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शुक्रवार, 30 अक्टूबर 2026

एक लेखक के जीवन में प्रकाशक की भूमिका?!❤️

किताबें, विचार और बेहतर कल : SGSH PUBLICATION के पाँचवें स्थापना दिवस पर❤️
किसी पुस्तक का प्रकाशित होना एक विचार का समाज के बीच पहुँचना है। लेखक अपने अनुभवों, संवेदनाओं और प्रश्नों को शब्द देता है; प्रकाशक उन शब्दों को पाठकों तक पहुँचाने का माध्यम बनता है। इस साझा प्रयास से संवाद जन्म लेता है और समाज को स्वयं को देखने की एक नई दृष्टि मिलती है। SGSH PUBLICATION के पाँचवें स्थापना दिवस पर समस्त प्रकाशन परिवार, लेखकों, पाठकों और सहयोगियों को मेरी हार्दिक शुभकामनाएँ। यह अवसर आगे की साहित्यिक यात्रा के उद्देश्यों पर विचार करने का भी है। “किताबें • विचार • बेहतर कल”—इन शब्दों में एक बड़ी जिम्मेदारी समाई हुई है। बेहतर कल के लिए ऐसे विचार चाहिए जो मनुष्य को संवेदनशील बनाएँ, उसके विवेक को जगाएँ और उसे दूसरों के सुख-दुःख से जोड़ें। पुस्तक तभी हमारे जीवन में गहराई से उतरती है, जब उसे पढ़कर हम अपने व्यवहार, मान्यताओं और जिम्मेदारियों पर विचार करने लगते हैं। एक लेखक के रूप में मेरा मानना है कि साहित्य को जीवन के उन कोनों तक पहुँचना चाहिए जहाँ किसी की पीड़ा अनसुनी रह जाती है। किसान की चिंता, श्रमिक का संघर्ष, शिक्षक की विवशता, विद्यार्थी की जिज्ञासा, स्त्री का आत्मसम्मान और उपेक्षित मनुष्य की आकांक्षा—इन सबको अभिव्यक्ति देना साहित्य का महत्वपूर्ण दायित्व है। प्रकृति और आने वाली पीढ़ियों के प्रति हमारी जिम्मेदारी भी इसी संवेदना का विस्तार है। इस कार्य में प्रकाशक की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। रचना का चयन, सावधानीपूर्वक संपादन, सुंदर और पठनीय प्रस्तुति तथा पाठकों तक उसकी पहुँच—हर चरण पुस्तक की सार्थकता को प्रभावित करता है। नए रचनाकारों को अवसर देना और विभिन्न अनुभवों तथा विचारों के लिए स्थान बनाना साहित्यिक संसार को समृद्ध करता है। आज तेज गति से बहती सूचनाओं के बीच ठहरकर पढ़ने की आदत को सँजोना आवश्यक है। पुस्तक हमें किसी विषय के साथ समय बिताना सिखाती है। वह प्रश्न उठाने, तर्क समझने और अपने निष्कर्षों को परखने का अवसर देती है। ऐसी पाठकीय संस्कृति परिवारों, विद्यालयों, पुस्तकालयों और प्रकाशन संस्थाओं के सम्मिलित प्रयास से विकसित होती है। स्थापना दिवस पर मेरी कामना है कि SGSH PUBLICATION की यात्रा में रचनात्मक स्वतंत्रता, संपादकीय गुणवत्ता और लेखक-पाठक के बीच विश्वास को निरंतर बल मिले। ग्रामीण क्षेत्रों और छोटे नगरों की प्रतिभाओं को भी अपनी बात कहने के अवसर मिलें। अच्छी पुस्तकें अधिक लोगों की पहुँच में आएँ और पढ़ने पर सार्थक बातचीत बढ़े। हम जो लिखते और प्रकाशित करते हैं, वह किसी पाठक के मन में प्रश्न, आशा अथवा परिवर्तन का संकल्प जगा सकता है। इसलिए शब्दों के प्रति ईमानदारी ही साहित्यिक कार्य की सबसे मूल्यवान पूँजी है। SGSH PUBLICATION के पाँचवें स्थापना दिवस पर पुनः हार्दिक बधाई। साहित्य, विचार और रचनात्मकता की यह यात्रा निरंतर आगे बढ़े तथा मानवता, करुणा और विवेक से समृद्ध बेहतर कल के निर्माण में योगदान दे। शुभकामनाओं सहित लेखक : अशोक कुमार वर्मा “बिंदु”

सोमवार, 5 अक्टूबर 2026

जीवन का संतुलन ::सन 2099 की एक कथा

जीवन का संतुलन सन 2099 की एक कथा सन 2099 ईस्वी!
धरती का मानचित्र पूरी तरह बदल चुका था। समुद्र ने अनेक तटीय नगरों और गाँवों को अपने भीतर समेट लिया था। हिमालय सहित संसार के अनेक ग्लेशियर तेजी से पिघल चुके थे। सदानीरा कहलाने वाली कई नदियाँ बरसाती नालों में बदल गई थीं। कहीं पानी का अथाह विस्तार था, तो कहीं पीने के लिए एक बूँद भी दुर्लभ थी। ऊँची इमारतों, चमकते बाजारों और चौड़ी सड़कों वाले महानगर उजड़े हुए खड़े थे। बिजली, इंटरनेट और वातानुकूलित कमरों पर निर्भर रहने वाले लोग अब जंगलों, गुफाओं, पुराने किलों, खंडहरों और बचे हुए गाँवों में शरण खोज रहे थे। जिन्हें कभी खेती और पशुपालन पिछड़ेपन के प्रतीक लगते थे, वे अब थोड़ी-सी उपजाऊ भूमि और एक स्वस्थ गाय के लिए अपनी सारी जमा पूँजी देने को तैयार थे। ऐसे ही विस्थापित लोगों का एक समूह पहाड़ियों के बीच बसे छोटे से गाँव समग्रपुर पहुँचा। वहाँ मिट्टी और पत्थरों से बने घर थे। हर घर के सामने छोटा-सा बगीचा और वर्षा-जल संग्रह करने का कुंड था। गाँव के लोग सामूहिक खेती करते और आवश्यकताओं के अनुसार उपज बाँटते थे। समूह का नेतृत्व आरव नाम का एक युवक कर रहा था। उसने गाँव के बुजुर्ग से पूछा— “बाबा, आपके गाँव में न कोई बहुत धनी दिखाई देता है, न कोई भूखा। न बड़ी मशीनें हैं, न बड़े बाजार। फिर भी यहाँ का जीवन सुरक्षित कैसे बचा रहा?” बुजुर्ग मुस्कराए। उनका नाम आचार्य समन्वय था। वे लोगों को एक पुराने विद्यालय के खंडहर में ले गए। वहाँ धूल से ढकी अलमारी में कुछ पुस्तकें सुरक्षित थीं। उन्होंने एक पुस्तक निकाली, जिसके मुखपृष्ठ पर लिखा था— “क्रांति क्यों? कैसे?!” लेखक—अशोक कुमार वर्मा ‘बिंदु’ आचार्य ने कहा— “इस पुस्तक में लिखा है कि क्रांति अचानक पैदा नहीं होती। वर्तमान में जिसकी उपेक्षा की जाती है, वही भविष्य में बड़ी बाधा बनकर सामने आता है। किसी व्यक्ति की छोटी-सी असंतुष्टि को दबाओ, तो वह मानसिक विद्रोह बनती है। परिवार की समस्या की उपेक्षा करो, तो परिवार टूटता है। समाज की पीड़ा को अनसुना करो, तो सामाजिक संघर्ष जन्म लेता है। प्रकृति की चेतावनियों को नकारो, तो पूरी सभ्यता संकट में पड़ जाती है।” आरव ने बाहर सूखी हुई नदी की ओर देखते हुए कहा— “तो क्या हमारी यह दशा भी बहुत पहले लिए गए गलत निर्णयों का परिणाम है?” “हाँ,” आचार्य बोले, “मनुष्य ने वर्तमान को सुविधा समझा, पर उसके परिणामों को नहीं देखा। जंगल काटते समय उसने भविष्य की साँसों के बारे में नहीं सोचा। नदियों को दूषित करते समय आने वाली पीढ़ियों की प्यास को भूल गया। खेती को व्यापार और भोजन को केवल वस्तु बना दिया। गाँवों को उजाड़कर नगर बढ़ाए, फिर नगरों को ही जीवन की पूर्णता मान लिया।” वहीं बैठी एक वृद्ध महिला बोली— “लेकिन बाबा, उस समय लोगों ने परिवर्तन के आंदोलन भी तो चलाए थे?” आचार्य ने पुस्तक का एक और पृष्ठ खोला— “हाँ, सन 2011 से 2014 के बीच व्यवस्था-परिवर्तन की तीव्र माँग उठी थी। भ्रष्टाचार, काला धन, स्वदेशी, पारदर्शिता और जनभागीदारी जैसे विषय जनता के बीच आए। अन्ना हजारे और बाबा रामदेव जैसे लोगों ने उस असंतोष को स्वर दिया। पर सन 2014-15 के बाद आंदोलन अनेक राजनीतिक, वैचारिक और संगठनात्मक बाधाओं में उलझ गया।” “फिर आंदोलन समाप्त क्यों हो गया?” आरव ने पूछा। आचार्य ने उत्तर दिया— “क्योंकि जनता परिवर्तन तो चाहती थी, पर अपने व्यवहार को बदलना नहीं चाहती थी। वह व्यवस्था की आलोचना करती थी, पर मतदान के समय जाति, पंथ, दल, भय, लालच और व्यक्तिगत लाभ के घेरे में लौट जाती थी। लोग किसी उद्धारक की प्रतीक्षा करते रहे, जबकि व्यवस्था-परिवर्तन के लिए उन्हें स्वयं उत्तरदायी नागरिक बनना था।” एक बालक ने उत्सुकता से पूछा— “क्या किसी ने प्रयास जारी नहीं रखा?” आचार्य बोले— “प्रयास कभी पूरी तरह समाप्त नहीं होते। नेताजी सुभाषचंद्र बोस के विचारों से प्रेरित लोग, राजीव दीक्षित के स्वदेशी और विकेंद्रीकरण के समर्थक, देवेंद्र बल्हारा जैसे जन-जागरण में लगे व्यक्ति तथा अनेक अज्ञात कार्यकर्ता अपने-अपने स्तर पर काम करते रहे। लेकिन उनके छोटे-छोटे प्रयास व्यापक जनचेतना से नहीं जुड़ पाए। जनता उन्हीं दलों और नेताओं के पीछे चलती रही, जिनके पास आकर्षक नारे तो थे, मगर जीवन और प्रकृति के संतुलन का समग्र समाधान नहीं था।” रात होने लगी थी। गाँव के सभी लोग एक वृक्ष के नीचे एकत्र हुए। आचार्य ने मिट्टी पर एक वृत्त बनाया और उसके भीतर लिखा—जीवन। फिर उन्होंने वृत्त के चारों ओर चार शब्द लिखे— व्यक्ति—परिवार—समाज—प्रकृति। वे बोले— “जीवन इनमें से किसी एक का नाम नहीं है। जीवन संतुलन है, योग है, जोड़ है, पूर्णता और सम्पूर्णता है। ‘अल’, ‘आल’ या अंग्रेजी का ‘All’—इन ध्वनियों में भी समग्रता का भाव खोजा जा सकता है। पर शब्दों से अधिक महत्त्व उसके अनुभव का है। जब व्यक्ति स्वयं को सम्पूर्ण जीवन से अलग समझने लगता है, तभी असंतुलन आरम्भ होता है।” आरव ने पूछा— “अब हम क्या कर सकते हैं? बहुत कुछ तो नष्ट हो चुका है।” आचार्य ने कहा— “क्रांति का अर्थ केवल सत्ता बदलना नहीं। वास्तविक क्रांति जीवन की दिशा बदलना है। सबसे पहले अपने भीतर संतुलन स्थापित करो। फिर परिवार में सहयोग, गाँव में साझेदारी और प्रकृति के साथ सहजीवन विकसित करो। प्रत्येक गाँव को भोजन, पानी और ऊर्जा के मामले में यथासंभव आत्मनिर्भर बनाओ। भूमि, जल, वन और बीज को केवल व्यापारिक सम्पत्ति नहीं, आने वाली पीढ़ियों की धरोहर समझो।” अगले दिन से विस्थापित लोगों ने समग्रपुर के निवासियों के साथ मिलकर काम शुरू किया। वर्षा-जल के नए कुंड खोदे गए। सूखी नदी के किनारे छोटे बाँध बनाए गए। स्थानीय बीजों को खोजकर सुरक्षित किया गया। पशुपालन, खेती और बागवानी को अलग-अलग व्यवसाय न मानकर एक संयुक्त जीवन-चक्र बनाया गया। बच्चों की शिक्षा भी बदल गई। वे पुस्तकों के साथ खेत, जंगल, जल और अपने अंतर्मन को पढ़ना सीखने लगे। कुछ वर्षों बाद सूखी पहाड़ियों पर फिर हरियाली दिखाई देने लगी। पक्षी लौटने लगे और गाँव के कुओं में पानी बढ़ गया। एक दिन आरव ने बच्चों को वही पुरानी पुस्तक दिखाते हुए कहा— “हमारे पूर्वजों ने क्रांति को केवल सरकार बदलने की घटना समझ लिया था। इसलिए सरकारें बदलीं, चेहरे बदले, नारे बदले—लेकिन मनुष्य की आदतें और विकास की विनाशकारी दिशा नहीं बदली। वास्तविक क्रांति तब आरम्भ हुई, जब हमने स्वयं को प्रकृति, समाज और ब्रह्मांडीय जीवन से जुड़ा हुआ माना।” एक बालिका ने पूछा— “तो जीवन का सबसे सरल अर्थ क्या है?” आरव ने उत्तर दिया— “जीवन केवल मेरा जीवित रहना नहीं है। जीवन वह संतुलन है जिसमें मेरे साथ परिवार, समाज, पशु-पक्षी, पेड़-पौधे, जल, वायु और आने वाली पीढ़ियाँ भी सुरक्षित रहें। इनमें से किसी एक की उपेक्षा सम्पूर्ण जीवन की उपेक्षा है।” दूर क्षितिज पर सूर्य उग रहा था। उसके प्रकाश में पुस्तक के मुखपृष्ठ पर लिखे दो प्रश्न चमकने लगे— क्रांति क्यों? क्योंकि उपेक्षित वर्तमान एक दिन असहनीय भविष्य बन जाता है। क्रांति कैसे? अपने भीतर से आरम्भ करके—व्यक्ति से परिवार, परिवार से समाज, समाज से व्यवस्था और व्यवस्था से सम्पूर्ण प्रकृति तक संतुलन स्थापित करके। उस सुबह सन 2099 की उजड़ी हुई धरती पर लोगों को पहली बार समझ आया कि क्रांति विनाश का विस्फोट नहीं, बल्कि बिखरे हुए जीवन को फिर से जोड़ने की प्रक्रिया है। और जो समाज समय रहते अपनी असंतुष्टि, असमानता तथा प्रकृति की चेतावनी सुन लेता है, उसे भविष्य में विनाशकारी क्रांति की आवश्यकता नहीं पड़ती।

