गुरुवार, 2 सितंबर 2010

विमल वर्मा बीसलपुर निवासी का लेख:बिखरता पर��वार

एक दौर था जब चाचा ताऊ और भतीजे के समूह से परिवार की पहचान होती थी.सुख दुख मेँ सभी एक साथ एकत्र होते थे.......लेकिन वक्त बदलने के साथ संयुक्त परिवारोँ मेँ बिखराव आने लगा.नतीजन अधिकतर लोगोँ ने एकल परिवार की राह पकड़ ली.वह प्रत्येक निर्णय लेने के लिए स्वतन्त्र हैँ तो वह किसी और पर क्योँ आश्रित रहेँ?कुछ युवाओँ का यहाँ तक कहना है कि वे आर्थिक रूप से जब मजबूत हैँ तो दूसरोँ की क्योँ सुने?आज युवाओँ के मौजूदा रुख से परिवार टूट रहे हैँ.इन्हेँ पाल पोस कर बड़ा करने वाले तथा इन्हेँ अच्छी शिक्षा दिलाकर अपने पैरोँ पर खड़े होने की क्षमता देने वाले माता पिता इनकी एकल परिवार की सोँच के चलते उपेक्षित हो रहे है.भाई भाई मेँ द्वेष उत्पन्न हो रहा है.एक दूसरे के प्रति भरोसे मेँ कमी आ रही है.चाचा दादा की बात तो दूर अब अपने सगे भाई बहिनोँ से भी लोग गुरेज रखने लगे हैँ.भौतिकवादी सोँच मेँ डूबे युवाओँ को अपनी पत्नी और बच्चोँ के अलावा कोई भी अपना नहीँ लगता.



यही वजह है कि वे परिवार से नाता तोड़ने मेँ भी थोड़ी भी हिचक नहीँ रखते,लेकिन ऐसा करते वक्त वे शायद भूल जाते हैँ कि कल उनके बच्चे भी बड़े होँगे......,युवाओँ को मेरी सलाह है कि संयुक्त परिवार की सोँच ही बेहतर सोँच होती है.



¤मेरी प्रतिक्रिया....

विमल जी आप ठीक लिखते हैँ,लेकिन नई पीढ़ी की विचलित दिशा के लिए क्या नई पीढ़ी ही दोषी है?
माता पिता की सेवा करना युवाओँ का कर्त्तव्य है.हाँ,यदि युवा अपने बुजुर्ग माता पिता की सेवा नहीँ करते तो इसके लिए उनके संस्कार दोषी है या बुजुर्ग माता पिता द्वारा पिछले वर्षोँ मेँ प्रस्तुत किए गये पारिवारिक वातावरण भी दोषी हो सकता है.कायर,निराश,अशान्त,सदभाव हीन,उदारहीन,आदि से युक्त व्यवहार रखने वाले कब परिवार को आदर्श दिशा दे सकते हैँ.त्याग,मधुरता,सामञ्जस्य,परस्पर एक दूसरे का सम्मान,भावनाओँ का शेयर,एक दूसरे के लिए उपयोगी होना,एक दूसरे की समस्याओँ के निदान के लिए सजग रहना,एक दूसरे का उत्साहवर्धन करते रहना,आदि अति आवश्यकता होती है.हमने देखा है कि परिवार का मुखिया ही परिजनोँ की समस्याओँ या अस्वस्थता से अपने को बिलकुल दूर कर लेते हैँ और सहयोगी साबित नहीँ होते.हाँ,उनसे उम्मीदेँ रखते हैँ.विभिन्न स्वभाव,स्थितियोँ,आदि मेँ रहने वालोँ की मजबूरियोँ को न समझ एक विशेष स्वभाव,स्थितियोँ,आदि मेँ जीने वालोँ से तुलना करते हैँ.
यहाँ पर भी वर्ण श्रम विभाजन की प्रासांगिकता है.


शेष फिर....


अशोक कुमार वर्मा'बिन्दु'


आदर्श इण्टर कालेज

मीरानपुर कटरा

शाहजहाँपुर उप्र


कोई टिप्पणी नहीं: