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सोमवार, 5 अक्टूबर 2026

जीवन का संतुलन ::सन 2099 की एक कथा

जीवन का संतुलन सन 2099 की एक कथा सन 2099 ईस्वी!
धरती का मानचित्र पूरी तरह बदल चुका था। समुद्र ने अनेक तटीय नगरों और गाँवों को अपने भीतर समेट लिया था। हिमालय सहित संसार के अनेक ग्लेशियर तेजी से पिघल चुके थे। सदानीरा कहलाने वाली कई नदियाँ बरसाती नालों में बदल गई थीं। कहीं पानी का अथाह विस्तार था, तो कहीं पीने के लिए एक बूँद भी दुर्लभ थी। ऊँची इमारतों, चमकते बाजारों और चौड़ी सड़कों वाले महानगर उजड़े हुए खड़े थे। बिजली, इंटरनेट और वातानुकूलित कमरों पर निर्भर रहने वाले लोग अब जंगलों, गुफाओं, पुराने किलों, खंडहरों और बचे हुए गाँवों में शरण खोज रहे थे। जिन्हें कभी खेती और पशुपालन पिछड़ेपन के प्रतीक लगते थे, वे अब थोड़ी-सी उपजाऊ भूमि और एक स्वस्थ गाय के लिए अपनी सारी जमा पूँजी देने को तैयार थे। ऐसे ही विस्थापित लोगों का एक समूह पहाड़ियों के बीच बसे छोटे से गाँव समग्रपुर पहुँचा। वहाँ मिट्टी और पत्थरों से बने घर थे। हर घर के सामने छोटा-सा बगीचा और वर्षा-जल संग्रह करने का कुंड था। गाँव के लोग सामूहिक खेती करते और आवश्यकताओं के अनुसार उपज बाँटते थे। समूह का नेतृत्व आरव नाम का एक युवक कर रहा था। उसने गाँव के बुजुर्ग से पूछा— “बाबा, आपके गाँव में न कोई बहुत धनी दिखाई देता है, न कोई भूखा। न बड़ी मशीनें हैं, न बड़े बाजार। फिर भी यहाँ का जीवन सुरक्षित कैसे बचा रहा?” बुजुर्ग मुस्कराए। उनका नाम आचार्य समन्वय था। वे लोगों को एक पुराने विद्यालय के खंडहर में ले गए। वहाँ धूल से ढकी अलमारी में कुछ पुस्तकें सुरक्षित थीं। उन्होंने एक पुस्तक निकाली, जिसके मुखपृष्ठ पर लिखा था— “क्रांति क्यों? कैसे?!” लेखक—अशोक कुमार वर्मा ‘बिंदु’ आचार्य ने कहा— “इस पुस्तक में लिखा है कि क्रांति अचानक पैदा नहीं होती। वर्तमान में जिसकी उपेक्षा की जाती है, वही भविष्य में बड़ी बाधा बनकर सामने आता है। किसी व्यक्ति की छोटी-सी असंतुष्टि को दबाओ, तो वह मानसिक विद्रोह बनती है। परिवार की समस्या की उपेक्षा करो, तो परिवार टूटता है। समाज की पीड़ा को अनसुना करो, तो सामाजिक संघर्ष जन्म लेता है। प्रकृति की चेतावनियों को नकारो, तो पूरी सभ्यता संकट में पड़ जाती है।” आरव ने बाहर सूखी हुई नदी की ओर देखते हुए कहा— “तो क्या हमारी यह दशा भी बहुत पहले लिए गए गलत निर्णयों का परिणाम है?” “हाँ,” आचार्य बोले, “मनुष्य ने वर्तमान को सुविधा समझा, पर उसके परिणामों को नहीं देखा। जंगल काटते समय उसने भविष्य की साँसों के बारे में नहीं सोचा। नदियों को दूषित करते समय आने वाली पीढ़ियों की प्यास को भूल गया। खेती को व्यापार और भोजन को केवल वस्तु बना दिया। गाँवों को उजाड़कर नगर बढ़ाए, फिर नगरों को ही जीवन की पूर्णता मान लिया।” वहीं बैठी एक वृद्ध महिला बोली— “लेकिन बाबा, उस समय लोगों ने परिवर्तन के आंदोलन भी तो चलाए थे?” आचार्य ने पुस्तक का एक और पृष्ठ खोला— “हाँ, सन 2011 से 2014 के बीच व्यवस्था-परिवर्तन की तीव्र माँग उठी थी। भ्रष्टाचार, काला धन, स्वदेशी, पारदर्शिता और जनभागीदारी जैसे विषय जनता के बीच आए। अन्ना हजारे और बाबा रामदेव जैसे लोगों ने उस असंतोष को स्वर दिया। पर सन 2014-15 के बाद आंदोलन अनेक राजनीतिक, वैचारिक और संगठनात्मक बाधाओं में उलझ गया।” “फिर आंदोलन समाप्त क्यों हो गया?” आरव ने पूछा। आचार्य ने उत्तर दिया— “क्योंकि जनता परिवर्तन तो चाहती थी, पर अपने व्यवहार को बदलना नहीं चाहती थी। वह व्यवस्था की आलोचना करती थी, पर मतदान के समय जाति, पंथ, दल, भय, लालच और व्यक्तिगत लाभ के घेरे में लौट जाती थी। लोग किसी उद्धारक की प्रतीक्षा करते रहे, जबकि व्यवस्था-परिवर्तन के लिए उन्हें स्वयं उत्तरदायी नागरिक