शुक्रवार, 4 सितंबर 2026

शिक्षक वास्तव में कौन?!

वास्तव में शिक्षक कौन है?
शिक्षक केवल वह व्यक्ति नहीं है जो निर्धारित पाठ्यक्रम पढ़ाता, उपस्थिति दर्ज करता और वेतन प्राप्त करता है। ये उसके पेशे से जुड़े कार्य हो सकते हैं, किंतु उसकी वास्तविक पहचान इससे कहीं व्यापक है। शिक्षक वह है जो विद्यार्थी के भीतर छिपी जिज्ञासा, विवेक, आत्मविश्वास और मानवीय चेतना को जाग्रत करता है। वह केवल उत्तर नहीं देता, बल्कि प्रश्न पूछने, सत्य खोजने और स्वतंत्र रूप से सोचने की क्षमता विकसित करता है। “शिक्षक कोई कर्मचारी नहीं है”—इसका अर्थ यह नहीं कि शिक्षक नियम, उत्तरदायित्व या संस्था से ऊपर है। इसका आशय यह है कि उसकी भूमिका को केवल नौकरी और वेतन तक सीमित नहीं किया जा सकता। कर्मचारी निर्धारित काम पूरा कर सकता है, लेकिन शिक्षक विद्यार्थी के व्यक्तित्व और समाज के भविष्य का निर्माण करता है। इसलिए शिक्षक को प्रशासनिक निर्देशों के साथ अपने ज्ञान, विवेक, संवेदना और नैतिक दायित्व का भी पालन करना पड़ता है। वास्तविक शिक्षक को अपने सम्मान में केवल फूल, माला, उपहार या प्रशंसा नहीं चाहिए। उसका सबसे बड़ा सम्मान तब होता है जब— विद्यार्थी जिज्ञासु बने और प्रश्न पूछने का साहस रखे। वह ज्ञान को अपने आचरण में उतारे। वह अन्याय, अंधविश्वास और भेदभाव से मुक्त होकर सोचे। वह अपने ज्ञान का उपयोग मानवता और प्रकृति के हित में करे। वह शिक्षक से आगे निकलकर स्वयं भी दूसरों के लिए प्रकाश बने। “शिक्षक के जीवन में तीसरे का महत्व नहीं”—इस कथन को संतुलित रूप से समझना आवश्यक है। शिक्षा का मूल संबंध शिक्षक और विद्यार्थी के बीच बनता है। इसमें विश्वास, संवाद, प्रेरणा और आत्मीयता होती है। यदि कोई तीसरा व्यक्ति सत्ता, भय, राजनीति या स्वार्थ के आधार पर इस संबंध को नियंत्रित करता है, तो शिक्षा की स्वतंत्रता बाधित हो सकती है। फिर भी परिवार, विद्यालय, समाज और व्यवस्था की सहयोगी भूमिका आवश्यक है। समस्या सहयोग से नहीं, अनुचित हस्तक्षेप से उत्पन्न होती है। शिक्षक क्रांतिकारी क्यों है? क्रांति का अर्थ केवल सत्ता-विरोध या उग्र परिवर्तन नहीं है। वास्तविक क्रांति अज्ञान से ज्ञान, भय से साहस, संकीर्णता से व्यापकता और निष्क्रियता से उत्तरदायित्व की ओर बढ़ना है। शिक्षक इस परिवर्तन का वाहक होता है। वह विद्यार्थियों को किसी व्यक्ति के पीछे आँख बंद करके चलना नहीं सिखाता; वह उन्हें प्रमाण, तर्क, अनुभव और मानवीय मूल्यों के आधार पर निर्णय लेना सिखाता है। लेकिन ज्ञान के आधार पर चलने का अर्थ मनमानी करना भी नहीं है। वास्तविक शिक्षक उचित नियमों का सम्मान करता है, अपनी बात की समीक्षा स्वीकार करता है और आवश्यकता पड़ने पर स्वयं भी सीखता है। वह किसी निर्देश को केवल इसलिए अस्वीकार नहीं करता कि वह किसी अन्य ने दिया है; वह उसे ज्ञान, न्याय और विद्यार्थी-हित की कसौटी पर परखता है। अतः वास्तविक शिक्षक वह है जो स्वयं निरंतर सीखता है, विद्यार्थी को उसकी नकल नहीं बल्कि उसका स्वतंत्र व्यक्तित्व बनने देता है और ज्ञान को जीवन तथा लोकमंगल से जोड़ता है। उसका सच्चा सम्मान चरण-स्पर्श में नहीं, बल्कि विद्यार्थी के जाग्रत विवेक और श्रेष्ठ आचरण में दिखाई देता है। शिक्षक पाठ नहीं भरता—वह अंतर्मन में प्रकाश जगाता

सोमवार, 3 अगस्त 2026

क्या नई पीढ़ी का अस्थायित्व देश को बदल कर रख देगा?!

😭विद्यार्थी चरितम 😭
हमारी एक पुस्तक में दिया गया है कि नई पीढ़ी का अराजक होना देश में क्रांति अर्थात बदलाव के लिए बड़ा सहायक होगा?! युवा पीढ़ी की बेरोजगारी, विचलन, उलझन, अशांति, अवज्ञा, असहयोग वर्तमान हालातों ऊपर उठने का भी कार्य कर सकता?!जिसमें पुरानी सारी धारणायें ढह जाएगी?! जिस श्रंखला में हमारी एक पुस्तक --"क्रांति क्यो? कैसे?" और... सत्ता को, शुद्धोधन रूपी सत्ता को नई पीढ़ी को सिद्धार्थ नहीं बनाना है अब भी... उसे सिद्धार्थ नहीं चाहिए अर्थात सिद्ध अर्थ नहीं चाहिए सिद्ध के लिए नहीं चाहिए जो एक बुजुर्ग , बीमार, लाश से शिक्षा लेकर देह के पार अपने देह के अंदर के चेतना, ब्रह्म अंश, ज्ञान दीप को सज्ज हो सके?! बुद्ध सनातन में जाने की ही परम्परा है क्यों न आज के सनातनी उसके विरोध में खडे हों?!एक विद्यार्थी जीवन को ब्रह्मश्चर्य आश्रम कहा जाता था लेकिन क्यों?!बुद्ध भी कहते थे कि किताबें रट लेने से क्या? जब अंतर ब्रह्म अंश को अवसर नहीं?! पुस्तक ::शुद्धोधन..?! लेखक ::अशोक कुमार वर्मा "बिंदु " ❤️भविष्य :: कथांश.?!❤️ www.akvashokbindu.blogspot.com ❤️ विश्व संविधान विश्व सरकार!!❤️ https://ruhelkhandsahinta.blogspot.com/2026/06/blog-post_18.हटम्ल

बुधवार, 15 जुलाई 2026

आखिर सिस्टम को उखाड़ फेंकने की जरूरत क्यों?!

