बुधवार, 9 दिसंबर 2015

अभिवावक बनाम विद्यार्थी जीवन

अभिवावक  बनाम विद्यार्थी जीवन(ब्रह्मचार्य जीवन)

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एक बालक था , सदा अपनी क्लास में प्रथम  आता था.लेकिन शैतानी में किसी से कम नहीं.बोलने का सलीका भी नहीं.उनके अभिवाबक इसी बात से प्रसन्न थे कि मेरा बालक पढ़ने में होशियार है.उसकी शैतानियों व दुष्टता को नजरअंदाज करते जा रहे थे.एक दो बार हमने उनके अभिबावक को समझाया लेकिन उलटे वे नाराज हो जाते.हम कहते संस्कार भी महत्वपूर्ण हैं. लेकिन वे हमारी बात को नजरअंदाज कर देते. किशोराबस्था एक नाजुक  अबस्था है.किशोरावस्था में आते ही वह और उपद्रवी हो गया .उसके अभिवावक इसी से प्रसन्न कि हमारा बच्चा क्लास में प्रथम आता है.लेकिन कक्षा09 में आते आते उस बालक की संगत बुरे लड़के लड़कियों से हो गयी.सिर्फ अंकतालिकाएं व् कोरी योग्यता ही काफी नहीं होती.कुछ बर्षो बाद वह डिग्री कालेज में पहुँच गया.लेकिन उसका नजरिया व सोसायटी....?हम बस इतना कहना चाहेंगे कि वह आज जेल में है.क्यों कैसे?ये तो इस लेख में बताने की फुर्सत नहीं.होशियार को संकेत ही काफी है.हमें टीचिंग करते 18 साल ही गए है.यहाँ हमें कबीर की याद आ गयी.कबीर ने एक दिन धरमदास से कहा था कि हम जो देने आये हैं वह हमसे कोई लेने ही नहीं आता.हम मुठ्ठी भर लोगों में हैं.भीड़ में होते भी भीड़ से अलग हैं.

हम समय समय पर कहते रहे हैं कि बिद्यार्थी जीवन अब ब्रह्मचर्य जीवन नहीं रह गया है.आखिर ऐसा क्यों?इस के बारे में कौन सोचना चाहता है?

ashok kumar verma "bindu'

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