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रविवार, 12 जुलाई 2026

वास्तविक मार्क्सवाद - साम्य वाद और उसका आधुनिक विकल्प?!

**वास्तविक मार्क्सवाद-साम्यवाद क्या है और इसका आधुनिक विकल्प**
1. **वास्तविक मार्क्सवाद - साम्यवाद का वैचारिक आदर्श** कार्ल मार्क्स साम्यवाद की आदर्श व्यवस्था मुख्य रूप से दो बड़े शोषणों को समाप्त करने के लिए डिज़ाइन की गई थी --। * पारिवारिक संसाधनों व्यक्तियों बच्चो और महिला श्रम का शोषण:-- पारंपरिक व्यक्तिगत/पूंजीवादी व्यवस्था में घर की महिला के ज्ञान और घरेलू श्रम का कोई आर्थिक मूल्य नहीं आंका जाता, जिससे उनका निरंतर शोषण होता है। गरीब मजदूर सभी उत्पादन और लाभ में बराबर के सहयोगी और हकदार भी। * वैचारिक वायरस (मानसिक थोपना):-- जब बच्चों के पालन-पोषण, सुरक्षा और भविष्य की पूरी जिम्मेदारी अकेले पिता या माता-पिता पर होती है, तो वे अनजाने में अपने विचार, अपेक्षाएं और रीति-रिवाज बच्चों पर थोपने लगते हैं। इससे बच्चे के प्राकृतिक 'सॉफ्टवेयर' (मूल प्रतिभा और स्वभाव) में वैचारिक 'वायरस' जन्म ले लेता है और उसकी प्राकृतिक मौलिकता विकृत हो जाती है। व्यक्तिवादी बाजार तंत्र से खरीदी बेची लाभ वैल्यू जनित हिंसक प्रतिष्ठा आधारित शोषण प्रदूषण जन्म लेने लगता हैं और जैसे जैसे विज्ञान विकसित होता जाता हैं शोषण प्रदूषण भी उतनी ही तेज गति से विकसित होता जाता है। इसको कोई रोक नहीं सकता है। **पारंपरिक साम्यवाद का समाधान**:-- **ग्रामीण कम्यून*" इस शोषण से मुक्ति के लिए मार्क्स ने 'कम्यून व्यवस्था' (सामूहिक ग्राम व्यवस्था) की कल्पना की थी। इसके तहत:-- ग्रामीण स्तर पर कृषि और अन्य सभी कार्य सामूहिक होंगे। सामूहिक भोजनालय, सामूहिक स्कूल-कॉलेज, शिक्षण-प्रशिक्षण और सामूहिक स्वास्थ्य-सुरक्षा की व्यवस्था होगी। बच्चा कम्यून की देखरेख में पलेगा-बढ़ेगा और अपने माता-पिता या भाई-बहन से केवल कुछ घंटों के लिए मिलने आएगा। इससे महिला का श्रम घरेलू गुलामी से मुक्त होकर समाज के लिए उत्पादक (Productive) बनेगा। इस तरह शोषण प्रदूषण का कारण खत्म हो जाएगा। कोई खरीदी बेची लाभ वैल्यू नहीं होगी। किसी को खुद की अपनी अलग से व्यवस्था करनी नहीं है। विवाह और आपसी संबंधों में पूर्ण स्वतंत्रता होगी;-- व्यवस्था कोई पारंपरिक रीति-रिवाज या बंधन नहीं थोपेगी। सभी के रहने के लिए समाज (कम्यून) द्वारा घर की व्यवस्था की जाएगी। 2. क्या वास्तविक साम्यवाद कभी लागू हुआ? (ऐतिहासिक कड़वी सच्चाई) नहीं, वास्तविक साम्यवाद आज तक दुनिया में कहीं भी पूर्ण रूप से लागू नहीं हो सका। रूस (सोवियत संघ) या चीन में जो व्यवस्था आई, वह आंशिक और विकृत थी। इसके पीछे मुख्य वैज्ञानिक और आर्थिक कारण निम्नलिखित थे: अभाव' में साम्यवाद का असफल होना। मार्क्स के समय विज्ञान और तकनीक बहुत प्रारंभिक अवस्था में थे। भौतिक शरीर का पेट भरने के लिए प्रचुर मात्रा में 'सामग्री' उपलब्ध नहीं थी। भुखमरी और अभाव के माहौल में यदि जन्म से ही आर्थिक स्वतंत्रता दे दी जाती, तो अराजकता फैलना तय था। सूचना तंत्र बहुत कमजोर था। आवागमन का साधन भी कोई अच्छा नहीं था। इसे एक सरल उदाहरण से समझा जा सकता है:-- स्थिति 'A' (अभाव): एक पार्टी में 2000 लोग आमंत्रित हैं, लेकिन भोजन केवल 500 लोगों का है। वीआईपी संस्कृति और प्रतिष्ठा के दबाव में वहाँ अफरा-तफरी मच जाएगी और शुरुआत के 200-300 लोग ही सारा भोजन खत्म कर देंगे। रूस और चीन में यही हुआ; वहाँ अभाव के कारण साम्यवाद के नाम पर 'पूंजीवादी नौकरशाही' या 'गरीबी का पूंजीवाद' स्थापित हो गया। स्थिति 'B' (प्रचुरता): यदि 2000 लोगों के लिए पर्याप्त जगह और असीमित भोजन हो, तथा समय की कोई पाबंदी न हो, तो लोग आराम से घूम-फिरकर अपनी पसंद का स्वाद लेंगे। वहाँ कोई छीना-झपटी या अराजकता नहीं होगी। थोड़ा विषय से बाहर -- ( कुछ लोगों का प्रश्न हो सकता है कि चीन रूस की आर्थिक स्थिति थोड़ा ठीक क्यों है? तो उसका कारण वहां आठवीं से तकनीकी स्तर की शिक्षा के साथ तकनीकी प्रेक्टिकल की तकनीक दी जाती थी, इसलिए वहां बच्चे दसवीं तक खुद का घरेलू उद्योग से उत्पादन कर बाजार में बेचकर अपना पूरा खर्च खुद उठा लेते थे तो माता पिता का पैसा खर्च नहीं होता था वह बाजार से मांग में वृद्धि से रोजगार में वृद्धि होती चली गई। पर आगे जाकर यदि दूसरे देश चीन का उत्पाद की मांग नहीं करे तो चीन का विकास रुक भर नहीं जाएगा आर्थिक चपेट में आ जाएगा। रूस आर्थिक चपेट में आ चुका है चुकी ऐसा अमेरिका द्वारा वेन होने से बाहर की मांग रुक गई है ) चूंकि उस समय रूस और चीन में वैज्ञानिकी विकसित नहीं होने के कारण घर चलाने की जिम्मेदारी अंततः परिवार के मुखिया (पिता) पर ही बनी रही, इसलिए वहाँ भी लाभ, मूल्य, खरीदी-बिक्री और प्रतिष्ठा पर आधारित सामाजिक ढांचा ही काम करता रहा। परिणामतः, पूंजीवाद ही अलग-अलग रूपों में चलता रहा: रूस और चीन:-- गरीबी और अभाव की प्रधानता पर आधारित राज्य-पूंजीवाद। शुरुआती भारत:-- बीचों-बीच का संतुलन (मिश्रित अर्थव्यवस्था)। अमेरिका:-- पूर्णतः लाभ और व्यक्तिगत प्रधानता पर आधारित शुद्ध पूंजीवाद। 3. आधुनिक युग और संपूर्ण समाधान, पारिवारिक श्रम-सहयोगी अर्थव्यवस्था (ULM मॉडल) आज विज्ञान और टेक्नोलॉजी का अभूतपूर्व विस्तार हो चुका है। अब हम कृषि युग से निकलकर बड़े पैमाने पर इंफ्रास्ट्रक्चर और उत्पादन के युग में हैं। इसलिए, मार्क्स के पुराने 'ग्रामीण कम्यून' की जगह आज नगरीय कम्यून की आवश्यकता है। रजवाड़ा व्यवस्था में आवागमन सूचना तंत्र अभाव की वजह से जिस पारिवारिक श्रम सहयोगी व्यवस्था की मान्यता खत्म कर दी गई थी आज वह अभाव खत्म हो चुका है। राजवाड़ा व्यवस्था से पहले कृषि कबीला संघ सिंधु घंटी सभ्यता तक पारिवारिक श्रम सहयोगी लेनदेन उत्पादन पर आधारित थी। जहां सामूहिक भोजनालय सामूहिक कृषि होती थी। ULM नगरीय कम्यून का स्वरूप:--। वर्टिकल रहन-सहन: कम से कम 20 लाख लोगों की आबादी का एक आधुनिक, वर्टिकल (गगनचुंबी और सुनियोजित) नगरीय मॉडल का आधुनिक टेक्नोलॉजी से सुसज्जित पर्यावरणीय नगर हो । स्वास्थ्य शिक्षण प्रशिक्षण सभी इंफ्रास्ट्रक्चर अभी तक की वैज्ञानिकी शोध खोज की पूर्ण टेक्नोलॉजी के साथ खड़ा हो ताकि भागम भाग की जिंदगी खत्म हो। जनसंख्या का सही अनुपात:- चुकी अब बजट की जरूरत नहीं तो शिक्षण प्रशिक्षण स्वास्थ्य सेवाएं सभी इंफ्रास्ट्रक्चर पूर्ण टेक्नोलॉजी के साथ खड़े होगे, हर नगर समान होगे। अतः कम से कम 20 लाख की आबादी होने से स्कूल, कॉलेज, एडवांस शिक्षण-प्रशिक्षण और विश्वस्तरीय