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रविवार, 12 जुलाई 2026

वास्तविक मार्क्सवाद - साम्य वाद और उसका आधुनिक विकल्प?!

**वास्तविक मार्क्सवाद-साम्यवाद क्या है और इसका आधुनिक विकल्प**
1. **वास्तविक मार्क्सवाद - साम्यवाद का वैचारिक आदर्श** कार्ल मार्क्स साम्यवाद की आदर्श व्यवस्था मुख्य रूप से दो बड़े शोषणों को समाप्त करने के लिए डिज़ाइन की गई थी --। * पारिवारिक संसाधनों व्यक्तियों बच्चो और महिला श्रम का शोषण:-- पारंपरिक व्यक्तिगत/पूंजीवादी व्यवस्था में घर की महिला के ज्ञान और घरेलू श्रम का कोई आर्थिक मूल्य नहीं आंका जाता, जिससे उनका निरंतर शोषण होता है। गरीब मजदूर सभी उत्पादन और लाभ में बराबर के सहयोगी और हकदार भी। * वैचारिक वायरस (मानसिक थोपना):-- जब बच्चों के पालन-पोषण, सुरक्षा और भविष्य की पूरी जिम्मेदारी अकेले पिता या माता-पिता पर होती है, तो वे अनजाने में अपने विचार, अपेक्षाएं और रीति-रिवाज बच्चों पर थोपने लगते हैं। इससे बच्चे के प्राकृतिक 'सॉफ्टवेयर' (मूल प्रतिभा और स्वभाव) में वैचारिक 'वायरस' जन्म ले लेता है और उसकी प्राकृतिक मौलिकता विकृत हो जाती है। व्यक्तिवादी बाजार तंत्र से खरीदी बेची लाभ वैल्यू जनित हिंसक प्रतिष्ठा आधारित शोषण प्रदूषण जन्म लेने लगता हैं और जैसे जैसे विज्ञान विकसित होता जाता हैं शोषण प्रदूषण भी उतनी ही तेज गति से विकसित होता जाता है। इसको कोई रोक नहीं सकता है। **पारंपरिक साम्यवाद का समाधान**:-- **ग्रामीण कम्यून*" इस शोषण से मुक्ति के लिए मार्क्स ने 'कम्यून व्यवस्था' (सामूहिक ग्राम व्यवस्था) की कल्पना की थी। इसके तहत:-- ग्रामीण स्तर पर कृषि और अन्य सभी कार्य सामूहिक होंगे। सामूहिक भोजनालय, सामूहिक स्कूल-कॉलेज, शिक्षण-प्रशिक्षण और सामूहिक स्वास्थ्य-सुरक्षा की व्यवस्था होगी। बच्चा कम्यून की देखरेख में पलेगा-बढ़ेगा और अपने माता-पिता या भाई-बहन से केवल कुछ घंटों के लिए मिलने आएगा। इससे महिला का श्रम घरेलू गुलामी से मुक्त होकर समाज के लिए उत्पादक (Productive) बनेगा। इस तरह शोषण प्रदूषण का कारण खत्म हो जाएगा। कोई खरीदी बेची लाभ वैल्यू नहीं होगी। किसी को खुद की अपनी अलग से व्यवस्था करनी नहीं है। विवाह और आपसी संबंधों में पूर्ण स्वतंत्रता होगी;-- व्यवस्था कोई पारंपरिक रीति-रिवाज या बंधन नहीं थोपेगी। सभी के रहने के लिए समाज (कम्यून) द्वारा घर की व्यवस्था की जाएगी। 2. क्या वास्तविक साम्यवाद कभी लागू हुआ? (ऐतिहासिक कड़वी सच्चाई) नहीं, वास्तविक साम्यवाद आज तक दुनिया में कहीं भी पूर्ण रूप से लागू नहीं हो सका। रूस (सोवियत संघ) या चीन में जो व्यवस्था आई, वह आंशिक और विकृत थी। इसके पीछे मुख्य वैज्ञानिक और आर्थिक कारण निम्नलिखित थे: अभाव' में साम्यवाद का असफल होना। मार्क्स के समय विज्ञान और तकनीक बहुत प्रारंभिक अवस्था में थे। भौतिक शरीर का पेट भरने के लिए प्रचुर मात्रा में 'सामग्री' उपलब्ध नहीं थी। भुखमरी और अभाव के माहौल में यदि जन्म से ही आर्थिक स्वतंत्रता दे दी जाती, तो अराजकता फैलना तय था। सूचना तंत्र बहुत कमजोर था। आवागमन का साधन भी कोई अच्छा नहीं था। इसे एक सरल उदाहरण से समझा जा सकता है:-- स्थिति 'A' (अभाव): एक पार्टी में 2000 लोग आमंत्रित हैं, लेकिन भोजन केवल 