गुरुवार, 8 जनवरी 2026
क्रांति : क्यों ?कैसे?पुस्तक से....
हमारी 100+पुस्तकों में से एक पुस्तक - "क्रांति: क्यों?कैसे? का एक अध्याय से...
लेखक :: अशोक कुमार वर्मा ' बिंदु '
पुस्तक :: क्रांति : क्यों ? व कैसे?
अध्याय :: आत्महत्या..?!
"और ये 1947 ई0 की आजादी के बाद भी आम आदमी की आजादी कैसी?"
अर्थ: 1947 में भारत आजाद हुआ, लेकिन आम आदमी की सच्ची आजादी (आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक) कैसी है? अभी भी भ्रष्टाचार, असमानता, गरीबी, जातिवाद और दबाव बाकी हैं। आजादी नाम की है, लेकिन वास्तविक स्वतंत्रता सीमित।
"ये देह के रहते जब जिंदगी ही सजा हो जाये तो कुर्बानी की परंपरा को स्वीकार करते हुए मानवता, न्याय, समता, नैतिकता, मानव शांति, समाज शांति आदि के लिए एक व्यवस्था को सज्ज हो जाना प्रासंगिक नहीं क्या?"
अर्थ: जब शरीर के कारण जीवन ही सजा (दुखपूर्ण बंधन) बन जाए, तो बलिदान की परंपरा (जैसे ईसा या गुरु गोबिंद सिंह की) को अपनाना चाहिए। इसके लिए खुद को तैयार (सज्ज) करना – एक नई, बेहतर व्यवस्था बनाने के लिए त्याग करना – क्या यह प्रासंगिक नहीं है?
यह प्रश्न वास्तव में सकारात्मक उत्तर मांगता है: हाँ, बहुत प्रासंगिक है। उच्च मूल्यों (मानवता, न्याय, समानता, नैतिकता, शांति) के लिए बलिदान जरूरी है, तभी समाज बदल सकता है।
हे मनुज! तू कर्म कर,प्रार्थना कर,खामोश रूहानी आंदोलन में रह कर। कर्मों के फल की इच्छा न कर। अपने अन्तस् ऊर्जा, चेतना के अहसास, अपने हृदय में दिव्यता की उपस्थति के अहसास में रहकर बस कर्म करे जा।
जब अरस्तू के पास वह युवक पहुँचा था जो कि आत्महत्या का विचार रखता था।
आत्महत्या वास्तव में क्या है? आत्महत्या वह स्थिति है जिसमें व्यक्ति अपने देह, अन्य देह, अपनी आत्मा, अन्य देह की आत्मा को वक्त देना बंद कर देता है या फिर वक्त देने से काफ़ी दूर निकल जाता है -मानव निर्मित व्यवस्था में उलझ जाना ऊपर से वह व्यवस्था भी जिसमें उसकी दैहिक, दैविक ,भौतिक किसी तरह की समस्या से उसे देहान्त से पूर्व मुक्ति नहीं मिलती।
जो युवक अरस्तू के पास एक उम्मीद से आया था कि उसके अंदर आत्महत्या के भाव आने लगे थे लेकिन वह अपने परिवार, समाज, विभिन्न संस्थाओं में उस भाव से मुक्त नहीं हो पा रहा था। लोग उससे कहते तो थे कि आत्महत्या करना गलत है, आत्महत्या करना पाप है लेकिन कोई उसे समाधान देता नहीं था। लेकिन समाज में यह तो एक अच्छाई अभी जिंदा थी कि कुछ लोगों ने सुझाव दिया था कि अरस्तू के पास जाओ।
अरस्तु के पास वह आया और बोला कि मेरे में आत्महत्या के भाव आते हैं तो अरस्तु बोल पड़ा-” तब फिर मेरे पास क्यों आये?जाओ आत्महत्या कर लो जाकर? “
“आप भी ,आप किसी बात करते हो?इससे अच्छा तो समाज था कि वह कहता था कि आत्महत्या करना पाप है? “
अरस्तु बोला - “ इससे क्या ? लेकिन समाज के पास, तंत्र के पास तुम्हारे समस्या का समाधान तो नहीं था?उसने तुम्हें समाधान दिया तो नहीं?”