स्वास्थ्य सेवाओं का इंफ्रास्ट्रक्चर पूरी तरह आत्मनिर्भर और उपयोगी हो जाता है। इससे मानव, जीव और प्रकृति का शोषण का कारण खत्म होता है, और मनुष्य की रचनात्मकता का शत-प्रतिशत उपयोग समाज के लिए हो पाता है। चिंता से मुक्ति:-- भय और भूख की प्राकृतिक कारण को इस व्यवस्था के मुख्य उद्देश्य व्यक्ति और परिवार को 'जीवन अर्थ' (रोटी, कपड़ा, मकान, स्वास्थ्य, सुरक्षा) की बुनियादी चिंताओं से मुक्त करना है, ताकि समाज से तनाव, कठोरता, प्रदूषण और दुष्टता का समूल नाश हो सके। जन्म से पूर्ण आर्थिक स्वतंत्रता रुचिकर जीवन व्यवस्था। खुद के व्यवस्था खुद को नहीं करनी पड़े। व्यक्तिगत, पारिवारिक और सामूहिक व्यवस्था का नया संतुलन:--। यह व्यवस्था पुरानी साम्यवादी भूलों को सुधारते हुए एक सुंदर संतुलन बनाती है । व्यक्तिगत स्तर:-- व्यक्तिगत स्वतंत्रता और इच्छा के अनुरूप लेन-देन। पारिवारिक स्तर:- परिवार के आकार और जरूरत के आधार पर सुंदर और सुरक्षित आवास की व्यवस्था। सामूहिक स्तर:- भोजनालय, शिक्षा, तकनीकी प्रशिक्षण, स्वास्थ्य सेवाएँ, सभी सुख सुविधाएं साधन और सुरक्षा पूरी तरह सामूहिक और निःशुल्क होंगी। जन्म से आर्थिक स्वतंत्रता होगी। कोई किसी पर आपस में निर्भर नहीं होगा जैसा अभी है, सभी की निर्भरता व्यवस्था के केंद्र में होगी। जैसे परिवार में होता हैं। संबंधों में तरलता और मोबाइल डिजिटल फ्रीक्वेंसी मैचिंग की व्यवस्था। विवाह या आपसी संबंधों के लिए यह आधुनिक व्यवस्था कोई जटिल नीति-नियम या थोपे गए संस्कार नहीं बनाएगी, बल्कि इसे पूरी तरह वैज्ञानिक और स्वतंत्र कर देगी सभी की रुचिकर स्वतंत्र संबंधों के लिए। * डिजिटल व्यवस्था:,-- व्यवस्था एक ऐसी उन्नत डिजिटल/मोबाइल प्रणाली विकसित करेगी, जहाँ 20 वर्ष की आयु पार करने पर प्रत्येक स्त्री-पुरुष अपनी रुचियाँ, आदतें और वैचारिक प्राथमिकताएँ दर्ज कर सकेंगे। फ्रीक्वेंसी मैचिंग:-- डिजिटल तकनीक के माध्यम से लोग अपने अनुकूल 'फ्रीक्वेंसी मैचिंग' (समान वैचारिक और मानसिक स्पंदन / धारणा गत मैचिंग) वाले जीवनसाथी या मित्रों को अत्यंत सरलता और तरलता से ढूंढ सकेंगे। अनुकूलन:- व्यवस्था उनके चयन के बाद उनके आपसी अनुकूलन के आधार पर उनके सुखद विवाह और आवास की गरिमामयी व्यवस्था कर देगी। निष्कर्ष:-- आज समस्या विज्ञान के आविष्कारों की या मनुष्य के जीने की कला (जीवन विधा) की नहीं है । असली समस्या 'जीवन अर्थ' (आर्थिक लेन-देन) के पुराने और त्रुटिपूर्ण ढांचे की है। आज जब विज्ञान के पास प्रचुर मात्रा में उत्पादन करने की क्षमता है, तब ULM टीम द्वारा प्रस्तुत "पारिवारिक श्रम-सहयोगी आर्थिक मॉडल" ही एकमात्र तार्किक और वैज्ञानिकी समानांतर मार्ग है, जो मनुष्य को भय और भूख की चिंताओं से मुक्त कर प्रेमानंद से परमानंद की ओर गति अग्रसर हो जानी तय हो जाता है। यूनिवर्सल लाइफ मैनेजमेंट का app आ गया है । सभी सदस्य नीचे दिए लिंक पर क्लिक करके तुरंत ही जुड़ें और अपना सदस्य Community कार्ड प्राप्त करे - Powered by Kutumb App https://primetrace.com/group/450702/post/1190430544?utm_source=android_post_share_web&referral_code=OVPQF&utm_screen=post_share&utm_referrer_state=PENDING?ref=OVPQF

शनिवार, 30 मई 2026

गीता का धर्म क्या है??