😭 व्यक्ति का तत्व विकास कब?! 😭 😭व्यक्ति का तत्व विकास कब?!😭 स्वामी विवेकानंद ने कहा था कि शिक्षा का उद्देश्य है -अंतर्निहित शक्तियों का विकास!! लेकिन सत्तावाद, पूंजीवाद, सामंतवाद, जन्मजात उच्चवाद, जन्मजात निम्नवाद, जातिगत पुरोहितवाद आदि नहीं चाहता -प्रत्येक व्यक्ति की अंतर्निहित शक्तियों का विकास!! बस!सिस्टम ये चाहता कि सब जिन्दा तो रहें लेकिन जागरूक नहीं!! हर व्यक्ति का " संघर्ष प्रबंधन" क्या हो?! व्यक्ति के जीवन में "स्वतंत्रता " का महत्व क्या है?! गीता के "स्व धर्म "का मतलब क्या है? अरविंद घोष ने कहा था कि -स्वतंत्रता है - "आत्मा!" आखिर सिस्टम ऐसा क्यों नहीं जिसमें हर व्यक्ति को अवसर मिले अपनी अंतर्निहित शक्तियों के विकास को?! वर्तमान सिस्टम में जो विकास है वह व्यक्ति को करोड़पति हो जाने के बाद भी आत्महत्या, मानव अशांति को प्रेरित कर सकता है?!किसी को अपराधी बनाने को अवसर दे सकता है?! बाहर देश का भविष्य ठोकरें खा रहा और विधानसभाओं, संसद में अपराधियों की उपस्थिति क्या दर्शा रही है?! Ashok kumar verma bindu www.ashokbindu.blogspot.com
🎨 बैकग्राउंड: ऊपर: उगते सूर्य के साथ हल्का नीला आकाश 🌅 बीच में: ध्यान मुद्रा में व्यक्ति, शरीर के अंदर प्रकाश (आंतरिक शक्ति का प्रतीक) नीचे: भीड़/सिस्टम की धुंधली छवि (अज्ञानता और बंधन का प्रतीक) 🔴 मुख्य शीर्षक (Bold, केसरिया/लाल रंग में): 😭 व्यक्ति का तत्व विकास कब?! 😭 ✨ मुख्य संदेश (सफेद/पीला फॉन्ट, केंद्र में): “शिक्षा का उद्देश्य — अंतर्निहित शक्तियों का विकास!” लेकिन… ❌ सत्तावाद ❌ पूंजीवाद ❌ जातिगत भेदभाव ❌ जन्मजात उच्च-निम्न का भ्रम 👉 ये सब नहीं चाहते कि व्यक्ति जागरूक बने! बस इतना चाहते हैं — तुम जिंदा रहो… पर जागो मत!! 🧠 विचार के प्रश्न (बॉक्स में): 🔹 हर व्यक्ति का संघर्ष प्रबंधन क्या हो? 🔹 जीवन में स्वतंत्रता का वास्तविक महत्व क्या है? 🔹 गीता का “स्वधर्म” क्या है? 📖 “स्वतंत्रता ही आत्मा है!” ⚠️ कटु सत्य (नीचे गाढ़े फॉन्ट में): 👉 क्या वर्तमान सिस्टम व्यक्ति को करोड़पति बनाकर भी अशांत नहीं कर रहा? 👉 क्या यही सिस्टम अपराध और आत्मविनाश को जन्म नहीं देता? 👉 जब संसद और विधानसभाओं में अपराधी बैठें — तो देश का भविष्य कहाँ जाएगा? 🌱 समाधान (हरे रंग में): ✔ आत्मचिंतन ✔ स्वधर्म का पालन ✔ जागरूकता और साहस ✔ आंतरिक शक्ति का विकास 🕊️ अंतिम संदेश (बड़े फॉन्ट में): “जागो! स्वयं को पहचानो! तुम्हारी शक्ति ही तुम्हारी स्वतंत्रता है!” ✍️ क्रेडिट (नीचे छोटे फॉन्ट में): Ashok Kumar Verma ‘Bindu’ www.ashokbindu.blogspot.com⁠�

मंगलवार, 14 जुलाई 2026

नेता व पुराने राजनैतिक दल दोषी तो वोट क्यों?

बुजुर्ग शक्तिमान अशोक से कहता है कि -नेता व राजनैतिक दल यदि देश के हालातों के लिए दोषी हैँ तो उनको वोट क्यों?
यह बात एक गहरी सोच को सामने लाती है — और सवाल भी बिल्कुल सीधा है: 👉 “अगर नेता और राजनीतिक दल देश की स्थिति के लिए जिम्मेदार हैं, तो फिर उन्हें वोट क्यों दिया जाए?” इसका जवाब थोड़ा संतुलित तरीके से समझना ज़रूरी है: 🧠 1. वोट न देना समाधान नहीं है अगर हम वोट ही नहीं देंगे, तो फैसला फिर भी होगा — लेकिन हमारी भागीदारी के बिना। ऐसे में वही लोग जीतते हैं जो कम वोट में भी जीत सकते हैं। ⚖️ 2. लोकतंत्र में विकल्प बदलने का अधिकार है वोट देना सिर्फ किसी एक दल को जिताना नहीं है, बल्कि: खराब नेताओं को हटाने का तरीका है बेहतर विकल्प चुनने का मौका है और अगर विकल्प अच्छे नहीं हैं, तो नए विकल्प खड़े करने का अधिकार भी है 🔄 3. “वोट क्यों?” का असली जवाब वोट इसलिए देना चाहिए: ताकि गलत को रोका जा सके ताकि सही को मौका मिले ताकि सिस्टम पर जनता का दबाव बना रहे 👉 वोट न देना = अपनी शक्ति छोड़ देना 🧭 4. असली समस्या क्या है? कई बार समस्या सिर्फ नेता नहीं होते, बल्कि: जाति, धर्म के आधार पर वोट देना जागरूकता की कमी सही उम्मीदवार को न पहचानना 🔥 5. बुजुर्ग की बात का गहरा अर्थ बुजुर्ग शायद यह कहना चाहता है: “अंधे होकर वोट मत दो, सोच-समझकर दो” 💡 निष्कर्ष 👉 वोट देना जरूरी है, लेकिन समझदारी से देना उससे भी ज्यादा जरूरी है। 👉 अगर सभी खराब लगते हैं, तो बदलाव की शुरुआत खुद से और समाज से करनी होगी।

रविवार, 12 जुलाई 2026

वास्तविक मार्क्सवाद - साम्य वाद और उसका आधुनिक विकल्प?!