500 लोगों का है। वीआईपी संस्कृति और प्रतिष्ठा के दबाव में वहाँ अफरा-तफरी मच जाएगी और शुरुआत के 200-300 लोग ही सारा भोजन खत्म कर देंगे। रूस और चीन में यही हुआ; वहाँ अभाव के कारण साम्यवाद के नाम पर 'पूंजीवादी नौकरशाही' या 'गरीबी का पूंजीवाद' स्थापित हो गया। स्थिति 'B' (प्रचुरता): यदि 2000 लोगों के लिए पर्याप्त जगह और असीमित भोजन हो, तथा समय की कोई पाबंदी न हो, तो लोग आराम से घूम-फिरकर अपनी पसंद का स्वाद लेंगे। वहाँ कोई छीना-झपटी या अराजकता नहीं होगी। थोड़ा विषय से बाहर -- ( कुछ लोगों का प्रश्न हो सकता है कि चीन रूस की आर्थिक स्थिति थोड़ा ठीक क्यों है? तो उसका कारण वहां आठवीं से तकनीकी स्तर की शिक्षा के साथ तकनीकी प्रेक्टिकल की तकनीक दी जाती थी, इसलिए वहां बच्चे दसवीं तक खुद का घरेलू उद्योग से उत्पादन कर बाजार में बेचकर अपना पूरा खर्च खुद उठा लेते थे तो माता पिता का पैसा खर्च नहीं होता था वह बाजार से मांग में वृद्धि से रोजगार में वृद्धि होती चली गई। पर आगे जाकर यदि दूसरे देश चीन का उत्पाद की मांग नहीं करे तो चीन का विकास रुक भर नहीं जाएगा आर्थिक चपेट में आ जाएगा। रूस आर्थिक चपेट में आ चुका है चुकी ऐसा अमेरिका द्वारा वेन होने से बाहर की मांग रुक गई है ) चूंकि उस समय रूस और चीन में वैज्ञानिकी विकसित नहीं होने के कारण घर चलाने की जिम्मेदारी अंततः परिवार के मुखिया (पिता) पर ही बनी रही, इसलिए वहाँ भी लाभ, मूल्य, खरीदी-बिक्री और प्रतिष्ठा पर आधारित सामाजिक ढांचा ही काम करता रहा। परिणामतः, पूंजीवाद ही अलग-अलग रूपों में चलता रहा: रूस और चीन:-- गरीबी और अभाव की प्रधानता पर आधारित राज्य-पूंजीवाद। शुरुआती भारत:-- बीचों-बीच का संतुलन (मिश्रित अर्थव्यवस्था)। अमेरिका:-- पूर्णतः लाभ और व्यक्तिगत प्रधानता पर आधारित शुद्ध पूंजीवाद। 3. आधुनिक युग और संपूर्ण समाधान, पारिवारिक श्रम-सहयोगी अर्थव्यवस्था (ULM मॉडल) आज विज्ञान और टेक्नोलॉजी का अभूतपूर्व विस्तार हो चुका है। अब हम कृषि युग से निकलकर बड़े पैमाने पर इंफ्रास्ट्रक्चर और उत्पादन के युग में हैं। इसलिए, मार्क्स के पुराने 'ग्रामीण कम्यून' की जगह आज नगरीय कम्यून की आवश्यकता है। रजवाड़ा व्यवस्था में आवागमन सूचना तंत्र अभाव की वजह से जिस पारिवारिक श्रम सहयोगी व्यवस्था की मान्यता खत्म कर दी गई थी आज वह अभाव खत्म हो चुका है। राजवाड़ा व्यवस्था से पहले कृषि कबीला संघ सिंधु घंटी सभ्यता तक पारिवारिक श्रम सहयोगी लेनदेन उत्पादन पर आधारित थी। जहां सामूहिक भोजनालय सामूहिक कृषि होती थी। ULM नगरीय कम्यून का स्वरूप:--। वर्टिकल रहन-सहन: कम से कम 20 लाख लोगों की आबादी का एक आधुनिक, वर्टिकल (गगनचुंबी और सुनियोजित) नगरीय मॉडल का आधुनिक टेक्नोलॉजी से सुसज्जित पर्यावरणीय नगर हो । स्वास्थ्य शिक्षण प्रशिक्षण सभी इंफ्रास्ट्रक्चर अभी तक की वैज्ञानिकी शोध खोज की पूर्ण टेक्नोलॉजी के साथ खड़ा हो ताकि भागम भाग की जिंदगी खत्म हो। जनसंख्या का सही अनुपात:- चुकी अब बजट की जरूरत नहीं तो शिक्षण प्रशिक्षण स्वास्थ्य सेवाएं सभी इंफ्रास्ट्रक्चर पूर्ण टेक्नोलॉजी के साथ खड़े होगे, हर नगर समान होगे। अतः कम से कम 20 लाख की आबादी होने से स्कूल, कॉलेज, एडवांस शिक्षण-प्रशिक्षण और विश्वस्तरीय स्वास्थ्य