❓ धर्म क्या है? क्या धर्म सिर्फ मजहब, जाति, परंपरा है? या कुछ और…?
📖 श्रीकृष्ण कहते हैं: 👉 “सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज” अर्थ: 👉 सभी बने-बनाए धर्मों (बाहरी पहचान) को छोड़कर 👉 सत्य, चेतना और परमात्मा की शरण में आओ! ⚡ फिर सवाल उठता है: अगर सब धर्म छोड़ने हैं, तो “धर्म की रक्षा” का क्या मतलब है? 💡 गीता का उत्तर: ✔️ धर्म = कर्तव्य (Duty) ✔️ धर्म = सत्य का साथ ✔️ धर्म = न्याय और संतुलन ✔️ धर्म = मानवता + चेतना 🌍 जब-जब क्या नष्ट होता है? 👉 मजहब नहीं… 👉 सत्य, न्याय और मानवता का पतन होता है! तब-तब 👉 दिव्य शक्ति प्रकट होती है 👉 संतुलन (धर्म) को पुनः स्थापित करने! 🚩 निष्कर्ष: 👉 धर्म कोई “नाम” नहीं है 👉 धर्म कोई “सम्प्रदाय” नहीं है धर्म = सही कर्म + सच्ची चेतना ✨ संदेश: जाति, मजहब, लोभ, लालच से ऊपर उठो! अपने भीतर के सत्य धर्म को पहचानो! 📌 (www.ashokbindu.blogspot.com⁠�) ✍️ Ashok Kumar Verma “Bindu”

शुक्रवार, 22 मई 2026

आखिर क्यों सामाजिकता के दंश?!😭😭

समाज में किससे प्रेरणा मिलती है?!अब कौन वास्तव में जाति मजहब, लोभ लालच से हट कर मानव शांति, मानवता, न्याय आदि के लिए प्रेरणा देता है? एक वार्ड में पड़ोस से एक घर में चोर!चोरी करने वाला जाने, जिसके यहां चोरी हुई वो जाने असलियत? लेकिन चोर की बिरादरी के लोग व चोर की बिरादरी के नेता चोरों के ही साथ!! कटरा /शाहजहांपुर!!एक वार्ड में यह चर्चा का विषय बना हुआ है कि अरे उसे तो फंसा दिया गया?!एक बिरादरी के बच्चे बच्चे तक यही कहते नजर आ रहे हैं? इसका मतलब लोगों को धर्म, भक्ति, ईश्वर आदि से बिल्कुल मतलब नहीं और न ही नेताओं को न्याय व सर्वहित से मतलब है. दरअसल बात यह है कि कटरा के एक वार्ड एक मकान के अंदर चोर घुसे। जिनमें से एक को देख लिया गया. जो कि पड़ोस में ही एक मकान से था। अब उस चोर की बिरादरी के लोग व बच्चा उस चोर के समर्थन में खडे हैं।
एक वार्ड में पड़ोस से एक घर में चोर!चोरी करने वाला जाने, जिसके यहां चोरी हुई वो जाने असलियत? लेकिन चोर की बिरादरी के लोग व चोर की बिरादरी के नेता चोरों के ही साथ!!

शनिवार, 4 अप्रैल 2026

सम्पादकीय ::पुस्तक "क्रांति क्यों? कैसे?"