बनना था।” एक बालक ने उत्सुकता से पूछा— “क्या किसी ने प्रयास जारी नहीं रखा?” आचार्य बोले— “प्रयास कभी पूरी तरह समाप्त नहीं होते। नेताजी सुभाषचंद्र बोस के विचारों से प्रेरित लोग, राजीव दीक्षित के स्वदेशी और विकेंद्रीकरण के समर्थक, देवेंद्र बल्हारा जैसे जन-जागरण में लगे व्यक्ति तथा अनेक अज्ञात कार्यकर्ता अपने-अपने स्तर पर काम करते रहे। लेकिन उनके छोटे-छोटे प्रयास व्यापक जनचेतना से नहीं जुड़ पाए। जनता उन्हीं दलों और नेताओं के पीछे चलती रही, जिनके पास आकर्षक नारे तो थे, मगर जीवन और प्रकृति के संतुलन का समग्र समाधान नहीं था।” रात होने लगी थी। गाँव के सभी लोग एक वृक्ष के नीचे एकत्र हुए। आचार्य ने मिट्टी पर एक वृत्त बनाया और उसके भीतर लिखा—जीवन। फिर उन्होंने वृत्त के चारों ओर चार शब्द लिखे— व्यक्ति—परिवार—समाज—प्रकृति। वे बोले— “जीवन इनमें से किसी एक का नाम नहीं है। जीवन संतुलन है, योग है, जोड़ है, पूर्णता और सम्पूर्णता है। ‘अल’, ‘आल’ या अंग्रेजी का ‘All’—इन ध्वनियों में भी समग्रता का भाव खोजा जा सकता है। पर शब्दों से अधिक महत्त्व उसके अनुभव का है। जब व्यक्ति स्वयं को सम्पूर्ण जीवन से अलग समझने लगता है, तभी असंतुलन आरम्भ होता है।” आरव ने पूछा— “अब हम क्या कर सकते हैं? बहुत कुछ तो नष्ट हो चुका है।” आचार्य ने कहा— “क्रांति का अर्थ केवल सत्ता बदलना नहीं। वास्तविक क्रांति जीवन की दिशा बदलना है। सबसे पहले अपने भीतर संतुलन स्थापित करो। फिर परिवार में सहयोग, गाँव में साझेदारी और प्रकृति के साथ सहजीवन विकसित करो। प्रत्येक गाँव को भोजन, पानी और ऊर्जा के मामले में यथासंभव आत्मनिर्भर बनाओ। भूमि, जल, वन और बीज को केवल व्यापारिक सम्पत्ति नहीं, आने वाली पीढ़ियों की धरोहर समझो।” अगले दिन से विस्थापित लोगों ने समग्रपुर के निवासियों के साथ मिलकर काम शुरू किया। वर्षा-जल के नए कुंड खोदे गए। सूखी नदी के किनारे छोटे बाँध बनाए गए। स्थानीय बीजों को खोजकर सुरक्षित किया गया। पशुपालन, खेती और बागवानी को अलग-अलग व्यवसाय न मानकर एक संयुक्त जीवन-चक्र बनाया गया। बच्चों की शिक्षा भी बदल गई। वे पुस्तकों के साथ खेत, जंगल, जल और अपने अंतर्मन को पढ़ना सीखने लगे। कुछ वर्षों बाद सूखी पहाड़ियों पर फिर हरियाली दिखाई देने लगी। पक्षी लौटने लगे और गाँव के कुओं में पानी बढ़ गया। एक दिन आरव ने बच्चों को वही पुरानी पुस्तक दिखाते हुए कहा— “हमारे पूर्वजों ने क्रांति को केवल सरकार बदलने की घटना समझ लिया था। इसलिए सरकारें बदलीं, चेहरे बदले, नारे बदले—लेकिन मनुष्य की आदतें और विकास की विनाशकारी दिशा नहीं बदली। वास्तविक क्रांति तब आरम्भ हुई, जब हमने स्वयं को प्रकृति, समाज और ब्रह्मांडीय जीवन से जुड़ा हुआ माना।” एक बालिका ने पूछा— “तो जीवन का सबसे सरल अर्थ क्या है?” आरव ने उत्तर दिया— “जीवन केवल मेरा जीवित रहना नहीं है। जीवन वह संतुलन है जिसमें मेरे साथ परिवार, समाज, पशु-पक्षी, पेड़-पौधे, जल, वायु और आने वाली पीढ़ियाँ भी सुरक्षित रहें। इनमें से किसी एक की उपेक्षा सम्पूर्ण जीवन की उपेक्षा है।” दूर क्षितिज पर सूर्य उग रहा था। उसके प्रकाश में पुस्तक के मुखपृष्ठ पर लिखे दो प्रश्न चमकने लगे— क्रांति क्यों? क्योंकि उपेक्षित वर्तमान एक दिन असहनीय भविष्य बन जाता है। क्रांति कैसे? अपने भीतर से आरम्भ करके—व्यक्ति से परिवार, परिवार से समाज, समाज से व्यवस्था और व्यवस्था से सम्पूर्ण प्रकृति तक संतुलन स्थापित करके। उस सुबह सन 2099 की उजड़ी हुई धरती पर लोगों को पहली बार समझ आया कि क्रांति विनाश का विस्फोट नहीं, बल्कि बिखरे हुए जीवन को फिर से जोड़ने की प्रक्रिया है। और जो समाज समय रहते अपनी असंतुष्टि, असमानता तथा प्रकृति की चेतावनी सुन लेता है, उसे भविष्य में विनाशकारी क्रांति की आवश्यकता नहीं पड़ती।