सेवाओं का इंफ्रास्ट्रक्चर पूरी तरह आत्मनिर्भर और उपयोगी हो जाता है। इससे मानव, जीव और प्रकृति का शोषण का कारण खत्म होता है, और मनुष्य की रचनात्मकता का शत-प्रतिशत उपयोग समाज के लिए हो पाता है। चिंता से मुक्ति:-- भय और भूख की प्राकृतिक कारण को इस व्यवस्था के मुख्य उद्देश्य व्यक्ति और परिवार को 'जीवन अर्थ' (रोटी, कपड़ा, मकान, स्वास्थ्य, सुरक्षा) की बुनियादी चिंताओं से मुक्त करना है, ताकि समाज से तनाव, कठोरता, प्रदूषण और दुष्टता का समूल नाश हो सके। जन्म से पूर्ण आर्थिक स्वतंत्रता रुचिकर जीवन व्यवस्था। खुद के व्यवस्था खुद को नहीं करनी पड़े। व्यक्तिगत, पारिवारिक और सामूहिक व्यवस्था का नया संतुलन:--। यह व्यवस्था पुरानी साम्यवादी भूलों को सुधारते हुए एक सुंदर संतुलन बनाती है । व्यक्तिगत स्तर:-- व्यक्तिगत स्वतंत्रता और इच्छा के अनुरूप लेन-देन। पारिवारिक स्तर:- परिवार के आकार और जरूरत के आधार पर सुंदर और सुरक्षित आवास की व्यवस्था। सामूहिक स्तर:- भोजनालय, शिक्षा, तकनीकी प्रशिक्षण, स्वास्थ्य सेवाएँ, सभी सुख सुविधाएं साधन और सुरक्षा पूरी तरह सामूहिक और निःशुल्क होंगी। जन्म से आर्थिक स्वतंत्रता होगी। कोई किसी पर आपस में निर्भर नहीं होगा जैसा अभी है, सभी की निर्भरता व्यवस्था के केंद्र में होगी। जैसे परिवार में होता हैं। संबंधों में तरलता और मोबाइल डिजिटल फ्रीक्वेंसी मैचिंग की व्यवस्था। विवाह या आपसी संबंधों के लिए यह आधुनिक व्यवस्था कोई जटिल नीति-नियम या थोपे गए संस्कार नहीं बनाएगी, बल्कि इसे पूरी तरह वैज्ञानिक और स्वतंत्र कर देगी सभी की रुचिकर स्वतंत्र संबंधों के लिए। * डिजिटल व्यवस्था:,-- व्यवस्था एक ऐसी उन्नत डिजिटल/मोबाइल प्रणाली विकसित करेगी, जहाँ 20 वर्ष की आयु पार करने पर प्रत्येक स्त्री-पुरुष अपनी रुचियाँ, आदतें और वैचारिक प्राथमिकताएँ दर्ज कर सकेंगे। फ्रीक्वेंसी मैचिंग:-- डिजिटल तकनीक के माध्यम से लोग अपने अनुकूल 'फ्रीक्वेंसी मैचिंग' (समान वैचारिक और मानसिक स्पंदन / धारणा गत मैचिंग) वाले जीवनसाथी या मित्रों को अत्यंत सरलता और तरलता से ढूंढ सकेंगे। अनुकूलन:- व्यवस्था उनके चयन के बाद उनके आपसी अनुकूलन के आधार पर उनके सुखद विवाह और आवास की गरिमामयी व्यवस्था कर देगी। निष्कर्ष:-- आज समस्या विज्ञान के आविष्कारों की या मनुष्य के जीने की कला (जीवन विधा) की नहीं है । असली समस्या 'जीवन अर्थ' (आर्थिक लेन-देन) के पुराने और त्रुटिपूर्ण ढांचे की है। आज जब विज्ञान के पास प्रचुर मात्रा में उत्पादन करने की क्षमता है, तब ULM टीम द्वारा प्रस्तुत "पारिवारिक श्रम-सहयोगी आर्थिक मॉडल" ही एकमात्र तार्किक और वैज्ञानिकी समानांतर मार्ग है, जो मनुष्य को भय और भूख की चिंताओं से मुक्त कर प्रेमानंद से परमानंद की ओर गति अग्रसर हो जानी तय हो जाता है। यूनिवर्सल लाइफ मैनेजमेंट का app आ गया है । सभी सदस्य नीचे दिए लिंक पर क्लिक करके तुरंत ही जुड़ें और अपना सदस्य Community कार्ड प्राप्त करे - Powered by Kutumb App https://primetrace.com/group/450702/post/1190430544?utm_source=android_post_share_web&referral_code=OVPQF&utm_screen=post_share&utm_referrer_state=PENDING?ref=OVPQF

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