खामोशी…
“ समाज तो भीड़ तो मुर्दा हो चुकी है। उसके पास समाधान नहीं, मानवता नहीं।उसके पास उन्माद है, हिंसा है, जबरदस्ती है, बदले का भाव है, मतभेद हैं, अनेक कुरीतियां हैं, अंध विश्वास हैं….. आदि आदि लेकिन समाधान नहीं है। अब मेरे पास आ ही गये हो तो बस अब मेरे पास रहो।कुछ नया अपनी ओर से सोंचना बंद कर दो? “
“......और ये भाव आत्म हत्या का? “
“आने दो उसे ,तुम उससे अपने को अलग कर लो ।अपने देह को वक्त दो, हमारे देह को वक्त दो, अपनी हमारी आत्मा को वक्त दो।अपने आस पास की व्यवस्था, हमारे संदेशों, हम दोनों की वार्ता को वक्त दो। “
बुद्ध ने अंगुलिमान के साथ भी क्या किया था?बुद्ध उससे बोले थे लंबी वार्ता के बाद कि हममें तुममें कोई फर्क नहीं।मैं जाग चुका हूं तू जागने वाला है।कैसे?यह कैसे? तू मेरे साथ आ जा।
लेकिन अरस्तु अपने आखिरी वक्त पर अज्ञातवास में था।आखिर क्यों?लोगों के काम।तो आओ लेकिन दूसरों के लिए बोझ मत बनो।
अपना देह का अभ्यास इतना तो मजबूत हो ही कि अपने देह को चलाते -फिराते रहो, देहान्त के वक्त तक भी लेकिन ये कैसे सम्भव है?व्रत का मतलब अपने आराध्य को याद कर भूखे रहना नहीं है सिर्फ वरन उस व्यवस्था, दशा से जुड़ना है जो इस देह को चला रही है।उससे जुड़ने के बाद यह देह के कारण हम परेशान नहीं होंगे लेकिन होता क्या है ?हम अपने देह, अपनी आत्मा, अन्य देह, अन्य देह की आत्माओं को वक्त देना बंद कर देते हैं और दुनिया की वस्तुओं, समाज की मृत व्यवस्था, मनुष्यों की बनावटी व्यवस्था में उलझ जाते हैं।
सिद्धार्थ से बुद्ध बनने का रास्ता क्या है?सिद्धार्थ की सोंच ,नजरिया, धारणा जो उसने अपने देह, राज महल में रहने वाली अन्य देहों के बारे में बना रखी थी लेकिन जब वह नगर की यात्रा पर निकला तो वह सारी सोंच, नजरिया, धारणा धराशायी हो गई और अब वह उलझ सा गया।अब समाधान क्या?
व्यक्ति भी क्या हो गया है?व्यक्ति का व्यक्तित्व धराशायी हो गया है।धराशायी नहीं हुआ है तो होने वाला है आगे चल कर? लगे हैं….रात दिन एक कर कम्पटीशन में, प्रतिस्पर्धा में, कैरियर बनाने में लेकिन कायनात को,अपने देह को, अपने आत्मा को वक्त देने को फुर्सत नहीं? कोई पद आगे चल कर पा भी गये तो क्या? पत्नी, पति, बच्चे, गाड़ी बंगला, पार्टियां, रिश्तेदारियां,माफिया तंत्र, खाद्य मिलावट, नशा व्यापार, रिश्वतखोरी, जातिवाद, भीड़ हिंसा, मजहबी उन्माद…..लेकिन अपना व्यक्तित्व?! अपना व्यक्तित्व जो प्रकृति अभियान में, ईश्वर अभियान में, ब्रह्मण्ड चेतना में वह जो था उससे भी अब नीचे स्तर पर ?और ऊपर से मानव व्यवस्था, समाज, जनपद, राज्य के अंदर की विभिन्न नकरात्मक स्थितियां, उनके बीच असुरक्षा का भाव..?!
👍अशोक कुमार वर्मा ' बिंदु '
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