बुधवार, 7 नवंबर 2012

जाति का बहिष्कार क्योँ नहीँ ?

जो व्यक्ति जातिवादी है और विभिन्न व्यवहार एवं अपने बच्चोँ की
शादी,खानपान आदि जातिभावना से ग्रस्त होकर करते हैँ ,वे क्या संविधान
विरोधी ,मानवता विरोधी ,अज्ञानी ,कूपमण्डूक ,मूर्ख ,प्रकृति विरोधी
,ईश्वर विरोधी आदि नहीँ हैँ ?


जाति का बहिष्कार क्योँ न हो ? उन व्यक्तियोँ व परिवारोँ का बहिष्कार
क्योँ न हो जो कुछ जाति के व्यक्तियोँ या परिवारोँ से खानपान या वैवाहिक
सम्बंध स्थापित करने के विरोधी हैँ ?या सिर्फ अपनी जाति के व्यक्तियोँ व
परिवारोँ से ही खानपान या वैवाहिक संबंध स्थापित रखना पसंद करते हैँ या
जातिविरोधी व्यक्तियोँ व परिवारोँ के खिलाफ होते है .?ऐसे लोगोँ के खिलाफ
सामाजिक व राष्ट्रिय एकता के खिलाफ तत्व मानकर कानूनी कार्यवाही क्योँ न
की जाए ?ऐसे लोग व परिवार तो ईश्वरीय व आध्यात्मिक ज्ञान के विरोधी भी
हैँ तथा ढोँगी व पाखण्डी हैँ .ऐसोँ को भी वैचारिक व मानसिक अपराधी मानकर
सरकारी नियुक्तियोँ , आश्रय व सुविधाओँ आदि से क्या वंचित नहीँ किया
जाना चाहिए?ऐसे सर्वोच्च ज्ञानहीन व्यक्ति व परिवार मानवता के लिए भी
कलंक हैँ. प्रकृतिअंश व ब्रह्मांश के स्तर पर जाकर अपनी सोँच व कार्यशैली
न रखकर जातीय व मजहबी सोँच व कार्यशैली रखने वालोँ को समाज ,कानून धर्म
,अध्यात्म व अन्य स्तरोँ पर वरीयता दिया जाना मूर्ख प्रशासन व शासन या
प्रबंधन का परिणाम है ?हम सब तो पचास प्रतिशत प्रकृतिअंश व पचास प्रतिशत
ब्रह्मांश हैं .अत: हमेँ इसी स्तर पर जाकर विचार व आचरण करना चाहिए.

जय सनातन ! जय इस्लाम !!
ASHOK KUMAR VERMA 'BINDU'
<www.manavatahitaysevasamiti.blogspot.com>

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