शनिवार, 19 दिसंबर 2015

देश का भला कौन करे??

सिर्फ वेतनभोगी नौकरशाही व जातिवादी/मजहबी/स्वार्थी नेताओं से  देश का भला नहीं होगा??

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जिन शब्दों पर सिर्फ बोलने से ही बबाल हो जाये,उस पर फाइनल डिसीजन कैसे होगा?मंहगाई को ही लें? कैसे कम होगी महगाई??यदि किसानों के साथ न्याय हो जाए तो मंहगाई और बढ़नी है ?

       देश काफी बीमार हो चुका है.कड़वी दवा पीने के लिए न जनता तैयार है न ही नेता/ठेकेदार/माननीय/सम्माननीय/वरिष्ठ/आदि. जब नगर के हालात बिगड़ जाते हैं तो मिलेट्री आती है  भाई ?नेताओं/ठेकेदारों/माननीयों/सम्माननियो/वरिष्ठों/आदि में अब  दम नहीं है शायद हालात सुधारने की?

       जयगुरुदेव ने कहा था,अब दिल्ली देश के साथ न्याय नहीं कर सकती.वर्तमान व्यवस्था/तन्त्र के रहते,वर्तमान व्यवस्था/तन्त्र को जकड़े बैठे नेता/ठेकेदार/जनता/माननीय/सम्माननीय/वरिष्ठ/आदि  के रहते 'कुत्ते के गले में फंसी हड्डी" की तरह हालत हैं तो फिर वर्तमान ब्यबस्था/तन्त्र/जनता/माननीय/बेतनभोगी नौकरशाही/आदि का कचूमर निकलना क्या जरुरी है? ये कचूमर कब निकलेगा?तृतीय विश्व के दौरान क्या?और तब देश के ऐसे हालात हो जाएंगे कि देश की कुछ समय के लिए राजधानी भी बदलेगी ?तब ही कड़वी दवा मजबूरी में पिएंगे ?अभी तो अपना काम बनता, भाड़ में जाये जनता?यही तो न?नवजागरण/सामाजिक आंदोलन के पन्नों को आचरण में आज की तारीख में कौन पसन्द करता है?

ashok kumar verma " bindu"

www.akvashokbindu.blogspot.com
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