लेखक का विचार है कि सन 2011 ई0 से विश्व भर में 90 प्रतिशत मानव की हालत हमारे लिए विचारणीय है?क्यों, लेखक की हालत में क्या लेखक के इस विचार से सुधारात्मक होगी? “अपना काम बनता , भाड़ में जाये जनता”- ऐसा कहने वाले कैसे हैं?ये वे ही जाने। अनेक देशों में सत्ता परिवर्तन के लिए जनता सड़कों पर उतरी लेकिन इससे क्या मिला?व्यवस्था परिर्वतन के लिए विकल्प भी चाहिए।सत्ता परिवर्तन से सब कुछ नहीं बदलता, आखिर व्यवस्था परिवर्तन हेतु नई व्यवस्था का विकल्प क्या है पुरानी व्यवस्था खत्म कर ? लेखक का मानना है कि वर्तमान नेता, दलों, सिस्टम के पास समस्यों के लिए क्या समाधान है व्यवस्था में बदलाव किए बिना। जैसे कि 75 साल बाद मुम्बई डूबने वाली है, कलकत्ता डूबने वाला है।इसके लिए वर्तमान सिस्टम के पास ,वर्तमान नेताओं के पास, वर्तमान दलों के पास क्या समाधान है? कोई विचारक या दार्शनिक ठीक कहता है कि कोई भी समस्यों को खत्म करने के लिए वर्तमान व्यवस्था, वर्तमान तंत्र को खत्म किये बिना समाधान करने में क्या समर्थ है? क्रांति की आवश्यकता है लेकिन कैसे ? वर्तमान जनतन्त्र भी क्या सफल है?समस्याओं के समाधान को?जनता भी जाति, मजहब, लोभ लालच आदि से ऊपर उठ कर अपनी सरकार चुनने की क्या सामर्थ्य रखती है? कृषि योग्य कम होती भूमि, खाद्य मिलावट, नशा व्यापार, नब्बे प्रतिशत जनता की आय 15000 से कम आदि अनेक स्थितियां, भूमिगत कम होता जल स्तर, बेरोजगारी, अस्वस्थता,रिश्वतखोरी,दहेज व्यवस्था, मंहगी शादियां, घरेलू हिंसा, बढ़ती अराजकता , गिरता शिक्षा का स्तर, ज्ञान के आधार पर चलने की किसी की जिम्मेदारी नहीं….आदि आदि।
आखिर क्रांति की आवश्यकता क्यों नहीं?क्यों नहीं क्रांति? मानव शांति, आर्थिक लोकतंत्र, सामाजिक लोकतंत्र आदि के लिए कब बदलाव की बयार ? यह उद्गार व्यंग्यात्मक और विद्रोही है। लेखक का यह कहना चाहता है कि वर्तमान दुनिया में इतनी समस्याएं हैं — युद्ध, हिंसा, आर्थिक असमानता (अमीर-गरीब की खाई), सामाजिक भेदभाव (जाति, लिंग, वर्ग आदि आधारित अन्याय) — कि क्रांति की सख्त आवश्यकता है। फिर भी, समाज सुस्त और निष्क्रिय क्यों है?वह पूछ रहा है: इतनी पीड़ा और अन्याय के बावजूद लोग क्रांति क्यों नहीं करते? बदलाव की प्रेरणा कब आएगी?"मानव शांति" से तात्पर्य विश्व स्तर पर युद्ध-विराम और सद्भाव से है।"आर्थिक लोकतंत्र" का अर्थ है पूंजीवाद या असमान वितरण के खिलाफ — जहां हर व्यक्ति को आर्थिक अधिकार और अवसर समान रूप से मिलें (जैसे समाजवादी या मार्क्सवादी विचारों से प्रेरित)।"सामाजिक लोकतंत्र" से सामाजिक समानता, जाति-उन्मूलन, लैंगिक न्याय आदि का संकेत है।"बदलाव की बयार" एक रूपक है — जैसे हवा की तरह ताजा और तेज परिवर्तन की लहर कब चलेगी?यह पंक्ति क्रांतिकारी विचारधारा को दर्शाती है, जो जयप्रकाश नारायण की "संपूर्ण क्रांति" या मार्क्सवादी विचारों से प्रेरित लगती है — जहां सुधार पर्याप्त नहीं, मूल व्यवस्था में आमूल बदलाव (क्रांति) जरूरी है। यह समाज की निष्क्रियता पर तंज कसती है और लोगों को जागृत करने का आह्वान है कि अब समय आ गया है कि बड़े परिवर्तन के लिए उठ खड़े हों। "आखिर क्रांति की आवश्यकता क्यों नहीं?" → आखिरकार, क्रांति (मूलभूत बदलाव या आमूल परिवर्तन) की जरूरत क्यों नहीं है?"