**वास्तविक मार्क्सवाद-साम्यवाद क्या है और इसका आधुनिक विकल्प**
1. **वास्तविक मार्क्सवाद - साम्यवाद का वैचारिक आदर्श** कार्ल मार्क्स साम्यवाद की आदर्श व्यवस्था मुख्य रूप से दो बड़े शोषणों को समाप्त करने के लिए डिज़ाइन की गई थी --। * पारिवारिक संसाधनों व्यक्तियों बच्चो और महिला श्रम का शोषण:-- पारंपरिक व्यक्तिगत/पूंजीवादी व्यवस्था में घर की महिला के ज्ञान और घरेलू श्रम का कोई आर्थिक मूल्य नहीं आंका जाता, जिससे उनका निरंतर शोषण होता है। गरीब मजदूर सभी उत्पादन और लाभ में बराबर के सहयोगी और हकदार भी। * वैचारिक वायरस (मानसिक थोपना):-- जब बच्चों के पालन-पोषण, सुरक्षा और भविष्य की पूरी जिम्मेदारी अकेले पिता या माता-पिता पर होती है, तो वे अनजाने में अपने विचार, अपेक्षाएं और रीति-रिवाज बच्चों पर थोपने लगते हैं। इससे बच्चे के प्राकृतिक 'सॉफ्टवेयर' (मूल प्रतिभा और स्वभाव) में वैचारिक 'वायरस' जन्म ले लेता है और उसकी प्राकृतिक मौलिकता विकृत हो जाती है। व्यक्तिवादी बाजार तंत्र से खरीदी बेची लाभ वैल्यू जनित हिंसक प्रतिष्ठा आधारित शोषण प्रदूषण जन्म लेने लगता हैं और जैसे जैसे विज्ञान विकसित होता जाता हैं शोषण प्रदूषण भी उतनी ही तेज गति से विकसित होता जाता है। इसको कोई रोक नहीं सकता है। **पारंपरिक साम्यवाद का समाधान**:-- **ग्रामीण कम्यून*" इस शोषण से मुक्ति के लिए मार्क्स ने 'कम्यून व्यवस्था' (सामूहिक ग्राम व्यवस्था) की कल्पना की थी। इसके तहत:-- ग्रामीण स्तर पर कृषि और अन्य सभी कार्य सामूहिक होंगे। सामूहिक भोजनालय, सामूहिक स्कूल-कॉलेज, शिक्षण-प्रशिक्षण और सामूहिक स्वास्थ्य-सुरक्षा की व्यवस्था होगी। बच्चा कम्यून की देखरेख में पलेगा-बढ़ेगा और अपने माता-पिता या भाई-बहन से केवल कुछ घंटों के लिए मिलने आएगा। इससे महिला का श्रम घरेलू गुलामी से मुक्त होकर समाज के लिए उत्पादक (Productive) बनेगा। इस तरह शोषण प्रदूषण का कारण खत्म हो जाएगा। कोई खरीदी बेची लाभ वैल्यू नहीं होगी। किसी को खुद की अपनी अलग से व्यवस्था करनी नहीं है। विवाह और आपसी संबंधों में पूर्ण स्वतंत्रता होगी;-- व्यवस्था कोई पारंपरिक रीति-रिवाज या बंधन नहीं थोपेगी। सभी के रहने के लिए समाज (कम्यून) द्वारा घर की व्यवस्था की जाएगी। 2. क्या वास्तविक साम्यवाद कभी लागू हुआ? (ऐतिहासिक कड़वी सच्चाई) नहीं, वास्तविक साम्यवाद आज तक दुनिया में कहीं भी पूर्ण रूप से लागू नहीं हो सका। रूस (सोवियत संघ) या चीन में जो व्यवस्था आई, वह आंशिक और विकृत थी। इसके पीछे मुख्य वैज्ञानिक और आर्थिक कारण निम्नलिखित थे: अभाव' में साम्यवाद का असफल होना। मार्क्स के समय विज्ञान और तकनीक बहुत प्रारंभिक अवस्था में थे। भौतिक शरीर का पेट भरने के लिए प्रचुर मात्रा में 'सामग्री' उपलब्ध नहीं थी। भुखमरी और अभाव के माहौल में यदि जन्म से ही आर्थिक स्वतंत्रता दे दी जाती, तो अराजकता फैलना तय था। सूचना तंत्र बहुत कमजोर था। आवागमन का साधन भी कोई अच्छा नहीं था। इसे एक सरल उदाहरण से समझा जा सकता है:-- स्थिति 'A' (अभाव): एक पार्टी में 2000 लोग आमंत्रित हैं, लेकिन भोजन केवल 500 लोगों का है। वीआईपी संस्कृति और प्रतिष्ठा के दबाव में वहाँ अफरा-तफरी मच जाएगी और शुरुआत के 200-300 लोग ही सारा भोजन खत्म कर देंगे। रूस और चीन में यही हुआ; वहाँ अभाव के कारण साम्यवाद के नाम पर 'पूंजीवादी नौकरशाही' या 'गरीबी का पूंजीवाद' स्थापित हो गया। स्थिति 'B' (प्रचुरता): यदि 2000 लोगों के लिए पर्याप्त जगह और असीमित भोजन हो, तथा समय की कोई पाबंदी न हो, तो लोग आराम से घूम-फिरकर अपनी पसंद का स्वाद लेंगे। वहाँ कोई छीना-झपटी या अराजकता नहीं होगी। थोड़ा विषय से बाहर -- ( कुछ लोगों का प्रश्न हो सकता है कि चीन रूस की आर्थिक स्थिति थोड़ा ठीक क्यों है? तो उसका कारण वहां आठवीं से तकनीकी स्तर की शिक्षा के साथ तकनीकी प्रेक्टिकल की तकनीक दी जाती थी, इसलिए वहां बच्चे दसवीं तक खुद का घरेलू उद्योग से उत्पादन कर बाजार में बेचकर अपना पूरा खर्च खुद उठा लेते थे तो माता पिता का पैसा खर्च नहीं होता था वह बाजार से मांग में वृद्धि से रोजगार में वृद्धि होती चली गई। पर आगे जाकर यदि दूसरे देश चीन का उत्पाद की मांग नहीं करे तो चीन का विकास रुक भर नहीं जाएगा आर्थिक चपेट में आ जाएगा। रूस आर्थिक चपेट में आ चुका है चुकी ऐसा अमेरिका द्वारा वेन होने से बाहर की मांग रुक गई है ) चूंकि उस समय रूस और चीन में वैज्ञानिकी विकसित नहीं होने के कारण घर चलाने की जिम्मेदारी अंततः परिवार के मुखिया (पिता) पर ही बनी रही, इसलिए वहाँ भी लाभ, मूल्य, खरीदी-बिक्री और प्रतिष्ठा पर आधारित सामाजिक ढांचा ही काम करता रहा। परिणामतः, पूंजीवाद ही अलग-अलग रूपों में चलता रहा: रूस और चीन:-- गरीबी और अभाव की प्रधानता पर आधारित राज्य-पूंजीवाद। शुरुआती भारत:-- बीचों-बीच का संतुलन (मिश्रित अर्थव्यवस्था)। अमेरिका:-- पूर्णतः लाभ और व्यक्तिगत प्रधानता पर आधारित शुद्ध पूंजीवाद। 3. आधुनिक युग और संपूर्ण समाधान, पारिवारिक श्रम-सहयोगी अर्थव्यवस्था (ULM मॉडल) आज विज्ञान और टेक्नोलॉजी का अभूतपूर्व विस्तार हो चुका है। अब हम कृषि युग से निकलकर बड़े पैमाने पर इंफ्रास्ट्रक्चर और उत्पादन के युग में हैं। इसलिए, मार्क्स के पुराने 'ग्रामीण कम्यून' की जगह आज नगरीय कम्यून की आवश्यकता है। रजवाड़ा व्यवस्था में आवागमन सूचना तंत्र अभाव की वजह से जिस पारिवारिक श्रम सहयोगी व्यवस्था की मान्यता खत्म कर दी गई थी आज वह अभाव खत्म हो चुका है। राजवाड़ा व्यवस्था से पहले कृषि कबीला संघ सिंधु घंटी सभ्यता तक पारिवारिक श्रम सहयोगी लेनदेन उत्पादन पर आधारित थी। जहां सामूहिक भोजनालय सामूहिक कृषि होती थी। ULM नगरीय कम्यून का स्वरूप:--। वर्टिकल रहन-सहन: कम से कम 20 लाख लोगों की आबादी का एक आधुनिक, वर्टिकल (गगनचुंबी और सुनियोजित) नगरीय मॉडल का आधुनिक टेक्नोलॉजी से सुसज्जित पर्यावरणीय नगर हो । स्वास्थ्य शिक्षण प्रशिक्षण सभी इंफ्रास्ट्रक्चर अभी तक की वैज्ञानिकी शोध खोज की पूर्ण टेक्नोलॉजी के साथ खड़ा हो ताकि भागम भाग की जिंदगी खत्म हो। जनसंख्या का सही अनुपात:- चुकी अब बजट की जरूरत नहीं तो शिक्षण प्रशिक्षण स्वास्थ्य सेवाएं सभी इंफ्रास्ट्रक्चर पूर्ण टेक्नोलॉजी के साथ खड़े होगे, हर नगर समान होगे। अतः कम से कम 20 लाख की आबादी होने से स्कूल, कॉलेज, एडवांस शिक्षण-प्रशिक्षण और विश्वस्तरीय स्वास्थ्य सेवाओं का इंफ्रास्ट्रक्चर पूरी तरह आत्मनिर्भर और उपयोगी हो जाता है। इससे मानव, जीव और प्रकृति का शोषण का कारण खत्म होता है, और मनुष्य की रचनात्मकता का शत-प्रतिशत उपयोग समाज के लिए हो पाता है। चिंता से मुक्ति:-- भय और भूख की प्राकृतिक कारण को इस व्यवस्था के मुख्य उद्देश्य व्यक्ति और परिवार को 'जीवन अर्थ' (रोटी, कपड़ा, मकान, स्वास्थ्य, सुरक्षा) की बुनियादी चिंताओं से मुक्त करना है, ताकि समाज से तनाव, कठोरता, प्रदूषण और दुष्टता का समूल नाश हो सके। जन्म से पूर्ण आर्थिक स्वतंत्रता रुचिकर जीवन व्यवस्था। खुद के व्यवस्था खुद को नहीं करनी पड़े। व्यक्तिगत, पारिवारिक और सामूहिक व्यवस्था का नया संतुलन:--। यह व्यवस्था पुरानी साम्यवादी भूलों को सुधारते हुए एक सुंदर संतुलन बनाती है । व्यक्तिगत स्तर:-- व्यक्तिगत स्वतंत्रता और इच्छा के अनुरूप लेन-देन। पारिवारिक स्तर:- परिवार के आकार और जरूरत के आधार पर सुंदर और सुरक्षित आवास की व्यवस्था। सामूहिक स्तर:- भोजनालय, शिक्षा, तकनीकी प्रशिक्षण, स्वास्थ्य सेवाएँ, सभी सुख सुविधाएं साधन और सुरक्षा पूरी तरह सामूहिक और निःशुल्क होंगी। जन्म से आर्थिक स्वतंत्रता होगी। कोई किसी पर आपस में निर्भर नहीं होगा जैसा अभी है, सभी की निर्भरता व्यवस्था के केंद्र में होगी। जैसे परिवार में होता हैं। संबंधों में तरलता और मोबाइल डिजिटल फ्रीक्वेंसी मैचिंग की व्यवस्था। विवाह या आपसी संबंधों के लिए यह आधुनिक व्यवस्था कोई जटिल नीति-नियम या थोपे गए संस्कार नहीं बनाएगी, बल्कि इसे पूरी तरह वैज्ञानिक और स्वतंत्र कर देगी सभी की रुचिकर स्वतंत्र संबंधों के लिए। * डिजिटल व्यवस्था:,-- व्यवस्था एक ऐसी उन्नत डिजिटल/मोबाइल प्रणाली विकसित करेगी, जहाँ 20 वर्ष की आयु पार करने पर प्रत्येक स्त्री-पुरुष अपनी रुचियाँ, आदतें और वैचारिक प्राथमिकताएँ दर्ज कर सकेंगे। फ्रीक्वेंसी मैचिंग:-- डिजिटल तकनीक के माध्यम से लोग अपने अनुकूल 'फ्रीक्वेंसी मैचिंग' (समान वैचारिक और मानसिक स्पंदन / धारणा गत मैचिंग) वाले जीवनसाथी या मित्रों को अत्यंत सरलता और तरलता से ढूंढ सकेंगे। अनुकूलन:- व्यवस्था उनके चयन के बाद उनके आपसी अनुकूलन के आधार पर उनके सुखद विवाह और आवास की गरिमामयी व्यवस्था कर देगी। निष्कर्ष:-- आज समस्या विज्ञान के आविष्कारों की या मनुष्य के जीने की कला (जीवन विधा) की नहीं है । असली समस्या 'जीवन अर्थ' (आर्थिक लेन-देन) के पुराने और त्रुटिपूर्ण ढांचे की है। आज जब विज्ञान के पास प्रचुर मात्रा में उत्पादन करने की क्षमता है, तब ULM टीम द्वारा प्रस्तुत "पारिवारिक श्रम-सहयोगी आर्थिक मॉडल" ही एकमात्र तार्किक और वैज्ञानिकी समानांतर मार्ग है, जो मनुष्य को भय और भूख की चिंताओं से मुक्त कर प्रेमानंद से परमानंद की ओर गति अग्रसर हो जानी तय हो जाता है। यूनिवर्सल लाइफ मैनेजमेंट का app आ गया है । सभी सदस्य नीचे दिए लिंक पर क्लिक करके तुरंत ही जुड़ें और अपना सदस्य Community कार्ड प्राप्त करे - Powered by Kutumb App https://primetrace.com/group/450702/post/1190430544?utm_source=android_post_share_web&referral_code=OVPQF&utm_screen=post_share&utm_referrer_state=PENDING?ref=OVPQF

शनिवार, 30 मई 2026

गीता का धर्म क्या है??

