गुरुवार, 15 सितंबर 2011

बौद्धिक प्रतिभा के दंश : शारीरिक सक्रियता व सामाजिकता

ब्रिटेन से शोध मीडिया मेँ आया था कि बुद्धिजीवी कामकाजीबुद्धि कम रखते हैँ.सांसारिकजगत मेँ शारीरिक कर्म ज्यादा महत्वपूर्ण है.मनस मेँ जीने वाले सांसारिक शारीरिक एन्द्रिक आवश्यकताओं मेँ जीने वाले व्यक्तियों की अपेक्षा कम शारीरिक सक्रियता वाले होते हैँ.मनसजीवी अन्तर्मुखी व्यक्तियों से वहिर्मुखी भौतिकजीवी व्यक्तियों से तुलना कर मनसजीवी व अन्तर्मुखी व्यक्तियों कम कम आंकना परिवार व समाज की भौतिकवादी नजरिये का प्रदर्शन है न कि धार्मिक व आध्यात्मिक . ओशो ने कहा है कि धर्म व्यक्ति को भीड़ से अलग कर देता है .ओशो के इस कथन पर चिन्तन करने की आवश्यकता है .भीड़ का व्यक्ति निष्काम कर्म व परोपकार का हेतु लेकर नहीं चलता.निष्काम कर्म ही वास्तव मेँ कर्म होते हैं जो कि आत्मा या परमात्मा से संचालित होते हैं.भीड़ के कर्म नहीं चेष्टाएं,बदले का भाव,उन्माद शारीरिक व एन्द्रिक लालसाओं की प्रतिक्रिया,भेंड़चाल,आदि होते हैँ.परम्परागत पारिवारिक शारीरिक कर्मों से हट कर कमरे या अन्यत्र मानसिक कार्य करने वालों को अब भी परिवार व समाज मेँ आलसी,कामचोर,आदि के ताने मिलते हैँ.क्यों न फिर वे विदेश मेँ जा यश व सम्मान प्राप्त करे

----------
मेरें Nokia फ़ोन से भेजा गया

1 टिप्पणी:

arvind ने कहा…

निष्काम कर्म ही वास्तव मेँ कर्म होते हैं जो कि आत्मा या परमात्मा से संचालित होते हैं...satik baat.