क्यों नहीं क्रांति?" → क्रांति क्यों नहीं होनी चाहिए?"मानव शांति, आर्थिक लोकतंत्र, सामाजिक लोकतंत्र आदि के लिए कब बदलाव की बयार?" → मानव समाज में शांति, आर्थिक लोकतंत्र (संपत्ति और संसाधनों का समान वितरण), सामाजिक लोकतंत्र (समानता और न्यायपूर्ण समाज) आदि प्राप्त करने के लिए बदलाव की लहर (सकारात्मक परिवर्तन की हवा) कब आएगी। संक्षेप में यह असंतोष की पुकार है दुनिया की समस्याओं को देखते हुए क्रांति न केवल जरूरी है, बल्कि अपरिहार्य है — फिर देरी क्यों लेखक कहता है कि दुनिया में बड़े लोगों की हालत भी क्या है? उनके रहते मानवता विवश क्यों?मानव अशांति, विश्व अशांति क्यों? लेखक कहता है कि लॉक डाउन के दौरान वह महससू करता है कि लॉक डाउन सौ साल तक हो ही जाना चाहिए । प्रकृति में समस्याएं खत्म। मनुष्य अब समस्या बन चुका है प्रकृति के सामने। ऐसे में लेखक जगत में संहारक शक्ति को विकराल होते देख रहा है। आखिर पूंजीवाद, सत्तावाद ,सामंतवाद कब तक?प्रकृति विदोहन कब तक?वर्तमान नेताओं, दलों से उम्मीदें कब तक? एक एक व्यक्ति, एक एक जर्रा जमीन, प्रकृति के प्रत्येक घटक के हित को अब नया दल, नया नेता चाहिए। ऐसे में एक ओर कुछ लोग ईमाम मेंहदी अर्थात कल्कि महाराज के इंतजार में हैं लेकिन इस इंतजार में नया सृजन, नया पालन बीमार होता जा रहा है।संहारक ही उभर रहा है।वह संहारक किस दिशा में जायेगा ? कभी कभी बीमारी इतनी भयानक हो जाती है कि चिकित्सक अपने हाथ खड़ा कर लेता है और ईश्वर के भरोसे रह मरीज को अस्पताल से घर ले जाने को कहता है? जब पंच तत्व, पूरी पृथ्वी ही बीमार हो जाएगी ,प्रदूषित हो जाएगी तो सकारात्मक ऊर्जा भी क्या करेगी? जो मानव समस्या बन चुका है प्रकृति अभियान के लिए ,उसका समाधान क्या है? लेखक कहता है कि ऐसे में क्रांति की जरूरत क्यों नहीं?यहाँ क्रांति से मतलब सुधार के लिए बदलाव को स्वीकार करने भर से है। यदि नहीं तो हादसे घटने प्रकृति में स्वाभाविक हैं। "अशोकबिन्दु ठीक कहते हैं कि जब देश गुलाम हो रहा था तो देश की जनता व राजा एक जुट नहीं थे इसी तरह आजकल भी है।नेता और जनता समाज व देश में अमन व शांति के लिए एक जुट नहीं हैं। जो गांधी का विरोध करते हैं वे भी कब नेता जी सुभाषचंद्र बोस,भगत सिंह के रास्ते पर चल रहे हैं?कुछ लोग अब मुसलमानों को दोष दे रहे हैं लेकिन जिस गांव व वार्ड में मुसलमान नहीं रहते वहां क्या सब ठीक है ?और जो जातिगत आरक्षण का विरोध कर रहे हैं वे क्या अन्य जातिगत व्यवस्था का क्या विरोध कर रहे हैं?बात को समझो, जागो तभी सबेरा।जय भारत ,जय भारतीयता। " ठीक ही तो है भीड़ का मुकाबला भीड़ ही कर सकती है लेकिन " सवा लाख से एक लड़ाऊं " की दशा के लिए हजार में मुश्किल से एक भी नहीं मिलेगा? यदि मिलेगा भी तो जनता उसने साथ कितनी खड़ी? ऐसे में भी जो धर्म के नाम पर भीड़ में हर घर आते भी हैं सिर्फ चंदा और वोट मांगने लेकिन रोजमर्रे की जिंदगी में वे क्या करते हैं? 👍क्रांति तो वो लिखते हैं जिसे हार जीत की तमन्ना नहीं, मरने मारने की तमन्ना नहीं, पक्ष विपक्ष की तमन्ना नहीं!👌 👍जय हो गुरु गोविंद सिंह !💐 जयगुरुदेव ठीक कहते थे कि दिल्ली की गद्दी से देश का भला नहीं होगा वहां तो भूतों का डेरा है और वर्तमान नेता, दल से भी नहीं। इस बीच गुरु गोविंद सिंह व उनके बच्चों को स्मरण करते हुए शेष फिर!!