❓ धर्म क्या है? क्या धर्म सिर्फ मजहब, जाति, परंपरा है? या कुछ और…?
📖 श्रीकृष्ण कहते हैं: 👉 “सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज” अर्थ: 👉 सभी बने-बनाए धर्मों (बाहरी पहचान) को छोड़कर 👉 सत्य, चेतना और परमात्मा की शरण में आओ! ⚡ फिर सवाल उठता है: अगर सब धर्म छोड़ने हैं, तो “धर्म की रक्षा” का क्या मतलब है? 💡 गीता का उत्तर: ✔️ धर्म = कर्तव्य (Duty) ✔️ धर्म = सत्य का साथ ✔️ धर्म = न्याय और संतुलन ✔️ धर्म = मानवता + चेतना 🌍 जब-जब क्या नष्ट होता है? 👉 मजहब नहीं… 👉 सत्य, न्याय और मानवता का पतन होता है! तब-तब 👉 दिव्य शक्ति प्रकट होती है 👉 संतुलन (धर्म) को पुनः स्थापित करने! 🚩 निष्कर्ष: 👉 धर्म कोई “नाम” नहीं है 👉 धर्म कोई “सम्प्रदाय” नहीं है धर्म = सही कर्म + सच्ची चेतना ✨ संदेश: जाति, मजहब, लोभ, लालच से ऊपर उठो! अपने भीतर के सत्य धर्म को पहचानो! 📌 (www.ashokbindu.blogspot.com⁠�) ✍️ Ashok Kumar Verma “Bindu”

शुक्रवार, 22 मई 2026

आखिर क्यों सामाजिकता के दंश?!😭😭

समाज में किससे प्रेरणा मिलती है?!अब कौन वास्तव में जाति मजहब, लोभ लालच से हट कर मानव शांति, मानवता, न्याय आदि के लिए प्रेरणा देता है? एक वार्ड में पड़ोस से एक घर में चोर!चोरी करने वाला जाने, जिसके यहां चोरी हुई वो जाने असलियत? लेकिन चोर की बिरादरी के लोग व चोर की बिरादरी के नेता चोरों के ही साथ!! कटरा /शाहजहांपुर!!एक वार्ड में यह चर्चा का विषय बना हुआ है कि अरे उसे तो फंसा दिया गया?!एक बिरादरी के बच्चे बच्चे तक यही कहते नजर आ रहे हैं? इसका मतलब लोगों को धर्म, भक्ति, ईश्वर आदि से बिल्कुल मतलब नहीं और न ही नेताओं को न्याय व सर्वहित से मतलब है. दरअसल बात यह है कि कटरा के एक वार्ड एक मकान के अंदर चोर घुसे। जिनमें से एक को देख लिया गया. जो कि पड़ोस में ही एक मकान से था। अब उस चोर की बिरादरी के लोग व बच्चा उस चोर के समर्थन में खडे हैं।
एक वार्ड में पड़ोस से एक घर में चोर!चोरी करने वाला जाने, जिसके यहां चोरी हुई वो जाने असलियत? लेकिन चोर की बिरादरी के लोग व चोर की बिरादरी के नेता चोरों के ही साथ!!

शनिवार, 4 अप्रैल 2026

सम्पादकीय ::पुस्तक "क्रांति क्यों? कैसे?"

लेखक का विचार है कि सन 2011 ई0 से विश्व भर में 90 प्रतिशत मानव की हालत हमारे लिए विचारणीय है?क्यों, लेखक की हालत में क्या लेखक के इस विचार से सुधारात्मक होगी? “अपना काम बनता , भाड़ में जाये जनता”- ऐसा कहने वाले कैसे हैं?ये वे ही जाने। अनेक देशों में सत्ता परिवर्तन के लिए जनता सड़कों पर उतरी लेकिन इससे क्या मिला?व्यवस्था परिर्वतन के लिए विकल्प भी चाहिए।सत्ता परिवर्तन से सब कुछ नहीं बदलता, आखिर व्यवस्था परिवर्तन हेतु नई व्यवस्था का विकल्प क्या है पुरानी व्यवस्था खत्म कर ? लेखक का मानना है कि वर्तमान नेता, दलों, सिस्टम के पास समस्यों के लिए क्या समाधान है व्यवस्था में बदलाव किए बिना। जैसे कि 75 साल बाद मुम्बई डूबने वाली है, कलकत्ता डूबने वाला है।इसके लिए वर्तमान सिस्टम के पास ,वर्तमान नेताओं के पास, वर्तमान दलों के पास क्या समाधान है? कोई विचारक या दार्शनिक ठीक कहता है कि कोई भी समस्यों को खत्म करने के लिए वर्तमान व्यवस्था, वर्तमान तंत्र को खत्म किये बिना समाधान करने में क्या समर्थ है? क्रांति की आवश्यकता है लेकिन कैसे ? वर्तमान जनतन्त्र भी क्या सफल है?समस्याओं के समाधान को?जनता भी जाति, मजहब, लोभ लालच आदि से ऊपर उठ कर अपनी सरकार चुनने की क्या सामर्थ्य रखती है? कृषि योग्य कम होती भूमि, खाद्य मिलावट, नशा व्यापार, नब्बे प्रतिशत जनता की आय 15000 से कम आदि अनेक स्थितियां, भूमिगत कम होता जल स्तर, बेरोजगारी, अस्वस्थता,रिश्वतखोरी,दहेज व्यवस्था, मंहगी शादियां, घरेलू हिंसा, बढ़ती अराजकता , गिरता शिक्षा का स्तर, ज्ञान के आधार पर चलने की किसी की जिम्मेदारी नहीं….आदि आदि।
आखिर क्रांति की आवश्यकता क्यों नहीं?क्यों नहीं क्रांति? मानव शांति, आर्थिक लोकतंत्र, सामाजिक लोकतंत्र आदि के लिए कब बदलाव की बयार ? यह उद्गार व्यंग्यात्मक और विद्रोही है। लेखक का यह कहना चाहता है कि वर्तमान दुनिया में इतनी समस्याएं हैं — युद्ध, हिंसा, आर्थिक असमानता (अमीर-गरीब की खाई), सामाजिक भेदभाव (जाति, लिंग, वर्ग आदि आधारित अन्याय) — कि क्रांति की सख्त आवश्यकता है। फिर भी, समाज सुस्त और निष्क्रिय क्यों है?वह पूछ रहा है: इतनी पीड़ा और अन्याय के बावजूद लोग क्रांति क्यों नहीं करते? बदलाव की प्रेरणा कब आएगी?"मानव शांति" से तात्पर्य विश्व स्तर पर युद्ध-विराम और सद्भाव से है।"आर्थिक लोकतंत्र" का अर्थ है पूंजीवाद या असमान वितरण के खिलाफ — जहां हर व्यक्ति को आर्थिक अधिकार और अवसर समान रूप से मिलें (जैसे समाजवादी या मार्क्सवादी विचारों से प्रेरित)।"सामाजिक लोकतंत्र" से सामाजिक समानता, जाति-उन्मूलन, लैंगिक न्याय आदि का संकेत है।"बदलाव की बयार" एक रूपक है — जैसे हवा की तरह ताजा और तेज परिवर्तन की लहर कब चलेगी?यह पंक्ति क्रांतिकारी विचारधारा को दर्शाती है, जो जयप्रकाश नारायण की "संपूर्ण क्रांति" या मार्क्सवादी विचारों से प्रेरित लगती है — जहां सुधार पर्याप्त नहीं, मूल व्यवस्था में आमूल बदलाव (क्रांति) जरूरी है। यह समाज की निष्क्रियता पर तंज कसती है और लोगों को जागृत करने का आह्वान है कि अब समय आ गया है कि बड़े परिवर्तन के लिए उठ खड़े हों। "आखिर क्रांति की आवश्यकता क्यों नहीं?" → आखिरकार, क्रांति (मूलभूत बदलाव या आमूल परिवर्तन) की जरूरत क्यों नहीं है?"क्यों नहीं क्रांति?" → क्रांति क्यों नहीं होनी चाहिए?"मानव शांति, आर्थिक लोकतंत्र, सामाजिक लोकतंत्र आदि के लिए कब बदलाव की बयार?" → मानव समाज में शांति, आर्थिक लोकतंत्र (संपत्ति और संसाधनों का समान वितरण), सामाजिक लोकतंत्र (समानता और न्यायपूर्ण समाज) आदि प्राप्त करने के लिए बदलाव की लहर (सकारात्मक परिवर्तन की हवा) कब आएगी। संक्षेप में यह असंतोष की पुकार है दुनिया की समस्याओं को देखते हुए क्रांति न केवल जरूरी है, बल्कि अपरिहार्य है — फिर देरी क्यों लेखक कहता है कि दुनिया में बड़े लोगों की हालत भी क्या है? उनके रहते मानवता विवश क्यों?मानव अशांति, विश्व अशांति क्यों? लेखक कहता है कि लॉक डाउन के दौरान वह महससू करता है कि लॉक डाउन सौ साल तक हो ही जाना चाहिए । प्रकृति में समस्याएं खत्म। मनुष्य अब समस्या बन चुका है प्रकृति के सामने। ऐसे में लेखक जगत में संहारक शक्ति को विकराल होते देख रहा है। आखिर पूंजीवाद, सत्तावाद ,सामंतवाद कब तक?प्रकृति विदोहन कब तक?वर्तमान नेताओं, दलों से उम्मीदें कब तक? एक एक व्यक्ति, एक एक जर्रा जमीन, प्रकृति के प्रत्येक घटक के हित को अब नया दल, नया नेता चाहिए। ऐसे में एक ओर कुछ लोग ईमाम मेंहदी अर्थात कल्कि महाराज के इंतजार में हैं लेकिन इस इंतजार में नया सृजन, नया पालन बीमार होता जा रहा है।संहारक ही उभर रहा है।वह संहारक किस दिशा में जायेगा ? कभी कभी बीमारी इतनी भयानक हो जाती है कि चिकित्सक अपने हाथ खड़ा कर लेता है और ईश्वर के भरोसे रह मरीज को अस्पताल से घर ले जाने को कहता है? जब पंच तत्व, पूरी पृथ्वी ही बीमार हो जाएगी ,प्रदूषित हो जाएगी तो सकारात्मक ऊर्जा भी क्या करेगी? जो मानव समस्या बन चुका है प्रकृति अभियान के लिए ,उसका समाधान क्या है? लेखक कहता है कि ऐसे में क्रांति की जरूरत क्यों नहीं?यहाँ क्रांति से मतलब सुधार के लिए बदलाव को स्वीकार करने भर से है। यदि नहीं तो हादसे घटने प्रकृति में स्वाभाविक हैं। "अशोकबिन्दु ठीक कहते हैं कि जब देश गुलाम हो रहा था तो देश की जनता व राजा एक जुट नहीं थे इसी तरह आजकल भी है।नेता और जनता समाज व देश में अमन व शांति के लिए एक जुट नहीं हैं। जो गांधी का विरोध करते हैं वे भी कब नेता जी सुभाषचंद्र बोस,भगत सिंह के रास्ते पर चल रहे हैं?कुछ लोग अब मुसलमानों को दोष दे रहे हैं लेकिन जिस गांव व वार्ड में मुसलमान नहीं रहते वहां क्या सब ठीक है ?और जो जातिगत आरक्षण का विरोध कर रहे हैं वे क्या अन्य जातिगत व्यवस्था का क्या विरोध कर रहे हैं?बात को समझो, जागो तभी सबेरा।जय भारत ,जय भारतीयता। " ठीक ही तो है भीड़ का मुकाबला भीड़ ही कर सकती है लेकिन " सवा लाख से एक लड़ाऊं " की दशा के लिए हजार में मुश्किल से एक भी नहीं मिलेगा? यदि मिलेगा भी तो जनता उसने साथ कितनी खड़ी? ऐसे में भी जो धर्म के नाम पर भीड़ में हर घर आते भी हैं सिर्फ चंदा और वोट मांगने लेकिन रोजमर्रे की जिंदगी में वे क्या करते हैं? 👍क्रांति तो वो लिखते हैं जिसे हार जीत की तमन्ना नहीं, मरने मारने की तमन्ना नहीं, पक्ष विपक्ष की तमन्ना नहीं!👌 👍जय हो गुरु गोविंद सिंह !💐 जयगुरुदेव ठीक कहते थे कि दिल्ली की गद्दी से देश का भला नहीं होगा वहां तो भूतों का डेरा है और वर्तमान नेता, दल से भी नहीं। इस बीच गुरु गोविंद सिंह व उनके बच्चों को स्मरण करते हुए शेष फिर!!

