Powered By Blogger

शनिवार, 4 अप्रैल 2026

सम्पादकीय ::पुस्तक "क्रांति क्यों? कैसे?"

लेखक का विचार है कि सन 2011 ई0 से विश्व भर में 90 प्रतिशत मानव की हालत हमारे लिए विचारणीय है?क्यों, लेखक की हालत में क्या लेखक के इस विचार से सुधारात्मक होगी? “अपना काम बनता , भाड़ में जाये जनता”- ऐसा कहने वाले कैसे हैं?ये वे ही जाने। अनेक देशों में सत्ता परिवर्तन के लिए जनता सड़कों पर उतरी लेकिन इससे क्या मिला?व्यवस्था परिर्वतन के लिए विकल्प भी चाहिए।सत्ता परिवर्तन से सब कुछ नहीं बदलता, आखिर व्यवस्था परिवर्तन हेतु नई व्यवस्था का विकल्प क्या है पुरानी व्यवस्था खत्म कर ? लेखक का मानना है कि वर्तमान नेता, दलों, सिस्टम के पास समस्यों के लिए क्या समाधान है व्यवस्था में बदलाव किए बिना। जैसे कि 75 साल बाद मुम्बई डूबने वाली है, कलकत्ता डूबने वाला है।इसके लिए वर्तमान सिस्टम के पास ,वर्तमान नेताओं के पास, वर्तमान दलों के पास क्या समाधान है? कोई विचारक या दार्शनिक ठीक कहता है कि कोई भी समस्यों को खत्म करने के लिए वर्तमान व्यवस्था, वर्तमान तंत्र को खत्म किये बिना समाधान करने में क्या समर्थ है? क्रांति की आवश्यकता है लेकिन कैसे ? वर्तमान जनतन्त्र भी क्या सफल है?समस्याओं के समाधान को?जनता भी जाति, मजहब, लोभ लालच आदि से ऊपर उठ कर अपनी सरकार चुनने की क्या सामर्थ्य रखती है? कृषि योग्य कम होती भूमि, खाद्य मिलावट, नशा व्यापार, नब्बे प्रतिशत जनता की आय 15000 से कम आदि अनेक स्थितियां, भूमिगत कम होता जल स्तर, बेरोजगारी, अस्वस्थता,रिश्वतखोरी,दहेज व्यवस्था, मंहगी शादियां, घरेलू हिंसा, बढ़ती अराजकता , गिरता शिक्षा का स्तर, ज्ञान के आधार पर चलने की किसी की जिम्मेदारी नहीं….आदि आदि।
आखिर क्रांति की आवश्यकता क्यों नहीं?क्यों नहीं क्रांति? मानव शांति, आर्थिक लोकतंत्र, सामाजिक लोकतंत्र आदि के लिए कब बदलाव की बयार ? यह उद्गार व्यंग्यात्मक और विद्रोही है। लेखक का यह कहना चाहता है कि वर्तमान दुनिया में इतनी समस्याएं हैं — युद्ध, हिंसा, आर्थिक असमानता (अमीर-गरीब की खाई), सामाजिक भेदभाव (जाति, लिंग, वर्ग आदि आधारित अन्याय) — कि क्रांति की सख्त आवश्यकता है। फिर भी, समाज सुस्त और निष्क्रिय क्यों है?वह पूछ रहा है: इतनी पीड़ा और अन्याय के बावजूद लोग क्रांति क्यों नहीं करते? बदलाव की प्रेरणा कब आएगी?"मानव शांति" से तात्पर्य विश्व स्तर पर युद्ध-विराम और सद्भाव से है।"आर्थिक लोकतंत्र" का अर्थ है पूंजीवाद या असमान वितरण के खिलाफ — जहां हर व्यक्ति को आर्थिक अधिकार और अवसर समान रूप से मिलें (जैसे समाजवादी या मार्क्सवादी विचारों से प्रेरित)।"सामाजिक लोकतंत्र" से सामाजिक समानता, जाति-उन्मूलन, लैंगिक न्याय आदि का संकेत है।"बदलाव की बयार" एक रूपक है — जैसे हवा की तरह ताजा और तेज परिवर्तन की लहर कब चलेगी?यह पंक्ति क्रांतिकारी विचारधारा को दर्शाती है, जो जयप्रकाश नारायण की "संपूर्ण क्रांति" या मार्क्सवादी विचारों से प्रेरित लगती है — जहां सुधार पर्याप्त नहीं, मूल व्यवस्था में आमूल बदलाव (क्रांति) जरूरी है। यह समाज की निष्क्रियता पर तंज कसती है और लोगों को जागृत करने का आह्वान है कि अब समय आ गया है कि बड़े परिवर्तन के लिए उठ खड़े हों। "आखिर क्रांति की आवश्यकता क्यों नहीं?" → आखिरकार, क्रांति (मूलभूत बदलाव या आमूल परिवर्तन) की जरूरत क्यों नहीं है?"