गुरुवार, 8 जनवरी 2026

क्रांति : क्यों ?कैसे?पुस्तक से....

हमारी 100+पुस्तकों में से एक पुस्तक - "क्रांति: क्यों?कैसे? का एक अध्याय से... लेखक :: अशोक कुमार वर्मा ' बिंदु ' पुस्तक :: क्रांति : क्यों ? व कैसे? अध्याय :: आत्महत्या..?!
"और ये 1947 ई0 की आजादी के बाद भी आम आदमी की आजादी कैसी?" अर्थ: 1947 में भारत आजाद हुआ, लेकिन आम आदमी की सच्ची आजादी (आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक) कैसी है? अभी भी भ्रष्टाचार, असमानता, गरीबी, जातिवाद और दबाव बाकी हैं। आजादी नाम की है, लेकिन वास्तविक स्वतंत्रता सीमित। "ये देह के रहते जब जिंदगी ही सजा हो जाये तो कुर्बानी की परंपरा को स्वीकार करते हुए मानवता, न्याय, समता, नैतिकता, मानव शांति, समाज शांति आदि के लिए एक व्यवस्था को सज्ज हो जाना प्रासंगिक नहीं क्या?" अर्थ: जब शरीर के कारण जीवन ही सजा (दुखपूर्ण बंधन) बन जाए, तो बलिदान की परंपरा (जैसे ईसा या गुरु गोबिंद सिंह की) को अपनाना चाहिए। इसके लिए खुद को तैयार (सज्ज) करना – एक नई, बेहतर व्यवस्था बनाने के लिए त्याग करना – क्या यह प्रासंगिक नहीं है? यह प्रश्न वास्तव में सकारात्मक उत्तर मांगता है: हाँ, बहुत प्रासंगिक है। उच्च मूल्यों (मानवता, न्याय, समानता, नैतिकता, शांति) के लिए बलिदान जरूरी है, तभी समाज बदल सकता है। हे मनुज! तू कर्म कर,प्रार्थना कर,खामोश रूहानी आंदोलन में रह कर। कर्मों के फल की इच्छा न कर। अपने अन्तस् ऊर्जा, चेतना के अहसास, अपने हृदय में दिव्यता की उपस्थति के अहसास में रहकर बस कर्म करे जा। जब अरस्तू के पास वह युवक पहुँचा था जो कि आत्महत्या का विचार रखता था। आत्महत्या वास्तव में क्या है? आत्महत्या वह स्थिति है जिसमें व्यक्ति अपने देह, अन्य देह, अपनी आत्मा, अन्य देह की आत्मा को वक्त देना बंद कर देता है या फिर वक्त देने से काफ़ी दूर निकल जाता है -मानव निर्मित व्यवस्था में उलझ जाना ऊपर से वह व्यवस्था भी जिसमें  उसकी दैहिक, दैविक ,भौतिक किसी तरह की समस्या से उसे देहान्त से पूर्व मुक्ति नहीं मिलती। जो युवक अरस्तू के पास एक उम्मीद से आया था कि उसके अंदर आत्महत्या के भाव आने लगे थे लेकिन वह अपने परिवार, समाज, विभिन्न संस्थाओं में उस भाव से मुक्त नहीं हो पा रहा था। लोग उससे कहते तो थे कि आत्महत्या करना गलत है, आत्महत्या करना पाप है लेकिन कोई उसे समाधान देता नहीं था। लेकिन समाज में यह तो एक अच्छाई अभी जिंदा थी कि कुछ लोगों ने सुझाव दिया था कि अरस्तू के पास जाओ। अरस्तु के पास वह आया और बोला कि मेरे में आत्महत्या के भाव आते हैं तो अरस्तु बोल पड़ा-” तब फिर मेरे पास क्यों आये?जाओ आत्महत्या कर लो जाकर? “ “आप भी ,आप किसी बात करते हो?इससे अच्छा तो समाज था कि वह कहता था कि आत्महत्या करना पाप है? “ अरस्तु बोला - “ इससे क्या ? लेकिन समाज के पास, तंत्र के पास तुम्हारे समस्या का समाधान तो नहीं था?