गुरुवार, 8 जनवरी 2026

क्रांति : क्यों ?कैसे?पुस्तक से....

हमारी 100+पुस्तकों में से एक पुस्तक - "क्रांति: क्यों?कैसे? का एक अध्याय से... लेखक :: अशोक कुमार वर्मा ' बिंदु ' पुस्तक :: क्रांति : क्यों ? व कैसे? अध्याय :: आत्महत्या..?!
"और ये 1947 ई0 की आजादी के बाद भी आम आदमी की आजादी कैसी?" अर्थ: 1947 में भारत आजाद हुआ, लेकिन आम आदमी की सच्ची आजादी (आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक) कैसी है? अभी भी भ्रष्टाचार, असमानता, गरीबी, जातिवाद और दबाव बाकी हैं। आजादी नाम की है, लेकिन वास्तविक स्वतंत्रता सीमित। "ये देह के रहते जब जिंदगी ही सजा हो जाये तो कुर्बानी की परंपरा को स्वीकार करते हुए मानवता, न्याय, समता, नैतिकता, मानव शांति, समाज शांति आदि के लिए एक व्यवस्था को सज्ज हो जाना प्रासंगिक नहीं क्या?" अर्थ: जब शरीर के कारण जीवन ही सजा (दुखपूर्ण बंधन) बन जाए, तो बलिदान की परंपरा (जैसे ईसा या गुरु गोबिंद सिंह की) को अपनाना चाहिए। इसके लिए खुद को तैयार (सज्ज) करना – एक नई, बेहतर व्यवस्था बनाने के लिए त्याग करना – क्या यह प्रासंगिक नहीं है? यह प्रश्न वास्तव में सकारात्मक उत्तर मांगता है: हाँ, बहुत प्रासंगिक है। उच्च मूल्यों (मानवता, न्याय, समानता, नैतिकता, शांति) के लिए बलिदान जरूरी है, तभी समाज बदल सकता है। हे मनुज! तू कर्म कर,प्रार्थना कर,खामोश रूहानी आंदोलन में रह कर। कर्मों के फल की इच्छा न कर। अपने अन्तस् ऊर्जा, चेतना के अहसास, अपने हृदय में दिव्यता की उपस्थति के अहसास में रहकर बस कर्म करे जा। जब अरस्तू के पास वह युवक पहुँचा था जो कि आत्महत्या का विचार रखता था। आत्महत्या वास्तव में क्या है? आत्महत्या वह स्थिति है जिसमें व्यक्ति अपने देह, अन्य देह, अपनी आत्मा, अन्य देह की आत्मा को वक्त देना बंद कर देता है या फिर वक्त देने से काफ़ी दूर निकल जाता है -मानव निर्मित व्यवस्था में उलझ जाना ऊपर से वह व्यवस्था भी जिसमें  उसकी दैहिक, दैविक ,भौतिक किसी तरह की समस्या से उसे देहान्त से पूर्व मुक्ति नहीं मिलती। जो युवक अरस्तू के पास एक उम्मीद से आया था कि उसके अंदर आत्महत्या के भाव आने लगे थे लेकिन वह अपने परिवार, समाज, विभिन्न संस्थाओं में उस भाव से मुक्त नहीं हो पा रहा था। लोग उससे कहते तो थे कि आत्महत्या करना गलत है, आत्महत्या करना पाप है लेकिन कोई उसे समाधान देता नहीं था। लेकिन समाज में यह तो एक अच्छाई अभी जिंदा थी कि कुछ लोगों ने सुझाव दिया था कि अरस्तू के पास जाओ। अरस्तु के पास वह आया और बोला कि मेरे में आत्महत्या के भाव आते हैं तो अरस्तु बोल पड़ा-” तब फिर मेरे पास क्यों आये?जाओ आत्महत्या कर लो जाकर? “ “आप भी ,आप किसी बात करते हो?इससे अच्छा तो समाज था कि वह कहता था कि आत्महत्या करना पाप है? “ अरस्तु बोला - “ इससे क्या ? लेकिन समाज के पास, तंत्र के पास तुम्हारे समस्या का समाधान तो नहीं था?उसने तुम्हें समाधान दिया तो नहीं?”  खामोशी… “ समाज तो भीड़ तो मुर्दा हो चुकी है। उसके पास समाधान नहीं, मानवता नहीं।उसके पास उन्माद है, हिंसा है, जबरदस्ती है, बदले का भाव है, मतभेद हैं, अनेक कुरीतियां हैं, अंध विश्वास हैं….. आदि आदि लेकिन समाधान नहीं है। अब मेरे पास आ ही गये हो तो बस अब मेरे पास रहो।कुछ नया अपनी ओर से सोंचना बंद कर दो? “ “......और ये भाव आत्म हत्या का? “ “आने दो उसे ,तुम उससे अपने को अलग कर लो ।अपने देह को वक्त दो, हमारे देह को वक्त दो, अपनी हमारी आत्मा को वक्त दो।अपने आस पास  की व्यवस्था, हमारे संदेशों, हम दोनों की वार्ता को वक्त दो। “ बुद्ध ने अंगुलिमान के साथ भी क्या किया था?बुद्ध उससे बोले थे लंबी वार्ता के बाद कि हममें तुममें कोई फर्क नहीं।मैं जाग चुका हूं  तू जागने वाला है।कैसे?यह कैसे? तू मेरे साथ आ जा। लेकिन अरस्तु अपने आखिरी वक्त पर अज्ञातवास में था।आखिर क्यों?लोगों के काम।तो आओ लेकिन दूसरों के लिए बोझ मत बनो। अपना देह का अभ्यास इतना तो मजबूत हो ही कि अपने देह को चलाते -फिराते रहो, देहान्त के वक्त तक भी लेकिन ये कैसे सम्भव है?व्रत का मतलब अपने आराध्य को याद कर भूखे रहना नहीं है सिर्फ वरन उस व्यवस्था, दशा से जुड़ना है जो इस देह को चला रही है।उससे जुड़ने के बाद यह देह के कारण हम परेशान नहीं होंगे लेकिन होता क्या है ?हम अपने देह, अपनी आत्मा, अन्य देह, अन्य देह की आत्माओं को वक्त देना बंद कर देते हैं और दुनिया की वस्तुओं, समाज की मृत व्यवस्था, मनुष्यों की बनावटी व्यवस्था में उलझ जाते हैं।
सिद्धार्थ से बुद्ध बनने का रास्ता क्या है?सिद्धार्थ की सोंच ,नजरिया, धारणा जो उसने अपने देह, राज महल में रहने वाली अन्य देहों के बारे में बना रखी थी लेकिन जब वह नगर की यात्रा पर निकला तो वह सारी सोंच, नजरिया, धारणा धराशायी हो गई और अब वह उलझ सा गया।अब समाधान क्या? व्यक्ति भी क्या हो गया है?व्यक्ति का व्यक्तित्व धराशायी हो गया है।धराशायी नहीं हुआ है तो होने वाला है आगे चल कर? लगे हैं….रात दिन एक कर कम्पटीशन में, प्रतिस्पर्धा में, कैरियर बनाने में लेकिन कायनात को,अपने देह को, अपने आत्मा को वक्त देने को फुर्सत नहीं? कोई पद आगे चल कर पा भी गये तो क्या? पत्नी, पति, बच्चे, गाड़ी बंगला, पार्टियां, रिश्तेदारियां,माफिया तंत्र, खाद्य मिलावट, नशा व्यापार, रिश्वतखोरी, जातिवाद, भीड़ हिंसा, मजहबी उन्माद…..लेकिन अपना व्यक्तित्व?! अपना व्यक्तित्व जो प्रकृति अभियान में, ईश्वर अभियान में, ब्रह्मण्ड चेतना में वह जो था उससे भी अब नीचे स्तर पर ?और ऊपर से मानव व्यवस्था, समाज, जनपद, राज्य के अंदर की विभिन्न नकरात्मक स्थितियां, उनके बीच असुरक्षा का भाव..?! 👍अशोक कुमार वर्मा ' बिंदु ' www.ashokbindu.blogspot.com www.akvashokbindu.blogspot.com

बुधवार, 21 मई 2025

मेरी एक पुस्तक ' संगणकेश ..?! ' का एक अंश :: अशोकबिन्दु

पुस्तक : संगणकेश ..?! लेखक :: अशोक कुमार वर्मा 'बिंदु'
सीरिया से महिलाओं बच्चों की एक टोली हथियारों से सज्ज आगे पूर्व की ओर बढ़ती जा रही थी। जिसमें कोई भी पुरुष न था। एक ओर किसी भू भाग पर भयानक जंगल के बीच एक बुजुर्ग बांस के बाड़ेबंदी के बीच एक टीले पर आंख बंद बैठे हुए था। कुछ स्त्रियां उसके समीप बैठी हुई थीं। महिलाओं बच्चों की उस टोली ने भी हथियार छिपा कर वहां रुकना पसन्द किया। चार औरतें चारों दिशाओं में पेड़ पर चढ़ कर सुरक्षा को तैनात हो गयी थीं। भोजन …पानी …?! बच्चों की दशा देख कर कुछ महिलाओं ने आगे जाने की सोंची। यहां रुकने से क्या फायदा ?यहां तो ये आंख बंद कर बैठा है? लगभग छह सात लोग ही बचे जिनमें कोई बालक या बालिका न थी सबके सब विभिन्न उम्र की औरतें थीं। लगभग पंद्रह दिन बाद उनमें से दो बुजुर्ग, एक अधेड़ व एक युवा औरत रुकी रह गयी थीं। शेष सब चली गईं। यहां रुकने से क्या फायदा ? संगणक जो व्यवस्था है, वह नेचर व ब्रह्मण्ड में भी चेतना के एक स्तर पर है। यहाँ तक कि वह हर प्राणी - वनस्पति के अंदर भी है। वह है तो उसके होने का कारण भी है।वह कारण ही संगणकेश है। जब हम जीवन के इस पड़ाव रोटी कपड़ा मकान, इंद्रियों, देह आकर्षण, देह सुख दुःख आदि में ही अपना मन व वक्त लाये रखे, अपना सोंच व नजरिया लगाये रक्खे तो हमारा मन ,वक्त, सोंच आगे चेतना स्तर, अन्तस् ऊर्जा स्तर, आत्मा स्तर पर और उससे आगे अनन्त यात्रा है, स्वयम्भू, स्वतः की दशा की ओर कैसे जाये? चलो ठीक है, वर्तमान ही जीवन है।इसका मतलब यह नहीं कि हमारा वर्तमान दुनियाबी चीजों, बनावटी चीजों, जाति मजहब, देह, इंद्रियों तक सीमित रह जाये?अपने लिए जीने ,अपनेपन में जीने का मतलब क्या है?अपने देह, अपनी आत्मा की स्वयम्भू व्यवस्था, शाश्वत व्यवस्था ,स्वतः व्यवस्था से दूर ही रह जाना, इस बाबजूद कि हम उसके काफी नजदीक हैं। धमाके की आवाजें तेज थीं। आसमान पर लड़ाकू विमान नजर आ रहे थे। अनेक गांव पुरुषों से विहीन हो गये थे। बच्चों, बुजुर्गों, स्त्रियों की संख्या ज्यादा हो चली थी। इस बीच जंगल में यह बुजुर्ग?! आंख खोलने पर भी दुनिया में क्या समाधान?दुनिया के जकड़े बैठे लोगों का हाल क्या है? अब ये स्त्रियां, बच्चे ..?! जाति मजहब , मतभेद,पूंजीवाद, निरी भौतिकता ,लोभ लालच, माफिया गिरी, नशा व्यापार आदि आदि उसका परिणाम क्या ?समाज ,धर्म, राजनीति का ठेकेदार किस भूमिका में ? गांव का प्रधान, नगर का प्रधान किस भूमिका में?गांव देवता-गांव देवी, नगर देवता-नगर देवी क्या चाहती हैं ?इन्हें क्या पता ? उसका अहसास तो उसके पास ही होगा जो अंतर्मुखी है, अपने आत्मा तन्त्र, ब्रह्मण्ड चेतना तन्त्र के अहसास में है। संगणकेश व्यवस्था भी क्या है?चेतना जगत में विभिन्न स्तरों पर व्यवस्था क्या है? जो चित्रगुप्त है, यम तंत्र का राज है, यम राज है, ब्रह्मा, विष्णु महेश आदि हैं वे किस चेतना स्तर पर हैं? आखिरी..?! आखिर विष्णु जी का अवतार कल्कि महाराज ?!आखिरी ..?!आखिरी क्यों?!