क्यों नहीं क्रांति?" → क्रांति क्यों नहीं होनी चाहिए?"मानव शांति, आर्थिक लोकतंत्र, सामाजिक लोकतंत्र आदि के लिए कब बदलाव की बयार?" → मानव समाज में शांति, आर्थिक लोकतंत्र (संपत्ति और संसाधनों का समान वितरण), सामाजिक लोकतंत्र (समानता और न्यायपूर्ण समाज) आदि प्राप्त करने के लिए बदलाव की लहर (सकारात्मक परिवर्तन की हवा) कब आएगी। संक्षेप में यह असंतोष की पुकार है दुनिया की समस्याओं को देखते हुए क्रांति न केवल जरूरी है, बल्कि अपरिहार्य है — फिर देरी क्यों लेखक कहता है कि दुनिया में बड़े लोगों की हालत भी क्या है? उनके रहते मानवता विवश क्यों?मानव अशांति, विश्व अशांति क्यों? लेखक कहता है कि लॉक डाउन के दौरान वह महससू करता है कि लॉक डाउन सौ साल तक हो ही जाना चाहिए । प्रकृति में समस्याएं खत्म। मनुष्य अब समस्या बन चुका है प्रकृति के सामने। ऐसे में लेखक जगत में संहारक शक्ति को विकराल होते देख रहा है। आखिर पूंजीवाद, सत्तावाद ,सामंतवाद कब तक?प्रकृति विदोहन कब तक?वर्तमान नेताओं, दलों से उम्मीदें कब तक? एक एक व्यक्ति, एक एक जर्रा जमीन, प्रकृति के प्रत्येक घटक के हित को अब नया दल, नया नेता चाहिए। ऐसे में एक ओर कुछ लोग ईमाम मेंहदी अर्थात कल्कि महाराज के इंतजार में हैं लेकिन इस इंतजार में नया सृजन, नया पालन बीमार होता जा रहा है।संहारक ही उभर रहा है।वह संहारक किस दिशा में जायेगा ? कभी कभी बीमारी इतनी भयानक हो जाती है कि चिकित्सक अपने हाथ खड़ा कर लेता है और ईश्वर के भरोसे रह मरीज को अस्पताल से घर ले जाने को कहता है? जब पंच तत्व, पूरी पृथ्वी ही बीमार हो जाएगी ,प्रदूषित हो जाएगी तो सकारात्मक ऊर्जा भी क्या करेगी? जो मानव समस्या बन चुका है प्रकृति अभियान के लिए ,उसका समाधान क्या है? लेखक कहता है कि ऐसे में क्रांति की जरूरत क्यों नहीं?यहाँ क्रांति से मतलब सुधार के लिए बदलाव को स्वीकार करने भर से है। यदि नहीं तो हादसे घटने प्रकृति में स्वाभाविक हैं। "अशोकबिन्दु ठीक कहते हैं कि जब देश गुलाम हो रहा था तो देश की जनता व राजा एक जुट नहीं थे इसी तरह आजकल भी है।नेता और जनता समाज व देश में अमन व शांति के लिए एक जुट नहीं हैं। जो गांधी का विरोध करते हैं वे भी कब नेता जी सुभाषचंद्र बोस,भगत सिंह के रास्ते पर चल रहे हैं?कुछ लोग अब मुसलमानों को दोष दे रहे हैं लेकिन जिस गांव व वार्ड में मुसलमान नहीं रहते वहां क्या सब ठीक है ?और जो जातिगत आरक्षण का विरोध कर रहे हैं वे क्या अन्य जातिगत व्यवस्था का क्या विरोध कर रहे हैं?बात को समझो, जागो तभी सबेरा।जय भारत ,जय भारतीयता। " ठीक ही तो है भीड़ का मुकाबला भीड़ ही कर सकती है लेकिन " सवा लाख से एक लड़ाऊं " की दशा के लिए हजार में मुश्किल से एक भी नहीं मिलेगा? यदि मिलेगा भी तो जनता उसने साथ कितनी खड़ी? ऐसे में भी जो धर्म के नाम पर भीड़ में हर घर आते भी हैं सिर्फ चंदा और वोट मांगने लेकिन रोजमर्रे की जिंदगी में वे क्या करते हैं? 👍क्रांति तो वो लिखते हैं जिसे हार जीत की तमन्ना नहीं, मरने मारने की तमन्ना नहीं, पक्ष विपक्ष की तमन्ना नहीं!👌 👍जय हो गुरु गोविंद सिंह !💐 जयगुरुदेव ठीक कहते थे कि दिल्ली की गद्दी से देश का भला नहीं होगा वहां तो भूतों का डेरा है और वर्तमान नेता, दल से भी नहीं। इस बीच गुरु गोविंद सिंह व उनके बच्चों को स्मरण करते हुए शेष फिर!!

कोई टिप्पणी नहीं: