रीति अपने भाई रमन के साथ कमरे मेँ आ पहुँची थी .
रमन बोला -"मेरा आज बर्थडे है,सर ."
रीति बोली -"सात बजे आ जाना,सर."

जब दोनोँ बापस चले गये तो मैँ सोंचने लगा कि आजकल के ये बच्चे अभी से सुस्त सुस्त मुर्झाये से.भोजन ग्रहण करने के बाद मैँ पंजाब केसरी समाचारपत्र को पढ़ने बैठ गया.

* * *

रमन की बर्थडे पार्टी से मैँ जब बापस कमरे आया तो दीवारघड़ी 10.00PMबजा रही थी.कपडे चेंज करने के बाद मैँ विस्तर पर आ गया .
शीत ऋतु थी ,मैँ पैरोँ पर रजाई डालकर डायरी लिखने लगा .लिखते लिखते एक घण्टा बीतने को आया....

"सर! " - कमरे का दरबाजा खोलते हुए रीति .

"सर!कुछ बातेँ करनी हैँ आपसे."

"आओ .....लेकिन इतनी रात?"

"तो क्या हुआ?फिर नींद भी नहीँ आ रही थी .मम्मी भाई दीदी से कहकर आयी हूँ .आप तो अपने से ही हैँ फिर मैने आपके मकानमालिक की लड़की से सुन रखा है कि आप रात भर जागते रहते हैँ ."

"डायरी पर क्या लिख रहे थे ?"
"क्योँ?तुमको क्या बताने की जरुरत?"
"सारी!"
मैँ फिर लिखने बैठ गया .कुछ मिनट बाद मैने डायरी बन्द कर दी .
"हाँ,बोलो देवी जी."
"रीति हूँ मैँ ,देवी जी नहीँ ."
"हाँ,ठीक है.बोलो,क्या बात करनी है?"
"आप घर पर मामा जी से बातेँ कर रहे थे .मैँ पीछे विण्डो से आपकी बातें सुन रही थी ,अच्छा लग रहा था सुन .अब हमेँ लगने लगा है आपसे बात कर हमेँ सुकुन मिल सकता है .वैसे मैँ कभी कभी मरने तक की सोंचती हूँ ."-फिर वह सिसकने लगी.

"अरे,तुम तो रोने लगीँ .? "
"रोने दो .अकेले मेँ तो रोती ही हूँ .किसी के सामने आज पहली बार ......किसी के सामने भी रोने दो .आप ही तो मिले हैँ ऐसे कि लगता है आपके सामने रो भी सकती हूँ .नहीँ तो.....?!लगता है आप हमारे आँसू पोंछ भी सकते हैँ .यह जमाना यहाँ तक कि फैमिली भी जैसे काटने को दौड़ती हो .मैँ ऊपर ऊपर मुस्कुरा लेती हूँ ,हँस लेती हूँ -इससे क्या?"

उसने अपना सिर मेरे दायेँ कन्धे पर रख दिया .

"सर !सुबह चार बजे उठ जाती हूँ फिर रात दस बजे के बाद ही बिस्तर पकड़ पाती हूँ .विस्तर पर भी बेचैन... परेशान... दिन भर की सोँचना...कहीँ होमवर्क पूरा नहीँ,कहीँ क्लासवर्क पूरा नहीँ... लिखना भी,याद करना भी.हर वक्त तो बिजी रहती हूँ लेकिन तब भी टीचरोँ व मम्मीपापा की डाँट सुननी पड़ती है.यह याद नहीँ किया.. वो याद नहीँ किया..यह भूल गयी..यह अभी लिखना बाकी, वह लिखना बाकी राईटिंग गंदी हो रही है...घर पर
यहाँ झाड़ू नहीँ,वहाँ झाड़ू नहीँ लगी.. बर्तन साफ करने को पड़े हैँ... कपड़े साफ करने को पड़े हैँ.. न जाने क्या क्या...? भ ईया और दीदी भी अपना हुकुम चलाते रहते हैँ .मैँ परेशान सी हो जाती हूँ ,खिन्न सी हो जाती हूँ .पापा हैँ ,हर वक्त गुस्सा उनके नाक पर रखी रहती है .पापा की स्थिति से आप परिचित ही हैँ .दारु जुआँ की लत मेँ .."

"रीति!यह सब जो है ,उससे अपने मन को मत जोड़ो.सोँचो,हमेँ क्या करना है ?हमेँ क्या बनना है ?हमेँ क्या फर्ज निभाने हैँ?जिसकी जैसी बुद्धि उसे वैसा करने दो.हमेँ जैसा करना है ,हमेँ जैसा बनना है उसके लिए प्रयत्न करते रहे ,बस .प्रतिकूलताएं भी हमारी परीक्षाएं बनकर आती हैँ,ऐसा समझो.ध्रुव की कथा पता है,पिता की गोद मेँ न खेल पाने की खिन्नता ने उन्हेँ महान बना दिया.अपनी खिन्नता हतासा निराशा
आदि को महान दिशा दे दो."

"कैसे तैयार करुँ खुद को इसके लिए ? "

"मुझसे मुलाकातेँ व सम्वाद ! ...और मेडिटेशन एवं महान नारियोँ की जीवनगाथा पढ़कर ! "

"मन तो ,मन....."

"बोलो,क्या बोलना चाहती हो ?"

"सर!"फिर वह खामोश हो गयी.

"मन को लयता दो,मन को संगीत दो .मस्ती दो .मन मेँ धैर्य व शान्ति लाओ.सिर्फ वर्तमान मेँ जियो .सोँचो मत ,जो कर्म कर रही हो,उसमेँ ही लीन हो जाओ.वर्तमान मेँ लीन रहो.शिवनेत्र पर ध्यान दो,श्वास प्रक्रिया पर ध्यान दो .पुस्तकेँ पढ़ो,हमवर्क क्लासवर्क पूरा करो .तुम कहती हो दिनभर बिजी रहती हूँ .एक पल को भी चैन नहीँ .अच्छा है यह अच्छा है,व्यस्त रहना अच्छा है .थकान आये तो विश्राम भी जरुरी है
.थकान से बचने के लिए शवासन भी कर सकती हो और फिर सोँचो मैँ नहीँ थकी हूँ .मैँ तो आत्मा हूँ .मैँ नहीँ थक सकती ."


"निराशा के दौरे से पड़ जाते हैँ .मरने तक की सोंचने लगती हूँ ."

"क्योँ क्योँ ?सोँचो ,जिन कारणोँ से ऐसा होता है उनको मन मेँ मत लाओ .अपनी सोँच को बदलो.जिस देवी देवता या महापुरुष महानारी को मानती हो उसे सोँचो या फिर मेडिटेशन या अध्ययन . व्यस्त रहने वाले को तो रोने की भी फुर्सत नहीँ होना चाहिए.अपने को पहचानो ,तुम सिर्फ शरीर नहीँ हो .तुम देवी हो ,माँ स्वरुप हो .तुममेँ पुरुष से भी ज्यादा शक्तियाँ हैँ .तुम आत्महत्या नहीँ कर सकती.हाँ,तुम उनके
मन्सूबोँ की हत्या कर सकती हो इस समाज को गंदा कर रहे हैँ,परिवार व समाज की व्यवस्थाओँ को गंदा कर रहे हैँ .स्त्री तो शक्ति का भी प्रतीक है .अपने को पहचानो."


मैने उसकी दोनोँ आंखोँ के बीच माथे पर अपनी एक अंगलु रख दी .

"रीति!अपनी आंखेँ बंद करो.बंद आंखोँ से देखने की कोशिश करो इस स्थान को .तुम सिर्फ शरीर नहीँ हो,शरीर तो मर ही जायेगा आज नहीँ तो कल.तुम आत्मा हो ,अलिँगी हो ,चेतना हो.... अपने को पहचानो.दुनिया की नजर मेँ सफल नहीँ हो पाओ तो कोई बात नहीँ .अपनी नजर मेँ सफल बनो.जातिभेदी,लिगभेदी,कूपमण्डूक,अहंकारी आदि की नजर मेँ क्या सफल होना चाहती हो ?"


समय गुजरा...

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