मंगलवार, 7 मार्च 2023

हमारे ग्रन्थों में धर्म क्या?!#अशोकबिन्दु

”परहित सरिस धर्म नहिं भाई । पर पीड़ा सम नहिं अघमाई।। सड़कों ,गलियों, सोशल मीडिया आदि में धर्म को बचाने की बात होती है।हमारे नजदीक जो ऐसे हैं वे भी हमें धर्म में नहीं लगते। ग्रन्थों का अध्ययन हमें बताता है कि कर्मकांड, रीति रिवाज और धर्म के नाम पर जो भी समाज में हो रहा है वह धर्म है ही नहीं।हम लोगों से पूंछ देते है कि हमारे ग्रन्थों में धर्म क्या है,तो खामोश हो जाते हैं। हमारा ज्ञान कहता है धर्म का मतलब समाज व उसकी सामजिकता के आधार पर जीना है ही नहीं।इसी तरह चरित्र भी समाज व सामजिकता की नजर में जीना नहीं है।#अशोकबिन्दु परोपकार की भावना मनुष्य को महानता की ओर ले जाती है । परोपकार से बढ़कर कोई पुण्य नहीं है । ईश्वर भी प्रकृति के माध्यम से हमें यह दर्शाता है कि परोपकार ही सबसे बड़ा गुण है क्योंकि पृथ्वी, नदी अथवा वृक्ष सभी दूसरों के लिए ही हैं । ‘वृक्ष कबहुँ नहिं फल भखै, नदी न सर्चै नीर । परमारथ के कारणे, साधुन धरा शरीर ।’ परोपकार अर्थात् ‘पर+उपकार’ यानी दूसरों के लिए स्वयं को समर्पित करना व्यक्ति का सबसे बड़ा धर्म है । नदी का जल दूसरों के लिए है । वृक्ष कभी स्वयं अपना फल नहीं खाता है । इसी प्रकार धरती की सभी उपज दूसरों के लिए होती है । चाहे कितनी ही विषम परिस्थितियाँ क्यों न हों परन्तु ये सभी परोपकार की भावना का कभी परित्याग नहीं करते हैं । वे मनुष्य भी महान होते हैं जो विकट से विकट परिस्थितियों में भी स्वयं को दूसरों के लिए, देश की सेवा के लिए अपने आपको बलिदान कर देते हैं । वे इतिहास में अमर हो गए । जब तक मानव सभ्यता रहेगी उनकी कुर्बानी सदा याद रहेगी । गोस्वामी तुलसीदास जी ने इस संदर्भ में बड़ी ही मार्मिक पंक्तियाँ लिखी हैं: ”परहित सरिस धर्म नहिं भाई । पर पीड़ा सम नहिं अघमाई ।।” उन्होंने ‘परहित’ अर्थात् परोपकार को मनुष्य का सबसे बड़ा धर्म बताया है । वहीं दूसरी ओर दूसरों को कष्ट पहुँचाने से बड़ा कोई अधर्म नहीं है । परोपकार ही वह गुण है जिसके कारण प्रभु ईसा मसीह सूली पर चढ़े, गाँधी जी ने गोली खाई तथा गुरु गोविंद सिंह जी ने अपने सम्मुख अपने बच्चों को दीवार में चुनते हुए देखा । सुकरात ने विष के प्याले का वरण कर लिया लेकिन मानवता को सच्चा ज्ञान देने के मार्ग का त्याग नहीं किया । ऋषि दधीचि ने देवताओं के कल्याण के लिए अपना शरीर त्याग दिया। इसके इसी महान गुण के कारण ही आज भी लोग इन्हें श्रद्‌धापूर्वक नमन करते हैं । परोपकार ही वह महान गुण है जो मानव को इस सृष्टि के अन्य जीवों से उसे अलग करता है और सभी में श्रेष्ठता प्रदान करता है । इस गुण के अभाव में तो मनुष्य भी पशु की ही भाँति होता । हमारे अंदर देवत्व को भी जगाने की सम्भावनाएं हर वक्त मौजूद हैं। परम्+आत्मा = परमात्मा ! आत्मा हमारे अंदर है। अनेक अध्ययनों से हमें ज्ञात हुआ है कि हमारे अंदर जो आत्मा है वह सनातन है।आत्माएं सनातन है।हमारे व जगत के अंदर जो स्वतः, निरन्तर ,शाश्वत है उसके लिए हम क्या कर रहे हैं? जो सबके अंदर है तो उसका सम्मान का मतलब है सबका सम्मान।वास्तव में यही भावना प्रेम है।यही भावना ज्ञान है।यही भावना आस्था है।नजरिया है। ईश्वर निर्मित, प्राण प्रतिष्ठित प्राकृतिक मूर्तियों का सम्मान कब ?! धर्म वास्तव में भेद नहीं रखता। दुनियाबी धर्म अपने हैं ही नहीं।हम तो गीता के अध्ययन से यही पाते हैं। " दुनिया के धर्म त्याग मेरी शरण आ। तू भूतों को भजेगा तो भूतों को प्राप्त होगा, पितरों को भजेगा तो पितरों को प्राप्त होगा।.....मुझे भजेगा तो मुझे प्राप्त होगा।" हमारी नजर में दुनियाबी धर्म हमारा है ही नहीं जिसका विलोम है आत्मा का धर्म, आत्मा विज्ञान.... जिससे ही हम परम् आत्मा, शाश्वत, सनातन आदि की ओर अग्रसर हो सकते है। हम सभी जीवन भर हाड़ मास शरीर,हाड़ मास शरीरों, उसकी ही आवश्यकताओं ,उसके ही समूहों,उन समूहों के ही रीति रिवाज,कर्म कांड आदि में लगे रहते हैं लेकिन अंदर की आत्मा, अन्य के अंदर की आत्माओं के लिए वर्क करने की सोंचते भी नहीं। हम कहते रहे हैं कि ऐसे में योग करना भी ढोंग, पाखंड है। और किसी ने ठीक कहा कि भीड़ का कोई धर्म नहीं होता।उन्माद होता है, सम्प्रदाय होता है। जो भीड़ हिंसा, दंगा फसाद में तो बदल सकता है लेकिन परहित ,परोपकार,मानवता आदि में नहीं । मनु ने धर्म के दस लक्षण गिनाए हैं: धृति: क्षमा दमोऽस्‍तेयं शौचमिन्‍द्रियनिग्रह:। धीर्विद्या सत्‍यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम्‌।। (मनुस्‍मृति ६.९२) अर्थ – धृति (धैर्य ), क्षमा (अपना अपकार करने वाले का भी उपकार करना ), दम (हमेशा संयम से धर्म में लगे रहना ), अस्तेय (चोरी न करना ), शौच ( भीतर और बाहर की पवित्रता ), इन्द्रिय निग्रह (इन्द्रियों को हमेशा धर्माचरण में लगाना ), धी ( सत्कर्मों से बुद्धि को बढ़ाना ), विद्या (यथार्थ ज्ञान लेना ). सत्यम ( हमेशा सत्य का आचरण करना ) और अक्रोध ( क्रोध को छोड़कर हमेशा शांत रहना )। यही धर्म के दस लक्षण है। याज्ञवल्क्य ने धर्म के नौ (9) लक्षण गिनाए हैं: अहिंसा सत्‍यमस्‍तेयं शौचमिन्‍द्रियनिग्रह:। दानं दमो दया शान्‍ति: सर्वेषां धर्मसाधनम्‌।। (याज्ञवल्क्य स्मृति १.१२२) (अहिंसा, सत्य, चोरी न करना (अस्तेय), शौच (स्वच्छता), इन्द्रिय-निग्रह (इन्द्रियों को वश में रखना), दान, संयम (दम), दया एवं शान्ति) श्रीमद्भागवत के सप्तम स्कन्ध में सनातन धर्म के तीस लक्षण बतलाये हैं और वे बड़े ही महत्त्व के हैं : सत्यं दया तप: शौचं तितिक्षेक्षा शमो दम:। अहिंसा ब्रह्मचर्यं च त्याग: स्वाध्याय आर्जवम्।। संतोष: समदृक् सेवा ग्राम्येहोपरम: शनै:। नृणां विपर्ययेहेक्षा मौनमात्मविमर्शनम्।। अन्नाद्यादे संविभागो भूतेभ्यश्च यथार्हत:। तेषात्मदेवताबुद्धि: सुतरां नृषु पाण्डव।। श्रवणं कीर्तनं चास्य स्मरणं महतां गते:। सेवेज्यावनतिर्दास्यं सख्यमात्मसमर्पणम्।। नृणामयं परो धर्म: सर्वेषां समुदाहृत:। त्रिशल्लक्षणवान् राजन् सर्वात्मा येन तुष्यति।। (७-११-८ से १२ ) पद्मपुराण में कहा गया है - ब्रह्मचर्येण सत्येन तपसा च प्रवर्तते। दानेन नियमेनापि क्षमा शौचेन वल्लभ।। अहिंसया सुशांत्या च अस्तेयेनापि वर्तते। एतैर्दशभिरगैस्तु धर्ममेव सुसूचयेत।। (अर्थात ब्रह्मचर्य, सत्य, तप, दान, संयम, क्षमा, शौच, अहिंसा, शांति और अस्तेय इन दस अंगों से युक्त होने पर ही धर्म की वृद्धि होती है।) #अशोकबिन्दु #विश्वबन्धुत्व #मिशन2025 #दाजी #हैदराबाद #बसुधैवकुटुम्बकम

हमारे ग्रन्थों में ब्राह्मण कौन?क्षत्रिय कौन?#अशोकबिन्दु

तुम अपने को ब्राह्मण,क्षत्रिय समझते हो ,हमें इससे मतलब नहीं है।वास्तव में तुम हमें लगते क्या हो?महसूस क्या होते हो यह महत्वपूर्ण है। फिर भी... श्रीमद्भागवदगीता के 18 अध्याय के 41वे श्लोक में क्या कहा गया है? ब्राह्मणक्षत्रियविशांशुद्राणां च परन्तप । कर्माणि प्रविभक्तानि स्वभावप्रभवैर्गुनै : ।।४१।। आगे का 42 वां श्लोक ब्राह्मण के गुणों को व्यक्त करता है.. शमो दमस्तपः शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च । ज्ञानं विज्ञानमस्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम् ।।४२।। क्षत्रिय के बारे में क्या कहा गया है? देखें- शौर्यम् तेजो धृतिर्दाक्षयं युद्धे चाप्यपलायनम् । दानमीश्वरभावश्च क्षात्रम् कर्म स्वभावजम् ।।४३।। वास्तव में सत्य क्या है? सत्य यह भी है कि हमारा यह हाड़ मास शरीर ,दिल, दिमाग, आत्मा आदि न हिन्दू है न मुसलमान, न ही किसी जाति - मजहब से लिप्त। समाज में धर्म की बात होती है लेकिन धर्म कहीं नजर नहीं आता।कोई कहता कि भीड़ का धर्म होता ही नहीं। मनु ने धर्म के दस लक्षण गिनाए हैं: धृति: क्षमा दमोऽस्‍तेयं शौचमिन्‍द्रियनिग्रह:। धीर्विद्या सत्‍यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम्‌।। (मनुस्‍मृति ६.९२) अर्थ – धृति (धैर्य ), क्षमा (अपना अपकार करने वाले का भी उपकार करना ), दम (हमेशा संयम से धर्म में लगे रहना ), अस्तेय (चोरी न करना ), शौच ( भीतर और बाहर की पवित्रता ), इन्द्रिय निग्रह (इन्द्रियों को हमेशा धर्माचरण में लगाना ), धी ( सत्कर्मों से बुद्धि को बढ़ाना ), विद्या (यथार्थ ज्ञान लेना ). सत्यम ( हमेशा सत्य का आचरण करना ) और अक्रोध ( क्रोध को छोड़कर हमेशा शांत रहना )। यही हिंदू धर्म के दस लक्षण है।
और - हमें बार बार स्मरण में आता है - दुनिया के सभी धर्म छोंड़ कर मेरी शरण में आ। श्रीकृष्ण आखिर ऐसा क्यों कहते हैं? आखिर दुनिया के धर्म छोड़ने की जरूरत क्यों ? हम तो सोंचते हैं कि एक दिन हमें यह दुनिया ही क्या यह शरीर भी छोंड़ कर जाना है।जब हम जा रहें होंगे तो न चाह कर भी जा रहे होंगे? तब हमारे सामने आएगा कि हम जिसे अपना समझते थे वह तो सब छुट रहा है।हमारे पास क्या बच रहा है?हमारी आदतें... हमारी आदतें यह शरीर छुट जाने के बाद भी नहीं छुट पाती ।

गुरुवार, 22 सितंबर 2022

22सितम्बर 1539!!गुरुनानक पुण्य तिथि के याद में!!#अशोकबिन्दु

सन्त परंपरा में हमें जीवन के सहजता नजर आती है। संत परंपरा में गुरु नानक को हम भुला नहीं सकते ।आज हम उनको याद कर रहे हैं । हमें उनकी शिक्षाएं याद आ रही हैं । उन्होंने कहा था जिंदगी में तीन चार नियम काफी महत्वपूर्ण है - ईश्वर से प्रेम करना, मिल जुल कर रहना , मिल बांट कर भोजन करना। हमें सिख अर्थात शिष्य पंथ अर्थात अभ्यास पंथ काफी महत्वपूर्ण लगता है । जीवन में इस धरती पर कोई भी प्राणी स्वयं में पूर्ण नहीं है। जब तक हम अपनी पूर्णता के आभास में जीवन नहीं जीते । अपने पूर्णता के आभास में जीने के लिए हमें निरंतर अभ्यास में रहने की जरूरत है । क्योंकि हम मनुष्य में पूर्वाग्रह ,जटिलताएं, पुराने संस्कार इतने घुल मिल गए हैं कि उनसे उभरना मुश्किल होता है।ऐसे में हमें निरंतर अभ्यास में रहने की जरूरत होती है । हमारी नियमित दिनचर्या , हमारी आदतें जीवन में काफी महत्वपूर्ण होती हैं । हम अपना वक्त जिस विचार,जिस सोच, जिस आस्था, जिस समझ , जिस दिनचर्या , जिन आदतों मैं गुजारते हैं । हम वास्तव में वही हो जाते हैं। बुढ़ापे पर और मृत्यु के वक्त उनका असर हमारे जीवन में पढ़ना स्वाभाविक होता है । गुरु नानक के जीवन से हमें सहज जीवन जीने की प्रेरणा मिलती।

शनिवार, 9 जुलाई 2022

समाज व उसकी सामजिकता तो कायर व पाखंड?!#अशोकबिन्दु

हम कहते रहे हैं अब मानवता व प्रकृति अभियान को वर्तमान समाज व उसकी सामजिकता नहीं चाहिए। पांच हजार वर्ष पहले ही श्रीकृष्ण कह गए कि " दुनिया के धर्मों को त्याग मेरी शरण में आ।" यदि वर्तमान में जिंदा महापुरुषों को सम्मान नहीं, उन्हें कार्य करने की स्वतंत्रता नहीं तो समझो कि समाज व उसकी सामजिकता में धर्म व ईश्वर की बात बेईमानी है।::#अशोकबिन्दु समाज व उनकी सामजिकता कायर व पाखंड!! #अशोकबिन्दु . . एक इंसान की समाज व सामजिकता से नहीं इंसान से आवश्यकताएं पूरी होती हैं। समाज व सामजिकता एक इंसान की समस्याओं का समाधान करने में असमर्थ ही होता है। समाज में एक समस्या है - दहेज। कन्या पक्ष को इस कारण कर्ज में डूब जाना पड़ जाता है। रिश्ता निभाने ,चलाने के बीच आर्थिक पहलू भी होते है लेकिन रिश्ता में महत्वपूर्ण रिश्ता निभाना है परस्पर सहयोग के माध्यम । रिश्ता जोड़ने का मतलब किसी का कर्ज में डूबना नहीं होना चाहिए। रिश्तों को निभाने में हमने देखा है कि अनेक चीजें निरर्थक होती हैं जो कि वास्तव में एक इंसान के जीवन में सहायक नहीं होतीं। एक इंसान को अकेले ही अपनी समस्याओं से जूझना पड़ता है।उसके जीवन में अनेक समस्याएं इस समाज व सामजिकता के कारण ही होती हैं। समाज व सामजिकता वास्तव में ज्ञान, प्रेम, इंसानियत, कानूनी व्यवस्था, दया-करुणा आदि को महत्व नहीं रखता।वह इस बात से ही इंसानियत, इन्सान की समस्याओं को नजरअंदाज कर देता है कि हमारे यहां यह होता है, हमारे यहां यह नहीं हो सकता। समाज व सामजिकता बदलती तो है समय समय पर लेकिन कुछ चीजें बदलती भी नहीं हैं। सन्त कबीर, रैदास, गुरु नानक, राजा राम मोहन राय, ज्योतिबा फुले आदि के सिद्धांतों की बात करने वाला आज भी समाज व सामजिकता के बीच अलग थलग है। कूड़ा फेंकने वाली स्त्री पर भी दया भाव रखने वाले नबी के इस आचरण को स्वीकार करने वाला आज भी समाज व सामजिकता में अलग थलग है। समाज व सामजिकता के ढर्रे की वकालत करने वाला विचलित होता है ।उससे कहो कि हमारे पूर्वज तो हमारे ग्रन्थ तो ऐसा ऐसा कहते हैं और हो ऐसा ऐसा रहा है तो कहते हैं कि अरे, आज कल की बात करो।जब उनसे आज कल व भविष्य की संभावनाओं की बात करो तो कहते हैं कि ऐसे कैसे?हमारे यहां तो यह होता आया है, यह हो रहा है। हम देख रहे हैं कि विश्व के जिन समाजों में ईश्वर व आधुनिक धर्म की बात नहीं है वहां अन्य की अपेक्षा अपराध कम हैं, कानूनी व्यवस्था ज्यादा है। धर्म व ईश्वर पर भी समाज व सामजिकता की वह धारणा नहीं होती जो उनके ग्रन्थों व महापुरुषों के सन्देशों में होती है।

सोमवार, 2 मई 2022

समाज में तो टूटे हैं, विखरे है।मानवता व कुदरत ने स्वर जोड़े हैं::#अशोकबिन्दु





 कुछ और....


एक फाइल से प्राप्त पुरानी यादें/निशां!!

"एक दिन हम इस जहां से गुजर जाएंगे,

मगर  निशां  अपने  यहां  छोंड़   जाएंगे। #अशोकबिन्दु




मंगलवार, 22 मार्च 2022

समाज...?!समाज तो कायर है!::अशोकबिन्दु

 "समाज तो कायर है वह दहेज प्रथा, जातिवाद आदि के खिलाफ बगावत की हमें प्रेरणा नहीं दे सकता।"


सुबह - सुबह जब हम विद्यालय पहुंचे तो शिक्षक ने ओबीसी, पिछड़ा आदि की बात छेंड़ दी।हमने देखा है कि यह तथाकथित ब्राह्मण या पंडित या जन्मजात व्यवस्था आधारित जातिव्यवस्था के हिमायती कैसे कैसे जाति सूचक शब्दों का इस्तेमाल करते हैं?


बात आगे बड़ी,हमने कहा कि हम जाति व्यवस्था को नहीं मानते।

हम अपने जीवन में अनुभव करते हैं कि जाति वादी शब्दों, वाक्यों का इस्तेमाल कौन करता है?!

बड़प्पन?!::समाज ,देश, विश्व व मानव सभ्यता ,समाज में बड़ा कौन?!#अशोकबिन्दु

  " अरे, कैसी बात करते हो?यह तो आपका बड़प्पन है।" -यह वाक्य  किन स्थितियों में कहा जाता है? समाज, देश व विश्व में हम किसे बड़ा माने?



हमें अफसोस है इनके बड़े होने पर यदि यह प्रेम,ज्ञान,मानवता, रूहानी आंदोलन, प्रकृति संरक्षण, मानव संरक्षण की वकालत नहीं करते।