उसने तुम्हें समाधान दिया तो नहीं?”  खामोशी… “ समाज तो भीड़ तो मुर्दा हो चुकी है। उसके पास समाधान नहीं, मानवता नहीं।उसके पास उन्माद है, हिंसा है, जबरदस्ती है, बदले का भाव है, मतभेद हैं, अनेक कुरीतियां हैं, अंध विश्वास हैं….. आदि आदि लेकिन समाधान नहीं है। अब मेरे पास आ ही गये हो तो बस अब मेरे पास रहो।कुछ नया अपनी ओर से सोंचना बंद कर दो? “ “......और ये भाव आत्म हत्या का? “ “आने दो उसे ,तुम उससे अपने को अलग कर लो ।अपने देह को वक्त दो, हमारे देह को वक्त दो, अपनी हमारी आत्मा को वक्त दो।अपने आस पास  की व्यवस्था, हमारे संदेशों, हम दोनों की वार्ता को वक्त दो। “ बुद्ध ने अंगुलिमान के साथ भी क्या किया था?बुद्ध उससे बोले थे लंबी वार्ता के बाद कि हममें तुममें कोई फर्क नहीं।मैं जाग चुका हूं  तू जागने वाला है।कैसे?यह कैसे? तू मेरे साथ आ जा। लेकिन अरस्तु अपने आखिरी वक्त पर अज्ञातवास में था।आखिर क्यों?लोगों के काम।तो आओ लेकिन दूसरों के लिए बोझ मत बनो। अपना देह का अभ्यास इतना तो मजबूत हो ही कि अपने देह को चलाते -फिराते रहो, देहान्त के वक्त तक भी लेकिन ये कैसे सम्भव है?व्रत का मतलब अपने आराध्य को याद कर भूखे रहना नहीं है सिर्फ वरन उस व्यवस्था, दशा से जुड़ना है जो इस देह को चला रही है।उससे जुड़ने के बाद यह देह के कारण हम परेशान नहीं होंगे लेकिन होता क्या है ?हम अपने देह, अपनी आत्मा, अन्य देह, अन्य देह की आत्माओं को वक्त देना बंद कर देते हैं और दुनिया की वस्तुओं, समाज की मृत व्यवस्था, मनुष्यों की बनावटी व्यवस्था में उलझ जाते हैं।
सिद्धार्थ से बुद्ध बनने का रास्ता क्या है?सिद्धार्थ की सोंच ,नजरिया, धारणा जो उसने अपने देह, राज महल में रहने वाली अन्य देहों के बारे में बना रखी थी लेकिन जब वह नगर की यात्रा पर निकला तो वह सारी सोंच, नजरिया, धारणा धराशायी हो गई और अब वह उलझ सा गया।अब समाधान क्या? व्यक्ति भी क्या हो गया है?व्यक्ति का व्यक्तित्व धराशायी हो गया है।धराशायी नहीं हुआ है तो होने वाला है आगे चल कर? लगे हैं….रात दिन एक कर कम्पटीशन में, प्रतिस्पर्धा में, कैरियर बनाने में लेकिन कायनात को,अपने देह को, अपने आत्मा को वक्त देने को फुर्सत नहीं? कोई पद आगे चल कर पा भी गये तो क्या? पत्नी, पति, बच्चे, गाड़ी बंगला, पार्टियां, रिश्तेदारियां,माफिया तंत्र, खाद्य मिलावट, नशा व्यापार, रिश्वतखोरी, जातिवाद, भीड़ हिंसा, मजहबी उन्माद…..लेकिन अपना व्यक्तित्व?! अपना व्यक्तित्व जो प्रकृति अभियान में, ईश्वर अभियान में, ब्रह्मण्ड चेतना में वह जो था उससे भी अब नीचे स्तर पर ?और ऊपर से मानव व्यवस्था, समाज, जनपद, राज्य के अंदर की विभिन्न नकरात्मक स्थितियां, उनके बीच असुरक्षा का भाव..?! 👍अशोक कुमार वर्मा ' बिंदु ' www.ashokbindu.blogspot.com www.akvashokbindu.blogspot.com