रविवार, 18 सितंबर 2011

जातीय व्यवस्था : सामाजिकता के दंश

गौरबशाली भारत की विशेषताओं मेँ एक विशेषता थी-वर्ण व्यवस्था.कुछ अपवादों को छोंड़ देँ तो पता चलता है कि उस वक्त जाति व्यवस्था नहीं थी.बस दो ही जातियां थीं जो कि दो विचारधारायें थीँ-आर्य व अनार्य.कर्म के आधार पर व्यक्ति का वर्ण बदल जाता था.कोई भी अपने वर्ण के आधार पर शादी कर सकता था.उस वक्त अपने वर्ण मेँ शादी करने का मतलब हो जाता था -अपने स्तर, स्वभाव,अपने लक्ष्य मेँ सहयोगी,अपने कार्य क्षेत्री,आदि वाले युवक या युवती से शादी करना.उस वक्त स्वयं युवक युवतियों को अपना जीवन साथी चुनने का अधिकार था.आज कल समाज में जाति व्यवस्था नस नस मेँ व्याप्त है .ये जाति व्यवस्था समाज में द्वेषभावना व मतभेद का कारण बनी हुई है.मुसलमानों व अंग्रेजों के आने के पूर्व ही अखण्डभारत खण्ड खण्ड हो चुका था.ग्रंथों के संज्ञान से स्पष्ट होता है कि कम से कम सभी पिछड़ी कही जाने वाली जातियों के पूर्वज एक ही थे व क्षत्रिय थे.
वैश्य वर्ग के पूर्वज भी क्षत्रिय ही थे.सुखसागर भागवत पुराण,आदि का अध्ययन गहनता से किया जाए तो पता चलता है कि हम सब कहीं न कहीं से एक थे और परस्पर शादियों का प्रचलन था लेकिन जातिव्यवस्था कारण हम टूटे

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